मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

मेरी फ़ोटो
कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
मुक्तक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मुक्तक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

छत्तीसगढ़ी

नदियाँ तीर रहिथव फेर मँय हा प्यासा आँव,
मोर मयारू मँय जन जन के आसा आँव,
अपने घर मा काबर हँव निर्वासित मँय,
छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़ी भासा आँव।


कहाँ नदावत हम सब के चिन्हारी हा।
ये छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी हा।
कइसे परबुधिया होगे सब लइका मन,
मार डरिस हमसब ला लाचारी हा।

पियासे मन ला मधुरस कस ये बोर दिही।
अपन बनाही बैरी के बल टोर दिही।
छत्तीसगढ़ी भाखा अतेक मयारू हे,
मोर बनकोयली हिरदे म रस घोर दिही।


शिक्षा दीक्षा सबला ज्ञान अंजोर दिही।
सरल सुगम सुंदर भाखा हे सोर दिही।
उही ल अब मँय राज दुहु छत्तीसगढ़ के,
मोला छत्तीसगढ़ी भाखा मोर दिही।
x

मुक्तक

पाँव भले हो फोरा हाथ ह छिल जाही।
मोर करम के रोटी मोला मिल जाही।
मौसम चाहे कतको टेडगा चाल चलय,
जेन फूल ला खिलना होही, खिल जाही।

छत्तीसगढ़ी मुक्तक

कोनो तोला कतको बोलय,हर काम ल टाले कर।
मतलब अपन निकाले खातिर,हाँसी मुख मा पाले कर।
तँय कतका गुनवन्ता होथस,ये तो सब झन जानत हन,
तोला कुछु करना ही नइ हे, गलती मोर निकाले कर।

छोड़ सबो ला जाना पड़थे।




जमे जमाय बिराना पड़थे।
रीता कर रितियाना पड़थे।
जोड़े कतको गोटी माटी,
छोड़ सबो ला जाना पड़थे।

खोंदरा नवां बनाना पड़थे ।
खोज के दाना खाना पड़थे।
ये जिनगी ले जतका लेबे,
करजा जमो चुकाना पड़थे।

वोखर बुलाय आना पड़थे।
अपन करम सोरियाना पड़थे।
का बोये हँव काटे परही ,
सुरता कर पछताना पड़थे।

निभय नहीं त निभामा पड़थे ।
अचरा मा गठियाना पड़थे।
मया ह माँगे मिलय नहीं जी,
जोहत जिनगी बिताना पड़थे।

छत्तीसगढिया शायरी




बहुत अभिमान मँय करथँव
                     छत्तीसगढ़ के माटी मा ।
मोर अंतस जुड़ा जाथे
                    बटकी भर के बासी मा।
ये माटी नो हय महतारी ये
                         एखर मान तुम करव 
बइला आन के चरतथे
                    काबर  हमर बारी मा ।।



मय तोरे नाँव लेहुँ
                   तोर गीत  गा के मर  जाहूँ ।।
जे तँय इनकार कर देबे
                      कुछु खा के मर जाहूँ।।
अब तो लगथे ये जी हा जाही
                      संगी  तोरे  मया मा;
 कहूँ इकरार कर लेबे
                     त मँय पगला के मर जाहूँ।।


ये कइसे पथरा दिल ले
                 मँय हा काबर प्यार कर डारेव ।। 
जे दिल ला टोर के कहिथे
                  का अतियाचार कर डारेव ।।
नइ जानिस वो बैरी हा
                     कभू हिरदय के पीरा ला
 जेकर मया मा जिनगी ला
                     मँय अपन ख़्वार कर डारेव।।


मोर घर म देवारी के
                  दिया दिनरात जलते फेर।।
महूँ ल देख के कोनो
                  अभी तक हाथ मलत फेर।।
  मैं तोरे नाव  ले ले के
                  अभी तक प्यासा बइठे हौ
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर  
                       बादर बरसथे फेर।।

महू तरसे  हँव तोरे बर
                  तहुँ ला तरसे ला परही।।
 मँय कतका दुरिहा रेंगे हँव
                 तहूँ ला सरके ला परही।।
मँय तोरे नाँव के चातक
                अभी ले प्यासा बइठे हँव,
तड़प मोर प्यास  मा  होही
               त तोला बरसे ला परही।

