मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
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हरिगीतिका

हरिगीतिका 2212,   2212,   2212,    2212



मत हार के  तँय बइठ जा ,ये हार रद्दा जीत के।
काटा घलो हा गोड़ के, रचथे कहानी बीत के।
चाहे ठिकाना दूर हे, अब बिन रुके  चलते चलो।
होथे उही मन हर सफल,जे उठ जथे गिरके घलो ।

हिम्मत करो डटके बने,कल के फिकर ला छोड़ दो।
 कर के भरोसा आप के ,कनिहा बिपत के तोड़ दो।
कइसे मुसीबत हारथे, तँय देख ले ललकार के।
अब कर उदिम बस जीत बर,मत हार मानो हार के।

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सब जीव मन तड़फत हवे,व्याकुल हवे संसार हा।
अब ताप मा तनमन जरय, आगी बरत हे खार हा।
तरिया सबे अब अउटगे,अउ खेत मन परिया परे।
तँय भेज दे अब नेवता घनमेघ ला धरती  तरे।

बरखा बने बरसे तभे ,होही फसल हर धान के।
हम काम कर दे  हन अपन,अब आसरा भगवान के।
नागर चले जाँगर चले, बादर चले तब काम के।
सब खेत ला जोतत हवन, अब हम भरोसा  राम के।

सिधवा हरन ,बइला हरन,तँय चाब ले ,पुचकार ले।
रिस बात के मानन नही,जीभर तहूँ दुत्कार ले ।
हम घर अपन, मजदूर हन, मालिक हमर आने हरे।
छत्तीसगढ़ के भाग ला, हे आन मन गिरवी धरे।

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सब जानवर बेघर करे, जंगल तहीं , हा काट के।
कब्जा करे जंगल घलो,नरवा नदी ला  पाट के।
तँय नास दे पर्यावरण, गरहन लगाए छाँव मा।
हाथी तको,बघवा घलो , वन छोड़ आ थे गाँव मा।


अब बेंदरा ,आ के शहर, उत्पात करथे टोरथे।
वो आदमी के जिंदगी , ला जोर से झकझोरथे।
हम पूँछथन, भगवान ले ,ये का तमाशा रोज के।
जब भूख लागे पेट मा,चारा सबेेझन खोज के।

जंगल कहाँ हरियर हवे, चारा घलो पाही कहाँ।
तँय घर उजारे हस उखर, सब जीव मन जाही कहाँ।
अब जानवर मन तोर घर, आथे बचाये प्रान ला।
 रोथस तभो तँय देख के , अपने अपन नुकसान ला ।

करनी अपन ,अब भोगबे , रोबे तहूँ पछताय के।
जब भूख लगही पेट मा ,पाबे नहीँ कुछु खाय के।
टोटा सुखाही प्यास मा, पाबे पिये पानी नहीँ।
तँय सोच ले ,जंगल बिना, अब तोर जिनगानी नहीं।

हरिगीतिका : सरस्वती दाई

हे सरसती दाई महूँ , बिनती करव कर जोर के।
तोरे सरन मा आय हँव, मद मोह बँधना छोर के।
अज्ञान के बादर छटे, अउ पाँख ला आगास दे।
मँय हँव परेअँधियार मा,तँय ज्ञान के परकास दे।

माँ सारदा हे आसरा, देवी हरस वो ज्ञान के।
सत्मार्ग मा मँय चल सकव,रद्दा छुटय अज्ञान के।
लइका हरव मँय कमअकल ,नइ आय मोला साधना।
माथा नवा के  मँय करँव ,तोरे चरण आराधना ।

हरिगीतिका : गुरुवर


गुरुवर करें कर जोड़कर, हम आपकी आराधना।
आशीष दो हमको यही, अब हो सफल हर साधना।
 हम क्या करें नादान हैं कुछ भी हमें आता नहीं ।
तेरे चरणरज के सिवा, कुछ और अब भाता नही।


भगवान से बढ़ कर तुझे, कहते जगत के लोग हैं।
मेरे किसी सद्कर्म से , अब तू मिला संजोग है।
तेरी कृपा  मुझ दास पर,  गुरुवर सदा बरसा करे।
तेरे चरण दर्शन मिले,मेरे नयन तरसा करे।

