2122 2122 2122रोज करथे आजकल अखबार चर्चा।गाँव घर होवत गली अउ खार चर्चा।भूखे ला रोटी नहीं पव्वा घरा दे,काम खोजत झन करै बनिहार चर्चा।झन नवाँ माथा न अत्याचार सह तँय,हक के खातिर कर ले बारम्बार चर्चा।वो फलाना सँग फलानी भाग गे हे,गाँव भर माते हवय जी मार चर्चा।कान मा ठेठा हवे झन बोलबे तँय,नइ सुनय जी काखरो दरबार चर्चा ।चुप हवय सिधवा भले, डरपोक नइ हे,बोलही तब हो जही सरकार चर्चा।मेरखू फ़ोकट कथे आवास दे दे,बिन कमीशन बंद हे बेकार चर्चा।तब कलम लड़थे इहाँ मजबूर हो के,हार जाथे जब करत तलवार चर्चा।चल घुमा दे ना शहर पिज़्ज़ा खवा दे,छी दई ये रात दिन के टार चर्चा।प्यार के दु बोल मिट्ठी बोल अब तो,सुन मया हे तब सुहाथे सार चर्चा।
मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के
- मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
- कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
- नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
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गजल : तोर चर्चा
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
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रविवार, मई 18, 2025
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गजल : हमला तो मयखाना चाही।
नित नवां बहाना चाही।
हमला तो मयखाना चाही।
अब चुनाव मा सब दल मिलके
पव्वा रोज पियाना चाही ।
तुमन कमाहूं पाँच साल जी,
हमला फ़ोकट खाना चाही।
वादा के हे काय भरोसा,
सोच समझ गुठियाना चाही।
रतिहा मँय सपना देखे हँव,
हरहा ला हर्जाना चाही।
आंख रहत जे बन गे अन्धरा,
वो मनखे मर जाना चाही।
डिस्पोजल हर मुड़ मा चढ़गे,
अब 'प्रसाद' घर जाना चाही।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
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गुरुवार, अप्रैल 11, 2024
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मथुरा प्रसाद वर्मा
गजल : हर पँछी ला दाना चाही।
जइसे भी हो आना चाही।
हर पँछी ला दाना चाही।
ये सरकारी हुकुम हे खच्चित,
फांदा मा फँद जाना चाही।
लोकतंत्र के खुले खजाना,
देश भले लूट जाना चाही।
ये धरती मा जनम धरे हन्,
भाग अपन सगराना चाही।
बस स्कूल म नाँव लिखादिन,
पास सबो हो जाना चाही।
रेचका मेचका हगरु पदरू,
पढ़ लिख गे पद पाना चाही।
अस्पताल बर लइन लगावव,
हमला तो मयखाना चाही।
रिस्तेदारी बहुत निभा देन,
सब ल अपन घर जाना चाही।
हमर मया के कोन पुछारी।
सँगी ला सब भाना चाही।
टूट जथे सब दिन के सपना,
नींद घलो तो आना चाही।
मया करे अउ आँशु पाय,
अउ का तोला खजाना चाही।
फेर सँगी के सुरता आ गे,
चल प्रसाद अब गाना चाही।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
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बुधवार, अप्रैल 10, 2024
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