मोर घर छितका कुरिया अऊ,
                  तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ,
                   मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भर पेट नई खावस,
                  महु भर पेट नई खावव 
तोर अब भूख नई लागय,
              मोर करा जुच्छा थारी हे ।


ओखर हक मा नइ आवय फूल, 
                          जे  काँटा आन बर बोंही।
के दिनभर  हाँसही चाहे, 
                          कलेचुप साँझ के  रो ही।
पीरा ला देख के कखरो , 
                            कभू तँय झन हाँसे कर ,
आज मोर साथ होवत हे, 
                        काली तोर साथ मा हो ही। 

      
नसा  नस-नस मा समागे, आज के समाज के ।
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।




रूपमाला : मुक्तक


रूपमाला : छन्द विधान

( 2122  2122  , 2122 21)× 4

तोर बिन ये जिंदगानी, हे कुलुप अँधियार।
मोर जम्मो साधना ला, तँय करे साकार।।
मँय उहाँ तक जा सकत हँव, हाथ थामे तोर।
एक धरती हा सिराथे, जब छितिज के छोर।।

तँय बढ़ा के मोह माया लूट ले हस चैन।
मँय खड़े हँव राह देखत, हे थके अब नैन।।
का लगा के रोग चल दे, तँय मया के यार।
आदमी मँय काम के अब, हो घलें बेकार।।
आदमी अच्छा भला मँय , हो घलें बेकार।।

कैद होगे आज बचपन, अउ जवानी मोर।
होत हे काबर अकेल्ला, अब बुढापा तोर।।
कोन घर मा बाँध देथे , खींच के दीवार।
आज मोबाइल तको तो, बाँटथे परिवार।।

हे शरद के पूर्णिमा मा, चंद्रमा   हर गोल।
आज चंदा हा धरे हे , रूप जी अनमोल।।
हे जगत के जीव मन बर,मोहनी कस रात।
ओस बन के आज अमरित, बरसथे बरसात।।

सांस मोरे जब जुड़ाए, तोर अचरा पाँव।
जब जनम लौं मँय दुबारा, तोर ममता छाँव।।
मोर दाई  तोर बर मँय, हाँस के दँव प्रान।
हम रहन या मत रहन वो, तोर बाढ़य मान।।

तोर सुरता अब बही रे, नैन बर बरसात।
ढेंकना कस सोय दसना, चाबथे दिन रात।।
तँय करे चानी करेजा , साथ छोड़े मोर।
मँय उही रद्दा म करथौं , अब अगोरा तोर।।

आज तक देखव न सपना, यार तोरे बाद।
मँय मया बर काकरो अब , नइ करँव फरियाद।।
तोर सुरता ला सजाके,पूजथौं दिनरात।
रोज करथे मोर कविता, तोर ले अब बात।।

मन भटकथे रे मरुस्थल, नइ मिलय अब छाँव।
खोजथौं मँय बावरा बन, अब मया के गाँव।।
डगमगाथे मोहनी रे, मोर अब विस्वास।
कोन जाने कब बुताही, मोर मन के प्यास।।

तोर खातिर मोर जोड़ी, कोन पारा जाँव।
कोन तोरे घर बताही, कौन तोरे नाँव।।
तँय बतादे सावरी रे, मोर सपना सार।
कोन होही मोर सोये, नींद के रखवार।।

जोगनी बन जेन लड़थे, रात भर अँधियार।
वो बिहिनिया मान जाथे, रोशनी ले हार।।
कोंन जाने कब सिराही,देश मा संग्राम।
रार ठाने हे भरत हा, रोय राजा राम।।

गाँव देथे तब सहर हर, पेट भरथे रोज।
गाँव हर बनिहार होगे, सहर राजा भोज।।
गाँव सिधवा मोर हावे, अउ शहर मक्कार ।
आदमी के खून चूसे, रोज ये बाजार।।


हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।
भीख नइ माँगन कभू हम हन भले बनिहार।।
हम कमाबो टोर जाँगर ,दे अपन ये प्राण।
हाथ धर छेनी हथौड़ी , देश बर निर्माण।।

साँझ दे के आन ला मँय हर बिसाथव घाम।
साँस चलही मोर जब तक नइ करँव आराम।।
मँय किसानी ला करे बर लें उधारी तोर।
कोन कर्जा ला  चुकाही जान जाथे मोर।।
मँय किसानी छोड़ आगें अब सहर मा तोर।

