जमे जमाय बिराना पड़थे।रीता कर रितियाना पड़थे।जोड़े कतको गोटी माटी,छोड़ सबो ला जाना पड़थे।खोंदरा नवां बनाना पड़थे ।खोज के दाना खाना पड़थे।ये जिनगी ले जतका लेबे,करजा जमो चुकाना पड़थे।वोखर बुलाय आना पड़थे।अपन करम सोरियाना पड़थे।का बोये हँव काटे परही ,सुरता कर पछताना पड़थे।निभय नहीं त निभामा पड़थे ।अचरा मा गठियाना पड़थे।मया ह माँगे मिलय नहीं जी,जोहत जिनगी बिताना पड़थे।
मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के
- मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
- कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
- नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
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छोड़ सबो ला जाना पड़थे।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
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रविवार, अप्रैल 21, 2024
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गीत : फोकट खाये के चक्कर म
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।
लालच मा पर के जनता हा, होवत हवे अलाल।
मिहनत के अब खून पछीना, नइ पावत हे मान।
लम्पट मन सब अटियावत हे, महल अटारी तान।
ठलहा बइठे जीभ चलइया, ऊंचा पीढ़ा पाय।
मिहनत के देवता ह रोवय, बइठे मुड़ ठठाय।
रोजी रोटी नोहर होगे, सिरिफ चलत हे गाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।
कर्जा ले ले घीव पियत हे, सुख भोगे भरपूर।
भावी पीढ़ी के सपना हर, होही चकनाचूर।
राजनीति सौखी मारत हे, फेंक कोडहा देख।
मछरी मन के भाग म मरना, लिखत विधाता लेख।
आँखी राहत अँधरा हो के, देखत नइ हन जाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।
कागज मा छम छम नाचत हे, सबो योजना खूब।
गाँव गली बस पहुँचे नारा, धन हर जाथे डूब।
भ्रष्टाचार ह सड़क बनाथे, बइमानी हर पूल।
वादा के का मरजादा हे, पल मा जाथे भूल।
तभे कोलिहा सत्ता पाथे, रेंग टेडगा चाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।
छत्तीसगढ़ी व्यंग्य : तँय पढ़ा,तँय पढ़ा तँय पढ़ा गुरूजी ।
तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।अब कोनो रहय झन अड़हा गुरूजी।तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।एक-एक कक्षा, सौ-सौ लइका,फेर हर लइका ल ज्ञान दे।का व्यवस्था हे का बेवस्था ,एला तँय झन धियान दे।तोरे भरोसा हे कइसनो कर फेर,तहीं ह जोखा मढ़ा गुरूजी।तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।जेन लइका स्कूल नइ आवय,ओला स्कूल म लाने ला परही।नीति हे शासन के चाहे बिन चाहे,तोला सबो ला माने ला परही ।सीखय भले झन, फेर साक्षर कहाही ,नाँव ला रजिस्टर म चढ़ा गुरूजी।तँय पढ़ा,तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।फोकट म सबला,सब कुछ चाही,नवाँ जमाना के इही लोकतंत्र ये ।चलनी म चाल फेर रजगा झन निकाल,सस्ता लोकप्रियता के इही मूलमंत्र ये।खिंच-तान अउ ढकेल-पेल फेर,सबो ल आगु बढ़ा गुरूजी।तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।न बने बिजहा,न उपजाऊ भुइयां,न बने खातू ,न हवा पानी ।परही तुतारी, तुही ल रे बइला,तोरे भरोसा होही किसानी ।भले भूख मरबे नइ पाबे चारा,फेर फसल रहय झन कड़हा गुरूजी ।तँय पढ़ा,तँय पढ़ा तँय पढ़ा गुरूजी ।मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद'ग्राम-कोलिहा ,लवन बलौदाबाजार ( छ० ग०)
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विष्णुपद छन्द : ए अभिमानी गरब करे का, ये माटी तन के
ए अभिमानी गरब करे का, ये माटी तन के।
माटी मा मिलही ये चोला, सब माटी बन के।1।
काल लिखे हे अपन कलम मा, मरना सब झन के।
महुँ मिटाहूँ तहूँ मिताबे , पाट दिही खन के।2।
माटी गोटी जोर जोर के, बनगे महल बने।
छोड़ छाड़ के जाना परही, रोवत मने मने।3
पल भर के हेे ये जग मेला, छिन भर तोर मया।
सब चल देही छोड़ एक दिन, लागे नही दया।4।
कोनो सँग मा नइ जावय जी, अब मत समय गवाँ।
मिलखी मारत भूल जही सब, मिलही मीत नवाँ ।5।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
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गुरुवार, अगस्त 23, 2018
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