मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
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मत्तगयंद सवैया : माखनचोर

मत्तगयंद सवैया
 7 भगण(211) 2 गुरु
211 211 211 211 211 211 211 22


माखन ला घर के नइ खावय जा पर के घर चोर कहाथे।
दूध दही घर मोर भरे हड़िया हड़िया सब लोग नहाथे।
काय सखी मँय बात कहौ सब ग्वालन मोर करा अटियाथे ।
ये बिलवा किसना हर मोर गली घर गाँव म नाक कटाथे।


रोला छन्द

रोला छन्द - मथुरा प्रसाद वर्मा

जिनगी के दिन चार, बात ला मोरो सुनले।
माया ये संसार, हरे रे संगी गुन ले।
जोरे हस जे नाम, तोर माटी हो जाही।
तोरे धन भरमार, काम नइ कोनों आही।

बाँधे पथरा पेट, कभू  झन कोनों सोवय।
भूखन लाँघन लोग , कहूँ  मत लइका रोवय।
दे दे सब ला काम, सबों ला रोजी रोटी ।
किरपा कर भगवान, मिलय सब ला लंगोटी ।

नेता खेलय खेल, बजावय जनता ताली ।  
जरय पेट मा आग, खजाना होगे खाली ।
फोकट चाउर दार, बाँट के गाल बजावय। 
राजनीत हर आज , सबो ला पाठ पढ़ावय। 

धन बल कर अभिमान, आज झन मनखे नाचय ।
पर के घर ला लेस, छानही काकर बाँचय । 
काँटा बों के कोन , फूल ला भाग म पाथे  ।
अपन करम बोझ, सबे  हा इहे उठाथे ।

पर के आँशु पोंछ, हाँस के मन ला जोरय
खावय सब ला बाँट, मया रस बात म घोरय
मनखे उही महान, जेन परहित मर जाथे ।
पर दुख देखय रोय, उही सुख मन मा पाथे ।
   
जाँगर पेरय रोज, घाम मा तन ला घालय ।
जेखर बल परताप, काँप के पथरा के हालय ।
माथ बिपत के नाच, करम के गाना गाथे ,
उदिम करइया हाथ, भाग ला खुद सिरजाथे ।

जूता चप्पल मार, फेंक के वो मनखे ला। 
खन के गड्ढा पाट, चपक दे माटी ढेला।
जेन देश के खाय, उहे गद्दारी करथे।
चाटय बैरी पाँव, देश के चारी करथे।

रूपमाला छंद : मुक्तक


मोर गुरुवर के कृपा दे दिस हवे सद्ज्ञान।
मोह बँधना मा परे मँय, राह ले अनजान।
गुरु चरण मा मँय नवा के, राख दे हँव माथ।
भाग मोरो जाग गे हे, अब करम के साथ।।

मोर हे शुभकामना हो , जिंदगी खुशहाल।
आपके सूरज सही मुख, होय लालेलाल।
मोंगरा कस तोर खुसबू आज हे ममहाय
आज गुरुजी आप ला मोरो उमर लग जाय।

ये चरन मा राख मोला , तँय बढ़ाये मान।

रोज सेवा कर सकव मँय, तोर हे भगवान।
तँय बनाये  मोर माटी आदमी  के रूप।
पोठ करदे तँय पका के, ज्ञान के दे धूप।।

जान जाए फेर मोला, देश खातिर आज।

बात अइसन बोलना हे, खोल ले आवाज।।
बाद मा बइरी ल होही, जे सजा तँय यार।
देश के गद्दार मन ला, आज गोली मार।।

जेन थारी खाय छेदय, अब उही ला लोग।
जेल मा हे फेर भोगे, रोज छप्पन भोग।
कोन हे आतंकवादी, मन घलो के साथ।
खोज के वो लोग मनला, आज कातव हाथ।

मोर माटी ला  उही मन, नइ  लगावै माथ।
जेन बैरी के मितानी, बर करत हे घात।
साँप बन के लील देथे, देश के सुख चैन।
अब गटारन खेलबो रे, हेर उखरे नैन।