मुड़ म बाँधे लाल पागा, डोकरा हरसाय।
आज नाती के बराती, बर बबा अघुवाय।।
हे कहाँ अब डोकरी हा, डोकरा गे भूल।
छोकरा बन अब गली मा, बाँटथे जी फूल।।

पाँख होतिस मँय उड़ाके , आँव तोरे पास।
मोर मन के भावना हा, खोजथे आगास।।
तँय चले गे मोर जोड़ी,छोड़ के परदेश।
मोर चोला हा तरसथे , पाय बर सन्देश।।

रूप अइसन हे सजाए, सालहो सिंगार।
लान दे ना डोकरी बर, डोकरा तँय हार।।
हे रचाए हाथ मेहदी, अउ महावर पाँव।
ओठ में लाली लगा के,घूमे सारा गाँव।।

जान जाए फेर मोला, देश खातिर आज।
बात अइसन बोलना हे, खोल ले आवाज।।
बाद मा बइरी ल होही, जे सजा तँय यार।
देश के गद्दार मन ला, आज गोली मार।।

जेन थारी खाय छेदय, अब उही ला लोग।
जेल मा हे फेर भोगे, रोज छप्पन भोग।
कोन हे आतंकवादी, मन घलो के साथ।
खोज के वो लोग मनला, आज कातव हाथ।

मोर माटी ला  उही मन, नइ  लगावै माथ।
जेन बैरी के मितानी, बर करत हे घात।
साँप बन के लील देथे, देश के सुख चैन।
अब गटारन खेलबो रे, हेर उखरे नैन।

तोर खातिर मोर जोड़ी, कोन पारा जाँव।
कोन तोरे घर बताही, कौन तोरे नाँव।
तँय बतादे सावरी रे, मोर सपना सार।
कोन होही मोर सोये, नींद के रखवार।

छोड़ दे तँय आलसी ला, बात सुनले मोर।
मेहनत के संग आही,गाँव मा अब भोर।
हमन शिक्षा  जोत घर घर,चल जलाबो यार।
लोग लइका हमर पढ़ के, बन जही हुसियार।

गाँव मोरो आज होतिस, सब डहर खुशहाल।
अब किसानी मा कमाई, होय सालोसाल।
चाहिये ना गाँव ला जी, काकरो उपकार।
बस फसल के मोल दे दय, अब बने सरकार।

गाँव देथे तब सहर हा , पेट भरथे रोज।
फेर मोटाके बने फिरथे ,अपन राजाभोज।
गाँव सिधवा मोर हावे, अउ शहर मक्कार ।
खून पी के हाड़ चूसे, रोज ये बाजार।

आज तक पाँवव न सपना देख तोरे बाद।
अब मया बर काकरो मँय , नइ करँव फरियाद।
तोर सुरता ला सजाके,देखथौं दिनरात।
रोज करथे मोर कविता, तोर ले अब बात।

मन भटकथे रे मरुस्थल, नइ मिलय अब छाँव।
खोजथौं रे बावरा बन, मँय मया के गाँव।
डगमगाथे मोहनी रे, मोर अब विस्वास।
कोन जाने कब बुताही, मोर मन के प्यास।


तोर सुरता रोज आथे, फेर तँय नइ आय।
मोर जिनगी खेत परिया, अउ घटा तरसाय।
का करव मय यार कइसे, तोर ले हो बात।
रोज बदली हर घुमड़थे, होय ना बरसात ।

आ जथे चुपचाप भीतर , याद हा अब तोर।
पा जथे सुनसान खोली, कस करेजा मोर।
तोर पीरा सालथे रे, घाव ला जब मोर।
मेट के मँय फेर लिखथव, नाँव ला तब तोर।

खींच लानिस तीर सबला , तोर सुरता आज।
तोर सुग्घर गीत कविता, मोहनी आवाज।
कोन कहिथे तँय चलेगे, छोड़ के संसार।
गीत तोरे ले जही तोला समय के पार।1।

जेन ला रखवार राखन, हे उही मन चोर।
कोन जाने आज कइसे, गाँव आही भोर ?
(कोन जाने अब कहाँ ले, गाँव आही भोर)
पेज पसिया बर लड़त हम, जिन्दगी भर रोन ।
(पेट के खातिर तको अब, कब तलक हम रोन।)
मोर बाँटा के अँजोरी , लेग जाथे कोन ?

