मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
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मत्तगयंद सवैया : माखनचोर

मत्तगयंद सवैया
 7 भगण(211) 2 गुरु
211 211 211 211 211 211 211 22


माखन ला घर के नइ खावय जा पर के घर चोर कहाथे।
दूध दही घर मोर भरे हड़िया हड़िया सब लोग नहाथे।
काय सखी मँय बात कहौ सब ग्वालन मोर करा अटियाथे ।
ये बिलवा किसना हर मोर गली घर गाँव म नाक कटाथे।


चकोर सवैया: तुलसी

211× 7+2+1

तुलसी दास जी

बादर हे धनघोर घिरे  चमके गरजे बिजली  कड़काय।
पोठ भरे नदियाँ नरवा  रतिहा अँधियार  म जीव डराय।
मार सनाय गली चिखला तब ले सुरता जब तोर सताय।
तोर धरे धुन मैं रतना  गिरते हपटे पहुँचे  हँव आय।

रत्नावली जी-

मोर मया पर के जग के सुख त्याग करेहस भागतआय।
तैं बरसा  नरवा नदियाँ मरहा मुरदा तक ला न डराय।
तोर सहीं कहुँ मूरख हे बिरथा तन खातिर मोह लगाय।
राम घलो जपले बइहा भव सागर जे हर पार कराय।

सुन्दरी सवैया : जग हा पगला जी


नइ लाज लगे  पग तोर परे, हम छोड़ दिये जग मा  सबला जी।
अब जे करना सब राम करे, अउ का करना अब हे हमला जी।
सब हा पगला कहिथे हमला, हम बोलन ये जग हा पगला जी।
चतुरा बन के नइ राम मिले, बन के रहिबो हम तो भकला जी।

सुन्दरी सवैया : रामा

अब कोन हमार सहाय करे  , ठगवा जग मा फँस गे हँव रामा।।
बँधना  बँध के तन नाँच करे, जम के छँदना कस गे हँव रामा।
घर नो हय ये तन चार दिनी, सब जान तभो बस गे हँव रामा।
जतका उठथौ गिर के परथौ,  मँय कोन गली धस गे हँव रामा।

सुन्दरी सवैया : मन मूरख मोर



नइ बात सुने ककरो ल कभू, मन मूरख मोर करे मनमानी।।
परगे मद लोभ सवारथ मा, बिरथा कर के धर दे जिनगानी ।
अब तोर सिरावत साँस हवे, भकला बन जाय चले न जवानी।
सत मारग मा पग ला धर ले, सुरता करही जग तोर कहानी।




सुन्दरी सवैया : हदराही

मनखे मन होत अलाल हवे, मन मा अब बाढ़त हे हदराही।
सरकार घलो जब बाँटत हे , जनता हर फोकट पा इतराही।
नइ काम करे बर जाँगर हे, अउ फोकट पा डट के सब खाही।
हम देख परे हन आलस मा, अब देश विकास ल कोन बढाही।

सुन्दरी सवैया : मत माथ नवाँ

मत माथ नवाँ पर के पग मा, डर के मुँह तोप झनी सँगवारी।
झन लालच मा परके लुलवा, पर के मत खा अब गा तँय गारी।
सिधवा बन के बइला बनके, तँय काज करे कतको बढ़ भारी।
नइ हाथ उठा हक माँग सके, तब होवय तोर कहाँ चिनहारी।

अरविन्द सवैया : भगवान

कतको मन रोज कमावत हे, बनथे सब लोग कहाँ धनवान।
लड़थे दिनरात तभो न सबो,  मनखे मन होवय जी बलवान।
मन हार गए सब हारत हे, मन जीत लिए जग जीत जवान।
पथरा कहिथे कतको ह भले, विसवास करे मिलथे भगवान।

अरविंद सवैया : सैनिक




जब सैनिक भारत माँ बर जी,तन ला  हँस के करथे बलिदान।
उखरे तप त्याग हरे हम ला, दुनियाँ भर मा मिलथे पहिचान।
मत भूल कभू उपकार सँगी, मरगे अउ देश बढाइन मान।
जस गा कवि  माथ नवाँ अपने, उखरे अब देश करे गुनगान।

सुन्दरी सवैया : बेटी

जब मात पिता कहना सुनके, मन मा गुन काज सँवारय बेटी।
परिवार रहे सुख मा गुनके, विपदा सुख -त्याग निवारय बेटी।
अभिमान हरे घर के कुल के, लिख के पढ़के कुल तारय बेटी।
जिनगी भर तो लड़थे दुख ले,पर के सुख खातिर हारय बेटी।

अरविंद सवैया : गुरु कृपा

किरपा गुरु होय जभे जग मा, तब तोर सहाय करे  भगवान ।
कुमहार रचे हड़िया जइसे,  रचथे गुरु हाथ बने इनसान।
गुरु के पग मा  विसवास करे, जतके सुनबे तँय जी रख ध्यान।
जिनगी  हर धन्य बने  तुमरे , बनथे जग मा तब नाम महान।

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