मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
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गीत : गाड़ी आही जब टेसन मा सबला चढ़ के जाना हे।





ये दुनियाँ  इक गाड़ी टेशन,
पल दु पल सुस्ताना हे।
गाड़ी आही जब टेशन मा,
सब ला चढ़ के जाना हे।

 


कोन रहे बर आय इहाँ हे,
काकर इहाँ ठिकाना हे।
गाड़ी आही जब टेशन मा,
सब ला चढ़ के जाना हे।

 


अपन करम के गठरी बाँधे,
रद्दा खर्ची राख बने।
खीसा  टमरय घेरी बेरी, 
टमर टमर के फेर गने।

 


कतको मन हर ब्याकुल हावे, 
डर मा चोर लुटेरा के।
ताकत हावय  घड़ी ल कतको
गाड़ी आये बेरा के।

 


टिकिस कटा के करत अगोरा,
भीड़ इहाँ मनमाना हे।
गाड़ी आही जब टेशन मा,
सब ला चढ़ के जाना हे।

 


ककरो ककरो रिजर्वेशन हे,
स्लीपर ऐसी कोच म।
वेटिंग वाले टिकिट धरे हे,
कतको हे परे सोच मा।

 


जनरल वाला धक्का खा खा
खड़े खड़े पछताही।
जेकर जइसे करम कमाई,
सीट ल वइसन पाही।

 


कतको झन हा बिना टिकिट के,
जाही करत बहाना हे।

 




गीत : अउ कतका अखबार पढ़ौ ।


पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ ।
मन ला अतका भटकावत हे, काकर काकर सार पढ़ौ।

पढ़े लिखे मन निज स्वारथ मा, मानवता नीलाम करे।
जहर उगावय ये भुइयाँ मा, देश धरम बदनाम करे।
जात पात के भेद भाव ला, बगरावत दरबार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

खावत हावय मनखे ला अब, रक्सा हर महंगाई के।
पाई पाई खातिर होगे, बैरी भाई भाई के।
काकर गरदन कोन काटही, तानत हे तलवार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ ।


अप्पड़ मनखे जांगर पेरे, मिहनत के ये घानी मा।
सींच सींच के रोज पसीना,करजा लुवव किसानी मा।
सत्ता के सँग फुगड़ी खेलत, फलत फुलत बैपार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ ।

बबा ह कहिथे मनखे पढ़लिख, हो जाथे हुसियार बने।
सीख जथे सिधवा मनखे तक, चुहके बर कुसियार बने।
महुँ बने बर रस चुहकइया, बन जावव सरकार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

सड़क तिरन के खेत बेचागे, सुनथव कीमत भारी हे,
सहर लिलत हे हमर गांव ला, रुख राई तीर आरी हे।
बेजा कब्जा भूमि माफिया, माते हाहाकार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

सतवंता हर फाँसी चढ़गे, फेर मिलही अब न्याय कहाँ।
कोट कचहरी पुलिस दरोगा, खोजय चारा पाय कहाँ।
लहू सनाये बेवस्था मा, मँय कतका चीत्कार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

गीत : फोकट खाये के चक्कर म


फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।
लालच मा पर के जनता हा, होवत हवे अलाल।

मिहनत के अब खून पछीना, नइ पावत हे मान।
लम्पट मन सब अटियावत हे, महल अटारी तान।
ठलहा बइठे जीभ चलइया, ऊंचा  पीढ़ा पाय।
मिहनत के देवता ह रोवय, बइठे मुड़ ठठाय।

रोजी रोटी नोहर होगे, सिरिफ चलत हे गाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।

कर्जा ले ले घीव पियत हे, सुख भोगे भरपूर।
भावी पीढ़ी के सपना हर, होही चकनाचूर।
राजनीति सौखी मारत हे, फेंक कोडहा  देख।
मछरी मन के भाग म मरना, लिखत विधाता लेख।

आँखी राहत अँधरा हो के, देखत नइ हन जाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।

कागज मा छम छम नाचत हे, सबो योजना खूब।
गाँव गली बस पहुँचे नारा,  धन हर जाथे डूब।
भ्रष्टाचार ह सड़क बनाथे, बइमानी हर पूल।
वादा के का मरजादा हे, पल मा जाथे भूल।

तभे कोलिहा सत्ता पाथे, रेंग टेडगा चाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।

प्रेरणा गीत : जीत उही ला मिलथे संगी।


जीत उही ला मिलथे संगी, थकय नइ जे हार के।
चलव, रुकव-झन हार मान तुम, मँजिल कहे पुकार के।



भागत- दउडत गिर जाथे जी, बने-बने ह खसल के ।
गिर के कोनो  नइ गिर जाये,  जे उठ जाय सम्हल के ।
नानकुन चांटी चढ़ जाथे;  माथा मा  पहाड़  के ।
चलव, रुकव झन ................