मुक्तक : राम के चर्चा

1222  1222 1222 1222

न तोरो  नाम के चर्चा, न मोरो  काम के चर्चा।
दुनो झन बइठ के करबो, चलो अब घाम के चर्चा।
इहाँ  तन कपकपावत  हे, त भूर्री बार के बइठी,
रहन दे आज तो सँगी, रहीम अउ राम के चर्चा।





रूपमाला छन्द

you tube में सुने
साँस मोरे जब जुड़ावय, तोर अचरा पाँव।
जब जनम लँव मँय दुबारा, तोर ममता छाँव।
मोर दाई  तोर बर हम , हाँस के दँन प्रान।
हम रहन या मत रहन वो, तोर बाढ़य मान।


जान जाए फेर मोला, देश खातिर आज।
बात अइसन बोलना हे, खोल ले आवाज।
बाद मा बइरी ल देबोे , जे सजा हम यार।
देश के गद्दार मन ला, आज गोली मार।



तोर सुरता अब बही रे, नैन बर बरसात।
ढेंकना कस सोय दसना, चाबथे दिन रात।
तँय करे चानी करेजा , साथ छोड़े मोर।
मँय उही रद्दा म करथौं , अब अगोरा तोर।



आज तक देखव न सपना, यार तोरे बाद।
मँय मया बर काकरो अब , नइ करँव फरियाद।
तोर सुरता ला सजा के,पूजथौं दिनरात।
रोज करथे मोर कविता, तोर ले अब बात।



मन भटकथे रे मरुस्थल, नइ मिलय अब छाँव।
खोजथौं मँय बावरा बन, अब मया के गाँव।
डगमगाथे मोहनी रे, मोर अब विस्वास।
कोन जाने कब बुताही, मोर मन के प्यास।



तोर खातिर मोर जोड़ी, कोन पारा जाँव।
कोन तोरे घर बताही, कौन तोरे नाँव।
तँय बतादे सावरी रे, मोर सपना सार।
कोन होही मोर सोये, नींद के रखवार।

तोर बिन ये जिंदगानी, हे कुलुप अँधियार।
मोर जम्मो साधना ला, तँय करे साकार।
मँय उहाँ तक जा सकत हँव, हाथ थामे तोर।
भूमि ले अगास मिलथे, जब छितिज के छोर।


जोगनी बन जेन लड़थे, रात भर अँधियार।
वो बिहिनिया मान जाथे, रोशनी ले हार।
कोंन जाने कब सिराही,देश मा संग्राम।
रार ठाने हे भरत हा, रोय राजा राम।


गाँव देथे तब सहर हर, पेट भरथे रोज।
गाँव हर बनिहार होगे, सहर राजा भोज।
गाँव सिधवा मोर हावे, अउ शहर मक्कार ।
आदमी के खून चूसे, रोज ये बाजार।


मोर गुरुवर के कृपा दे दिस हवे सद्ज्ञान।
मोह बँधना मा परे मँय, राह ले अनजान।
गुरु चरण मा मँय नवा के, राख दे हँव माथ।
भाग मोरो जाग गे हे, अब करम के साथ।

ये चरन मा राख मोला , तँय बढ़ाये मान।
रोज सेवा कर सकव मँय, तोर हे भगवान।
तँय बनाये  मोर माटी आदमी  के रूप।
पोठ करदे तँय पका के, ज्ञान के दे धूप।


आ जथे चुपचाप भीतर , याद हा अब तोर।
पा जथे सुनसान खोली, कस करेजा मोर।
तोर पीरा सालथे रे, घाव ला जब मोर।
मेट के मँय फेर लिखथव, नाँव ला तब तोर।

भीख नइ माँगय कभू भी आपले बनिहार।
हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।
हम कमाथन टोर जाँगर ,दे अपन मन प्राण।
हाथ मा छेनी हथौड़ी , देश नव  निर्माण।

कोन जनता के सुनत हे वोट दे के बाद।
बाढ़गे कांदी  भकाभक चूसथे सब खाद।
सब कमीशन  खात हे जी, बाँट के भरपूर।
चोर नेता भष्ट अफसर,न्याय चकनाचूर।

मोर हे शुभकामना हो , जिंदगी खुशहाल।
आपके सूरज सही मुख, होय लालेलाल।
मोंगरा कस तोर खुसबू आज हे ममहाय।
आज गुरुजी आप ला मोरो उमर लग जाय।

कोन सच के राज खोलय, चुप हवे संसार।
जेन जनता  बर लडत जी, पोठ खावय मार।
न्याय कारावास भोगय, हो जथे बीमार।
जब कलम मजबूर हो के, नाचथे दरबार।