छोड़ दे तँय आलसी ला, बात सुनले मोर।
मेहनत के संग आही,गाँव मा अब भोर।
हमन शिक्षा  जोत घर घर,चल जलाबो यार।
लोग लइका हमर पढ़ के, बन जही हुसियार।



खींच लानिस तीर सबला , तोर सुरता आज।
तोर सुग्घर गीत कविता, मोहनी आवाज।
कोन कहिथे तँय चलेगे, छोड़ के संसार।
गीत तोरे ले जही तोला समय के पार।

भीख नइ माँगय कभू भी आपले बनिहार।
हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।
हम कमाथन टोर जाँगर ,दे अपन मन प्राण।
हाथ मा छेनी हथौड़ी , देश नव  निर्माण।


कोन जनता के सुनत हे वोट दे के बाद।
बाढ़गे कांदी  भकाभक चूसथे सब खाद।
सब कमीशन  खात हे जी, बाँट के भरपूर।
चोर नेता भष्ट अफसर,न्याय चकनाचूर।



कोन सच के राज खोलय, चुप हवे संसार।
जेन जनता  बर लडत जी, पोठ खावय मार।
न्याय कारावास भोगय, हो जथे बीमार।
जब कलम मजबूर हो के, नाचथे दरबार।



जेन ला रखवार राखन, हे उही मन चोर।
कोन जाने अब कहाँ ले, गाँव आही भोर।
पेज पसिया बर लड़त हम, जिन्दगी भर रोन ।
मोर बाँटा के अँजोरी , लेग जाथे कोन ?


जोगनी बन जेन लड़थे, रात भर अँधियार।
वो बिहिनिया मान जाथे, रोशनी ले हार।।
कोंन जाने कब सिराही,देश मा संग्राम।
रार ठाने हे भरत हा, रोय राजा राम।।

गाँव मोरो आज होतिस, सब डहर खुशहाल।
अब किसानी मा कमाई, होय सालोसाल।
चाहिये ना गाँव ला जी, काकरो उपकार।
 बस फसल के मोल दे दय, अब बने सरकार।

गाँव देथे तब सहर हर, पेट भरथे रोज।
गाँव हर बनिहार होगे, सहर राजा भोज।।
गाँव सिधवा मोर हावे, अउ शहर मक्कार ।
आदमी के खून चूसे, रोज ये दरबार ।।


हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।
भीख नइ माँगन कभू हम हन भले बनिहार।।
हम कमाबो टोर जाँगर ,दे अपन ये प्राण।
हाथ धर छेनी हथौड़ी , देश बर निर्माण।।


साँझ दे के आन ला मँय हर बिसाथव घाम।
साँस चलही मोर जब तक नइ करँव आराम।।    
ले किसानी छोंड़  के आ  सहर मा तोर। 
मँय किसानी ला करे बर लें उधारी तोर।
 ( कोन कर्जा ला चुकाही जान जाथे मोर।।)

     (  मँय किसानी छोड़ आ गें अब सहर मा तोर।)


हे शरद के पूर्णिमा मा, चंद्रमा   हर गोल।
आज चंदा हा धरे हे , रूप जी अनमोल।।
हे जगत के जीव मन बर,मोहनी कस रात।
ओस बन के आज अमरित, बरसथे बरसात।।


कैद होगे आज बचपन, अउ जवानी मोर।
होत हे काबर अकेल्ला, अब बुढापा तोर।।
कोन घर मा बाँध देथे , खींच के दीवार।
आज मोबाइल तको तो, बाँटथे परिवार।।

मुड़ म बाँधे लाल पागा, डोकरा हरसाय।
आज नाती के बराती, बर बबा अघुवाय।।
हे कहाँ अब डोकरी हा, डोकरा गे भूल।
छोकरा बन अब गली मा, बाँटथे जी फूल।।


रूप अइसन हे सजाए, सालहो सिंगार।
लान दे ना डोकरी बर, डोकरा तँय हार।।
हे रचाए हाथ मेहदी, अउ महावर पाँव।
ओठ में लाली लगा के,घूमे सारा गाँव।।