खुन्दा खुन्दा के पाँव तरी, जे माटी ह सनाथे ।
हड़िया बन के उही एकदिन, सबके प्यास बुझाथे ।
माटी सहीं सहे ला परथे;  पीरा ये सँसार के ।
चलव, रुकव झन .......

अन्न उपजाथे मिहिनत कर के, पर के कोठी भरथे।
अपन भुखन लाँघन रह के, भूख आन के हरथे।
सूरज ला जे रोज जगाथे, भिनसरहा मुंधियार के।
चलव, रुकव झन .......

दिन के सपना नइ सोवन दय, जे दिनरात जगाथे।
जे सपना के खातिर जागय, रद्दा नवाँ बनाथे।
कहाँ टिके हे बन के बाधा, जलधार पतवार के।
चलव, रुकव झन .......


अक्षर के सँग करौ मितानी, पढ़ लिख भाग जगावव।
सरग बना दव ये दुनिया ला, उजियारा बगरावव।
नवाँ बिहिनिया  आही रख दव, रद्दा ल चतवार के।
चलव, रुकव झन .......

दु गीत मया के गावन दे।


दू गीत मया के गावन दे।
 दू गीत मया के गावन दे।


एक गीत यार जवानी के 
जिनगी के प्यार कहानी के।
एक गीत अमर बलिदानी बर।
लहू डबकात जे रवानी बर।

बिरवा मँय बोयें जिनगी भर, 
अब फूल सहीं ममहावन दे।

सब मीत मोर सब सँगवारी।
जावत हावे आरी पारी।
कब मोर बुलावा आ जाही।
कब साँस कहाँ थीरा जाही।

जब बोझ साँस के ढोवत हँव,
मन के मनमीत सुनावन दे।

कतको जाही कतको आही।
कवि अपन पिरा ल गोहराही।
ये दुनिया आनीजानी ये ।
जिनगी के इही कहानी ये।

ये रंगमंच मा आज महुँ ला,
रस घोरन दे बरसावन दे।









एक जंग अभी तक जारी है।

 जंग अभी तक जारी है।


इस दौर में भी, इस हाल में भी।
इस लड़खड़ाती चाल में भी।
लड़ना तो फिर भी पड़ता है, 
घिर कर संकट काल में भी।

दिल में जब तक चिंगारी है।
एक जंग अभी तक जारी है।


बैरी है बलवान तो क्या?
छुपा हुआ पहचान तो क्या?
हतास नहीं, निराश नहीं, 
मजबूर हुआ इन्सान तो क्या?

अभी हार कहाँ हमने माना,
क्या हुआ कि कुछ लाचारी है।

एक जंग अभी तक जारी है।

घुटनों पर हूँ, पर गिरा नहीं।
मुश्किल में हूँ, पर घिरा नहीं।
चल चल चल अभी चलना है, 
हूँ दूर बहुत, पर फिरा नहीं।

मंजिल तक जाना है मुझको,
कोई बात नहीं दुस्वारी है।

एक जंग अभी तक जारी है।


है सांस जहां तक दौडूंगा।
उम्मीद नहीं मैं छोडूंगा। 
जीवन है जीना ही होगा,
मैं डर कर मुँह न मोडूंगा।

कुछ लेना है कुछ देना है,
ले चुकाने दे जो उधारी है।

एक जंग अभी तक जारी है।


सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।



सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

सुवा करमा अउ ददरिया,   पण्डवानी अउ जसगीत हे।
किस्सा कहानी आनी-बानी ,कतका मया पिरित हे ।
मुँह म ये रस घोरत रहिथे, जइसे मीठ बतासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारू,  छत्तीसगढ़ी भासा हे।