गीतिका मुक्तक

हे खटारा फटफटी रे, अब सहारा तोर हे।
चार खरचा बाढ़ गे हे, कम कमाई मोर हे।।
रोज बाढ़े दाम काबर, कोंन जाने तेल के।
तँय चले सरकार जइसे, हम चलाथन पेल के।।

फूल जम्मो अब उजरगे, बाग सब वीरान हे।
लोग मन के लाज मरगे, गाँव भर समसान हे।।
मँय मया के बात बोलव, लोग बइरी हो जथे।
मोर रद्दा मा कलेचुप, को काँटा बो जाथे।।

काम करथन तोर मालिक, लोग लइका पालथन ।
तोर सुख बर अपन तन ला,घाम मा हम घालथन।।
माँग नइ पावन भले हक, पेट हमला टाँगथे।
मेहनत के बाद तन के ,भूख रोटी माँगथे।।

तोर माला तोर पोथी, राख ले तँय हाथ मा।
हम मया के बात करबो, लोग मन के साथ मा।
तँय धरम के नाँव ले के, बाँट डर संसार ला।
हम उठाबो खांद मा जी, अब सबो के भार ला।

प्रसाद के दोहा : मया


मया मरम जानय नहीं, मया मया चिचियाय।
पल भर मा जर के सहीं,  चढहे उतरे हाय। ।1।

काकर बर मैं राखहूँ, ये हिरदे सिपचाय।
बइरी  होंगे हे मया, जीय ल मोर जलाय।2।

मया परे तन हा जरय, मन प्यासे मर जाय।
तन  मन पैरावट सहीं, भितर भितर गुगवाय।3।

आँखी  काजर आँज के, लाली ओठ रँगाय।
रूप सजा के मोहनी , बिजुरी मन म गिराय।4।

संगी रे तोर  सुरता, जब जब मोला आय।
जिनगी  बोझा  कस लगे, सांस आय अउ जाय।।5।

कइसे होही का कहव ,  ये जिनगी हा पार।
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।6।

मन मिरगा संसार मा, भटकय खारे-खार।
मया  करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।7।

मथुरा प्रसाद वर्मा

मोर छत्तीसगढ़ मुक्तक






नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।



मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।
तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव ,
तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।




शायरी मोर छत्तीसगढ़ के

उखर हक फूल नइ आवय, जे काँटा आन बर बोंही।
के दिनभर  हाँसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही।
पिरा ला देख के ककरो , कभू तँय हाँस झन देबे, 
आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ मा हो ही।

वो मोला देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही।
प्रेम के फूल हा फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही।
भुलाये नइ सकय  कभू, एसो के होरी ला;
मया के रंग म रंग के , वो लाले लाल हो जाही।

तोर सुरता के गोटी हा गोड़ मा गड़ जाथे।
मया के पा के पंदोली  मुड़ मा चढ़ जाथे।
मँय सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर;
जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।

मया म मुँह ओथराबे, त तँय बीमार हो जाबे।
वोखर बर जान दे देबे,तँय अखबार हो जाबे।
पार मा बइठ के रोये ले कोंन ह पार पाये  हे;
उदिम कर तँय हा बुड़ जाबे या  वो पार  हो जाबे।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव 
तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

मुक्तक छत्तीसगढ़ी



                         1.
बहुत अभिमान मँय करथौं,छत्तीसगढ के माटी मा।
मोर अंतस जुड़ा जाथे, बटकी भर के बसी मा।
ये माटी नो हाय महतारी ये, एकर मान तुम करव 
बइला आन के चरथे, काबर  तुम्हर बारी मा।
                       2
मँय तोरे नाँव लेहुँ , तोरे गीत  गा के मर  जाहूं ।।जे तै इनकार कर देबे,  कुछु खा के मर जाहुं ।।अब तो लगथे ये जी हा जाही,संगी तोर मया मा,  
कहुँ हाँ कही देबे, त मय पगला के मर जाहुं ।।

                      3
ये कइसे पथरा दिल ले मँय हा काबर प्यार कर डारेंव ।। 
जे दिल ला टोर के कईथे,का अतियाचार कर डारेंव ।।
नइ जानिस वो बैरी हा, कभू हिरदे के पीरा ला, 
जेकर मया जिनगी ला,मँय अपन ख़्वार कर डारेंव।।