चौपई/ जयकारी छन्द: कोरोना


सुन लव भाई सुनव मितान 

मोर गोठ ला दे के ध्यान।

हे संकट मा सबके जान। 

आज मोर तँय कहना मान।


वाइरस एक कोरोना नाँव

 फैलत हवे  सहर अउ गाँव।

डर के मारे काँपय लोग। 

बन्द होत हे सब उद्योग।



सोसल मिडिया करे बखान। 

रोग ह भारी लेवय प्रान।

दुनियाँ भर हावे परशान

 खोजे मा नइ पाय निदान।


हमर परोसी चीन ह ताय। 

जेन जीव ला कच्चा खाय।

सांप बिछी तक चट कर जाय 

 इही रोग के कारन आय।


सुन के कोरोना के नाम 

आज जगत हर काँपय राम।

फैलावत कतको अफवाह।

 सुन लेवव बांचे के राह।


जर बुखार अउ खासी छींक। 

मुड़ पीरा नइ होवय ठीक।

साँस लेत मा लागे जोर। 

निमोनिया कस लक्षण तोर।


फेर डरे के नइ हे बात 

डर हर करथे जादा घात।

हिम्मत राखव मन मा जोर । 

इही ह प्रान बचाही तोर।


कोरोना के का उपचार। 

मार मचे हे हाहाकार।

दवा नही कोनो हर पाय 

सावधानी हर एक उपाय।


भीड़ भाड़ मा तुम मत जाव 

घर म रही के समय बिताव।

शाकाहारी खाना खाव। 

स्वच्छता ला तुम अपनाव ।


नही हवा मा फैलय रोग।

 वाइरस ल फैलाथे लोग।


हलो हाय के चलन ल छोड़।

 राम राम कर हाथ ल जोड ।


जाड़ नमी मा  ये हा भोगाय 

गर्मी म वाइरस मर जाय।


तेखर ले झन ठंडा खाव

 जाड़ा लगे उँहा झन जाव।


जेला सर्दी खासी आय 

छिक छिक के जी घबराय।


अपने हर झन करय उपाय

 अस्पताल तुरते ले जाय।


बार बार जे हाथ ल धोय 

साबुन लगा लगा के कोय।



साफ रहे नइ खतरा होय

 इही उपाय ला राख सँजोय।
https://youtu.be/w9iiY2FBId4

छत्तीसगढिया शायरी




बहुत अभिमान मँय करथँव
                     छत्तीसगढ़ के माटी मा ।
मोर अंतस जुड़ा जाथे
                    बटकी भर के बासी मा।
ये माटी नो हय महतारी ये
                         एखर मान तुम करव 
बइला आन के चरतथे
                    काबर  हमर बारी मा ।।



मय तोरे नाँव लेहुँ
                   तोर गीत  गा के मर  जाहूँ ।।
जे तँय इनकार कर देबे
                      कुछु खा के मर जाहूँ।।
अब तो लगथे ये जी हा जाही
                      संगी  तोरे  मया मा;
 कहूँ इकरार कर लेबे
                     त मँय पगला के मर जाहूँ।।


ये कइसे पथरा दिल ले
                 मँय हा काबर प्यार कर डारेव ।। 
जे दिल ला टोर के कहिथे
                  का अतियाचार कर डारेव ।।
नइ जानिस वो बैरी हा
                     कभू हिरदय के पीरा ला
 जेकर मया मा जिनगी ला
                     मँय अपन ख़्वार कर डारेव।।


मोर घर म देवारी के
                  दिया दिनरात जलते फेर।।
महूँ ल देख के कोनो
                  अभी तक हाथ मलत फेर।।
  मैं तोरे नाव  ले ले के
                  अभी तक प्यासा बइठे हौ
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर  
                       बादर बरसथे फेर।।

महू तरसे  हँव तोरे बर
                  तहुँ ला तरसे ला परही।।
 मँय कतका दुरिहा रेंगे हँव
                 तहूँ ला सरके ला परही।।
मँय तोरे नाँव के चातक
                अभी ले प्यासा बइठे हँव,
तड़प मोर प्यास  मा  होही
               त तोला बरसे ला परही।