हमर ये महतारी भासा , हमर गरब गुमान ये।
जे अप्पड़ के भासा कहिथे, वो सिरतोन वो नदान ये।
हम तो सीना ठोक के कहिथन, इही परान के आसा हे।
सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

सारी दुनियाँ  अपने भासा, मा करथे  सब काम जी।
लिखथे -पढ़ते अपने भासा,  करथे जग मा नाम जी।
हमर राज बर छत्तीसगढ़ी, इही हमर अभिलासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

बड़े-बड़े गुनी गियानी मन, साहित्य ला सिरजाये हे।
दुनियां भर म एकर मया के, झंडा ल फहराये हे।
अपने घर म तभो ले काबर, रही जाथे ये  पियासा य
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

स्कूल कालेज, कोट- कचहरी, छत्तीसगढ़ी बोलव जी।
विधानसभा के दुवारी ल, महतारी बर खोलव जी।
बैरी मन ह खेल करत हे, जस  सकुनी के पासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

हमर राज ला हमी  चलाबो,  रद्दा नांवा गड़बो जी।
हमरो विकास होही जब हम,  अपने भासा पढ़बो जी।
परबुधिया मन काय समझही, का तोला  का मासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

लड़े ब परही त लड़ जाबो , छत्तीसगढ़ महतारी बर।
मरे बर परही त मर जाबो, अपने घर अउ दुवारी बर।
हमरे राज मा हमी भिखारी, बस अतके हतासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु ,छत्तीसगढ़ी भासा हे।


 

गीत : मोर सुरता आही।

आही आही आही वोला मोर सुरता आही।

मोर मयारू बहाना बना के बलाही।
आही आही आही वोला मोर सुरता आही।
गाना गा गा के बइहा हा  सीटी बजाही।
आही आही आही  वोला मोर सुरता आही।

खाना खाही चाबत चाबत जीभ हा चबही।
पानी पियत देख लेबे फट ले अटक जाही।
कव्वा बोलत छान्ही मा सुध मोर लमाही।
रतिहा भर जाग जाग दिन मा उँघाही।
बइठे बइठे घर भीतरी मोबाइल दबाही
आही आही आही वोला मोर सुरता आही।

के दिन ले मयारू सँगी मोर ले रिसाही।
बिन बोले मोर मन ला कतका जलाही।
अनबोलना अउ कतका मोला सतही।
कतको जतन कर ले बैरी कइसे बिस्राही।
आही आही आही वोला मोर सुरता आही।

संझा बिहना भँवरा मोर गली मा आथे
आती जाती मोला देख देख मुस्कुराथे।
देख देख देख मोला हपत के गिर जाथे।
मुहाटी म साइकिल के चैन चढाथे।
मोर सुरता हा सुरता के नार ल लमाही।
आही आही आहौ वोला मोर सुरता आही। 

लावणी छन्द : खिच के लवड़ी मार कका।









 

हद ले जादा बाढ़त हावय, निस दिन अत्याचार कका।

मुड़ी नवाँ के करन मजूरी, तब ले खाथन मार कका।

ललकारे के बेरा आगे, छोड़ अभी जोहार कका।

जे बैरी हा उतलँग करथे, खिच के लवड़ी मार कका।

 

छतरी कुल के कुलदीपक हम, बड़े बड़े निपटाए हन।

अब का होगेे काकर डर मा, बइठे मुहूं लुकाए हन।

जबले छुटगे हमर हाथ ले, मुरचा खावत धार काका।

पजा डार अब बेरा आगे, कहाँ करे तलवार कका।

 

लक्ष्मीबाई नाम सुने हन, झाँसी वाली रानी के।

हक के खातिर लड़ के मरगे, पूत उही बलिदानी के।

बरछी भाला गिरवी धर के, बन गे हन बनिहार कका।

फेर मान ला नइ बेचे हन, बिक गे खेती खार कका।

 

वीर शिवाजी के गाथा ला, अब ले नहीं भुलाए हन।

हमी समर मा रार मचा के, लहू धार बोहाये हन।

हमर लहू का पानी होगे,  जाँगर खाय दियार कका।

करै कोलिहा मन हर कइसे, बघवा ऊपर वार कका।

 