अज्ञान का बादल छटे, सूरज उगे अब ज्ञान का ।
मैं हूँ पतित पग में पड़ा , तू कर जतन उत्थान का।
मद लोभ में घिर कर फसा, यह मोह बन्धन तोड़ दे।
मैं बह रहा अनजान पथ, तू धार मेरी मोड़ दे।

हरिगीतिका: अटल जी ला श्रद्धांजलि

कर जोर के तोरे चरण, माथा नवाँ पइयाँ परँव।
हे नम नयन सुरता धरे, श्रद्धा सुमन अर्पित करँव।।
माटी हवे बड़ धन्य जी, तोरे असन पा लाल ला।
करके जतन तँय हर चले,भारत ऊँचा के भाल ला।।

लड़ते रहे बाहर भीतर, नइ हार माने हार के।
पीरा सहे अपने अपन, चिंता करे संसार के।।
जीवन मरण सुख दुःख सदा, सम जान के स्वागत करे।
तँय काल के भी गाल मा,हाँसत सदा चुम्बन धरे ।।

माँ भारती के लाल तँय, तोला नमन सत  सत हवे।
झुक के तिरंगा मान दय,  माथा हिमालय के नवे।।
चाहे रहौं मँय मत रहौं, सिरमौर ये भारत रहे।
ये विश्व गुरु भारत हरे, सँसार ला तँय हर कहे।।

होके अटल अविचल रहे, विपदा घलो मा नइ टले।
मँय हार नइ माँनव कभू ,ये गीत तँय गावत चले।।
कवि तोर कस कोमल हृदय,दृढ़ता रहे चट्टान कस।
नेता बने बेदाग  अउ,  तँय देश के पहिचान हस।।

बड़का करे सँसार मा ,तँय हर धरा के मान ला।
अउ बोल निज भाखा बनाये, देश के पहिचान ला।।
हर कंठ तोरे शब्द हे ,कविता सकल जग गात हे।
धरके अपन कोरा तको, माटी घलो ममहात हे।।

विपदा सहे, पीड़ा पिये, तब ले अटल धीरज धरे।
हर पल जिए तँय देश बर, तनमन अपन अर्पित करे।।
सुकुवा सहीं आगास मा, हावे अटल अब नाम हे।
हे पोखरण के बीर तोला आखरी परणाम  हे।।


हरिगीतिका: बरसा

सब जीव मन तडफत हवे, व्याकुल हवे संसार हा।
अब ताप मा तन मन जरय, आगी बरत हे खार हा।
तरिया सबे अब अउटगे, अउ खेत मन परिया परे।
तँय भेज दे अब नेवता, घन मेघ ला धरती तरे।

बरखा बने बरसे तभे, होही फसल हर धान के।
हम काम कर दे हन अपन, अब आसरा भगवान के।
नाँगर चले, जाँगर चले, बादर चले तब काम के।
सब खेत ला जोतत हवन, अब हम भरोसा राम के।

हरिगीतिका :बेंदरा आ के सहर

सब जानवर बेघर करे, जंगल तहीं , हा काट के।
कब्जा करे जंगल घलो,नरवा नदी ला  पाट के।
तँय नास दे पर्यावरण, गरहन लगाए छाँव मा।
हाथी तको,बघवा घलो , वन छोड़ आ थे गाँव मा।1


अब बेंदरा ,आ के शहर, उत्पात करथे टोरथे।
वो आदमी के मुड़ मा चढ़ नाचथे झकझोरथे।
हम पूँछथन, भगवान ले ,ये का तमाशा रोज के।
जब भूख लागे पेट मा,खाथे सबेेझन खोज के।


जंगल कहाँ हरियर हवे, चारा घलो पाही कहाँ।
तँय घर उजारे हस उखर, सब जीव मन जाही कहाँ।
अब जानवर मन तोर घर, आथे बचाये प्रान ला।
रोथस तभो तँय देख के , अपने अपन नुकसान ला ।


करनी अपन ,अब भोगबे , रोबे तहूँ पछताय के।
 जब भूख लगही पेट मा ,पाबे नहीँ कुछु खाय के।
टोटा सुखाही प्यास मा, पाबे पिये पानी नहीँ।
तँय सोच ले ,जंगल बिना, अब तोर जिनगानी नहीं।



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