मोर घर छितका कुरिया अऊ,
                  तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ,
                   मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भर पेट नई खावस,
                  महु भर पेट नई खावव 
तोर अब भूख नई लागय,
              मोर करा जुच्छा थारी हे ।


ओखर हक मा नइ आवय फूल, 
                          जे  काँटा आन बर बोंही।
के दिनभर  हाँसही चाहे, 
                          कलेचुप साँझ के  रो ही।
पीरा ला देख के कखरो , 
                            कभू तँय झन हाँसे कर ,
आज मोर साथ होवत हे, 
                        काली तोर साथ मा हो ही। 

      
नसा  नस-नस मा समागे, आज के समाज के ।
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।




प्रसाद के दोहा


काकर बर मैं राखहूँ, ये हिरदे सिपचाय।

बइरी होगे हे मया, जियरा मोर जराय।     

 

बँसरी हा मनमोहना, मन ला मोर लुभाय।

सुध-बुध तन के नइ रहय, हिरदय श्याम समाय।

 

गोरी गोरी राधिका, करिया किसना रुप।

राधा कान्हा के मया, जइसे जाड़ म धूप।

 

मोहन लबरा तँय हरस, तोर मया दिन चार।

तब ले तोरे आस मा, छोड़े हँव संसार।

 

तोर मया मा  मोहनी , माते हव दिनरात ।

दुनियाँ बइरी कस लगय, तोर लगय निक बात ।


सेल्फ़ी लेवत हे टुरी , मुँह ला अस बिचकाय ।

धर मोबाइल हाथ मा , अउ मुचुर मुचुर मुस्काय ।

 

आँखी काजर आँज के, लाली ओठ लगाय।

रूप सजा के मोहनी, बिजुरी मन मा गिराय।

 

माँगत माँगत तोर ले , लगय नहीं अब लाज ।

देने वाला हस तहीं , देवत हस महराज ।

 

लोभी कामी मन तको, बने पुजेरी आज ।

करम करय वो कइसनो , हमर बनय महराज ।

 

लोकतंत्र मा वोट के महिमा अपरंपार ।

बेचारा जनता बने , मजा करय सरकार ।


बिन पइसा के आप ला, मिलय नहीं अब मान ।

दु कौड़ी के भाव मा , बेचावत इनसान ।

 

हो जही मोर देश मा, सबके कष्ट निदान।  

भ्रष्टाचारी बर चलय, हाथ सफइ अभियान ।

 

काकर घर के साग ला, काकर घर अमराय ।

माली भर भर के मया, बाँट बाँट सब खाय ।

 

साँप बिछी तज दय जहर, पा जाए  सत्संग।

कपटी मन छोड़य नहीं, अपन कपट के रंग ।

 

जिनगी ला मँय का कहँव, जइसे नदिया धार।

थकने वाला डूब गे, तउरिस जे वो पार।


बिरथा मानुस के जनम, हे बिन मया दुलार।

प्यार बिना संसार मा, जीना हे बेकार।

 

आप अतिथि हो हमर, हम बड़ भागी आज।

पा के संगत आपके, गदगद संत समाज।

 

मन के हारे हार हे, मन के जीते जीत।

मन के गठरी बाँध ले, मिल जाही मनमीत।


पर धन अउ पर नार बर, जेखर मन करुवाय।

मरही रे अनदेखना,  दाग नहीं ये जाय।

 

अचरा दाई के हरय, मोर मया के खान।

उन्ना होए नइ कभू, जब जब माँगन पान।

 

जब ले तोरे नाँव ले, जुड़ गे हे मोर नाँव।

घर भर लागे पर सहीं, बइरी होगे गाँव।

 

जग बर होथे लेखनी, निज दुख पीरा टार।

कवि के रोना हाँसना, गुस्सा अउ व्यवहार।

 

जात धरम जानय नहीं, भूख खाय सब चाँट ।

मया करइया मन कभू, करय न बारा बाँट ।

 

करु करेला गोठ हे, लीम सहीं व्यवहार।

अटियाथस काबर मुरख, बाँचे हे दिन चार।

 