                     4
मोरो घर मा देवारी कस, दिया दिनरात जरत हे फेर।।
महूँ ला देख के कोनो,अभी ले हाथ मलत हे फेर।।
मँय तोरे नाँव  ले ले के, अभी ले प्यासे बइठे हौं
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर, बादर बरसत हे फेर।।

                    5

महूँ तरसे  हँव तोरे बर, तहुँ ला तरसे ला परही 
मय कतका दुरिहा रेंगे हौ,तहूँ ला सरके ला परही।।
मँय तोरे नाँव के चातक,अभी ले प्यासे बइठे हौं
तड़प मोर प्यास  मा  होही त तोला बरसे ला परही।
                   6
मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।
तोर घर रोज महफिल अऊ,मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहुँ भर पेट नइ खावस,महुँ भर पेट नइ खावव 
तोला अब भूख नइ लागय,,अउ मोर जुच्छा थारी हे ।

                          7 
कभू करथे दिल मोरो,  के मँय देवदास हो जातेंव।।
नई परतेंव तोर  चक्कर मा त कुछु ख़ास हो जातेंव।।
अगर होतिस सिलेबस मा,तोरे रूप के चर्चा;
ता एसो के परीक्षा मा ,महुँ हा पास हो जतेंव।।

                            8   

उही मा राजी ख़ुशी हे, जेला हम पा जाथन ।
प्यार से कोनो बलाथे, त हममन आ जाथन।
तुहीं मन राख लव , मया म तराजू धर के,
हम तो मुहब्बत म मलोवन,घलो बेचा जाथन।

                             9


तहीं हा टोर के बँधना मया के चल देथस।
कुँवर करेजा ला गोड़ मा मसल देथस।
मँय खड़े हावव अभी ले तोर अगोरा मा,
तीर मा आ के तँय हा बदल देथस।

मुक्तक

बहुत अभिमान मँय करथव, छत्तीसगढ़ के माटी मा।
मोर अन्तस जुड़ा जाथे बटकी भर के बासी मा।
ये माटी नो हय महतारी ये,एकर मान तुम करव,
ये बइला आन के चरथे, काबर हमर बारी मा।

मय तोरे नाव लेहूँ, तोरे गीत  गा के मर  जाहूं ।।
जे तँय इनकार कर देबे, त  कुछु खा के मर जाहुं ।
अब तो लगथे ये जी हा जाही संगी तोरे  मया मा
कहुँ इकरार कर लेबे, त मँय पगला के मर जाहुं ।।

ये कैइसे पथरादिल ले, मँय हा काबर प्यार कर डारेव ।
जे दिल ल तोर के कहिथे का अतियाचार कर डारेव।
नइ जनिस वो बैरी ह कभू हिरदे के पीरा ला,
जेकर मया मा जिनगी ला मँय अपन ख्वार कर डारेव।

मोर घर म देवारी के दिया दिनरात जलते फेर।
महूँ ल देख के कोनो अभी तक हाथ मलत फेर।
मैं तोरे नाव  ले ले अभी तक प्यासा बइठे हौ
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर  बादर बरसथे फेर।।
                    
महू तरसे हव तोरे बर, तहु ल तरसे ला परही।
मँय कतका दुरिहा रेंगे हँव,तहूँ ल सरके ला परही।
मँय तोरे नाव क चातक अभी ले प्यासा बइठे हौं,
तड़प मोर प्यास  म  होही त तोला बरसे बर परही।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।
तहु भर पेट नई खावस, महु भर पेट नई खावव,
तोर अब भूख नई लागय, मोर करा जुच्छा थारी हे ।

छत्तीसगढिया शायरी


नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।। 
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।। 
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।।



मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव 
तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

मार देही मोला,


मार देही मोला, फेर मि‍टा नई सकय
ए रद्दा ले कोनो, हटा नई  सकय
मया आंव संगी, हिरदे मा रहि जाहूं
मोर हस्‍ती ला कोनो, भूला नई सकय
मोर हाडा कठवा आय, भुंजा जाही फेर
आगी ले डेरा के कोनो, पिघला नई  सकय

विशिष्ट पोस्ट

रूपमाला छन्द

you tube में सुने साँस मोरे जब जुड़ावय, तोर अचरा पाँव। जब जनम लँव मँय दुबारा, तोर ममता छाँव। मोर दाई  तोर बर हम , हाँस के दँन प्र...