रद्दा मा देखत चलव, गिरे परे इनसान।

मदद करे ले बाँचथे, मानवता के प्रान।

 

काँटा बों के आन बर, फूल कोन हर पाय।

दया मया मन मा रखव, जिनगी भर ममहाय।

 

खाँचा पर बर झन खनव, कैर कपट दव त्याग।

कोन बइरी लूटही, जेन लिखे हे भाग।

 

डर के नँव झन गोड़ मा, बढ़ही अत्याचार।  

मर मर के जीना तको, जिनगी भर धिक्कार।


काँटा खन खन रेंगहूँ, देहूँ बाँट चतवार।

ताल ठोंक ललकार हे, सावधान दरबार।

 

शाला मा तारा लगे, मदिरालय आबाद।

बैपारी राजा बने, पीढ़ी एक बरबाद।

 

मिरगा बन बन मा फिरय, भटक भटक मर जाय।

ये मन मूरख तँय कहाँ, गली गली छुछुवाय।

 

चानी आमा के भला, जे बन जाय अथान।

बटकी भर बासी घलो, देथे जीवनदान।

 

बिन गेरुवा के गरू, रइचर बिन खलिहान।

बैपारी राजा बने कोन बने, कोन बचाही प्रान।

 

आखर दू आखर लिखव, सत् बर तज दव प्रान।

कलम बिकय झन जी कभू, भले जाय जी जान।

 

लबरी घर के का बरी, अउ लबरा के दार।

थूक म लाडू बाँध के, बन जाथे सरकार।

 

काँटा बों के आन बर, फूल कोन हर पाय।

पर बर जे खाँचा खनय, खुद गिर के मर जाय।

 

अँगना लीप बहार के, पाछू चुल्हा बार।

घर भर मधुरस घोरथे, मिठ बोली बेवहार।


नारायन हे तार कस, वीर कोन अउ आन।

भूखे जनता बर तहीं, लड़ लड़ के दे प्रान।

 

जे भूइयाँ मा तोर कस, जनम धरे संतान।

तोरे सँग होगे अमर, माटी सोनाखान।

 

जुरमिल बइरी ले भिड़व, मत माँनव जी हार।

माँगे ले हक नइ मिलय, जोर करे अधिकार।


 गिरथे उठथे रेंगथे, बिना थके कर काम।

नदिया के धारा सहीं, सागर तक अविराम।

 

जलधारा के जोर ले, हो जाथे मजबूर।

बड़े बड़े पाहार कस, बाधा चकनाचूर।

 

परमारथ बर जिन्दगी, जे करथे कुर्बान।

जी जाथे मर के घलो, मनखे उही महान।

 

जिनगी ओखर हे सफल, जे नइ मानय हार।

गिर गिर के उठ उठ जथे, दउड़य पल्ला मार।

 

मरना माँ बर बीर के, बिरथा कभू न जाय।

माटी माटी मा मिलय, महर महर ममहाय।

 

मोती माथा ले चुहय, मिहनत करय किसान।

बदला जाँगर के तभे धरती देथे धान।

 

ढेकी होगे जिन्दगी, ये तन बहना ताय।

जब तक बहना धान हे, तब तक कूटत जाय।

 

चुल्हा माटी के हमर, धर भर बर जर जाय।

पेट जरय झन काकरो, मालिक करव उपाय।


छेना लकड़ी नइ बरय, चुल्हा हर कुहराय।

कलकलहीन बहुरिया, सुख घर के बर जाय।

 

सबला देथे राँध के, सुग्घर मन हरसाय।

चुल्हा तक हर हाँसथे, नारी जब मुस्काय।


आगी चुल्हा मा बरे, घर भर हर सकलाय।

डबकत चाहा संग मा,  सबके मया बँधाय।

 

ये दुनियाँ मेला हरे, मिलथे कतको लोग।

मन मा कोनो बस जथे, लगा मया के रोग।

 

माँगे ले मिटथे गरब, बाँटे बड़थे मान।

छेरछेरा म तो तभे, माँगत हे भगवान।

 

रोज छेरछेरा इँहा, जनता माँगे खाय ।

नेता मन दानी बने, दे दे के इतराय। 

 

दाई चुल्हा गोरसी, छेना लकड़ी बार।

घर के सुन्ता झन बरय, सुखी रहय सँसार।

 

जब घर के सुन्ता फुटय, मुड़ धर रोय सियान।

भाई भाई लड़ मरय, तिरिया चरित महान।

 

जल के तँय मछरी हरस, हे चंचल मन तोर।

मया जाल मँय मारहूँ, हँव केवट चितचोर।

 

जात पात मानय नहीं, सत के महिमा गाय।

पावन जेखर आचरन, वो सतनामी आय।

 

नशापान ला बँद करव, माँसाहार ल त्याग।

ज्ञान मान गुरु के सबो, अपन जगावव भाग।

 

बैरी आधु झन नवव, झन बेंचव सनमान।

सत के खातिर लड़ मरव, भले जाय जी प्रान।

 

अमरौतिन के लाल तँय, मँहगू के संतान ।

जनम धरे सतकाज बर, बाँटे सत के ज्ञान।

 

जैतखाम सत बर खड़े, धजा सेत लहराय।

हर घर बाबा के भगत, पंथी नाँचय गाय।

 

सत के पथ ला छोड़ के, जपत हँवन सतनाम।

गुरु ज्ञान ल त्याग के, फिरथन झंडा थाम ।   

 

कपट करे मा साधना, अउ लालच मा त्याग।

भोग करे महिमा घटय, मोह मया बैराग।

 

सत बर देथे प्रान ला, तप बर त्यागे भोग।

साधक बाबा के सरल, जिनगी उँखर जोग।

 

चमत्कार तो ज्ञान हे, जे बाबा बगराय।

ठगनी जग ठगता फिरय, निज स्वारथ बिलमाय।

 

गुगल बाबा हे गजब, खोज जिनिस सब लाय।

कोन बेबसाइट कहाँ, का का करय बताय।

 

मजेदार यूट्यूब हे, विडियो के भरमार।

बइठ अपन घर देख ले, पल भर मा संसार।


सुग्घर हे विकिपीडीया, भरे ज्ञान भंडार।

सब भाखा सब विषय मा, मिलही तोला सार।

 

पनिहिरिन मन घाट मा, सुख दुख ला गोहराय।

ट्विटर म घलो वइसने, चहल पहल सकलाय।

 

नेट रेट हा बाढ़ गे, सर्वर होगे लेट।

गेट गेट मा वेट हे, काकर भरबो पेट।

 

दिन भर नाचय अँगरी, रंगमंच कीबोड ।

मेमोरी कतको बढ़ा, डेटा ओवरलोड।

 

रिस्ता नाता नेट मा, मया मयारू गोठ।

सोसलमिडिया मा जुरे, बतियावत हे गोठ।

 

इंटरनेट रँईछँई, दुनियाँ भर बगराय।

जइसे जाला मेकरा, भितर भितर लपटाय।

 

एम एस आफिस मा सरल, सब दफतर के काम।

पढ़ना लिखना पोछना, सबे काम आराम ।

 

चोर चोर के साथ हे, गठबंधन भरपूर।

लड़ लड़ के रखवार मन, होवत चकनाचूर।

 

बिरथा हे सत बोलना, नादानी सतकाज।

झूठ लबारी के चलय, सिक्का अब महराज।

 

दिल्ली के दरबार हे, सब दिन उखरे साथ।

धनबल सब के जोर ले, लाठी जेखर हाथ।

 

रोटी सबदिन भूख ले, खेले अलकर खेल।  

आरी पारी पेट मा, आए जाए रेल।

 

पहिली गुरु के वंदना, करत हँवव कर जोर।

साधक के सब साधना, चरन मा अर्पित तोर।

 

धरम जात के नाँव ले, कट कट मरथे लोग।

मस्त हमर चलते रहय, लोकतंत्र उद्योग।

 

चमचा चाँदी के चलय, चमकत चारो ओर,

करम कमाई हाथ के, खा गय करिया चोर।

विशिष्ट पोस्ट

रूपमाला छन्द

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