परबुधिया बन कब तक रहिबो , गँवा अपन चिन्हार कका।

गाँव गली घर पर के कब्जा, हमन सिरिफ रखवार कका।

हमर बाट ला छेकत हावय,  बगरन्डा भरमार कका ।

काँटा खूंटी काट काट के , बाट अपन चत्वार कका।

गीत : छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया, दुनियाँ ला ये बताना  हे ।
आधा  पेट  खा  के  रे  संगी, जाँगर  टोर कमाना हे ।
सोना-चाँदी, हीरा-मोती, इहाँ के धुर्रा माटी हे !
तभो ले शोषित दलित गरीबहा, छत्तीसगढ़ के वासी हे ।
रतिहा पहागे अब तो संगी .. नवा बिहनिया लाना हे ।
आधा पेट .....................
खेत हमर कागद हे अऊ, कलम हमर बर नाँगर हे ।
हरियर-हरियर धान हमर करम के उज्जर आखर हे ।
कौनो रहय अब अनपढ़ झन, पढ़ना अऊ पढ़ाना हे ।
आधा पेट ..........................
जागे-जागे रहना हे सँगी करना हे देश के रखवारी ।
बन रखवार करत हे बैरी मन हा घर घर मा चोरी ।
बेंच दिही लालच मा आ के , इंखर  का ठिकाना हे  ।
घर मा लुकाये चोर मन ले मोर छत्तीसगढ़ ला बचाना हे।
मथुरा प्रसाद वर्मा

गीतिका छन्द गीत : आदमी के सामने का , आदमी का हारही ?


तँय डराके अब बिपत ले, बइठ झन मन मार के।
मुड़ नवा के काय जीबे, काय पाबे हार के।
आदमी के सामने का आदमी हा हारही।
जेन दे हे जिंदगानी , वो मुसीबत टारही।

तोर बल है साथ तोरे, कर करम कर जोर के।
चल तहूँ बन के नदी कस, पाँव बाधा तोर के।
तोर हिम्मत के रहत ले, कोंन बल फुफकारही।
कोंन हे बलवान अतका , जेन तोला मारही।

छाँव के तँय आस झन कर, घाम सब देही गला।
तोर तन के खर पछिना,नाप देही ताप ला।
हाथ मा थामे हथोड़ा, जेन कस के मारही।
देखबे पथरा घलो हा, मार खा चित्कारही।

अब जुलुम के जोर नइ हे, कर बगावत जीत ले।
जोर के तँय खांद जुड़ जा, तोर साथी मीत ले।
डोल जाही रे सिहासन , गाँठ कतको पारही।
अब जुलमी के रियासत, मेहनत हर बारही।

गीतिका छन्द गीत : आदमी ला चाहिए जी,आदमी बन के रहय।

लूट हक के देख चुप हे, सब सहय मन मार के।
हार मानय बिन लड़े ये, बात हे धिक्कार के।।
जान जावय पर डराके, अब गुलामी झन सहय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।

खार चुप हे खेत चुप हे, चुप सबे बनिहार हे।
कारखाना का हरे बस, लूट के भरमार हे।।
अब किसानी छोड़ काबर लोग मजदूरी करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।

कोंन फोकट काय देथे, माँग मत कर जोर के।
स्वाभिमानी काम करथे, रोज जाँगर टोर के।।
चार रोटी बर कुकुर कस, अब गुलामी झन करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।

हाथ हावे काम बर ता,बाँध के का राखना।
हक अपन ला पाय बर भी, पर तरफ का ताकना।
अब बगावत नइ करे ता,कोड़िहा जाँगर सरय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।

बल करइया  हारथे जी, जीत हिम्मत पा जथे।
हौसला के सामने मा, बल घलो गिधिया जथे।।
का मरे के बाद होही, जेन करना अब करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।

छत्तीसगढ़िया सेर।

भीख झन मांगव, अब तो जागव, होवत हे अंधेर।
अब मुँह फाडव, अउ दहाड़व, छत्तीसगढ़िया सेर।


बिल्होरे हे मिठलबरा मन, खेलत हावय खेल।
ऊंच पदबी अपने मन पाथे, दे के हमका ढकेल।


हमन चुगली-चारी करथन, अपने मन बर कैराही ।
हमन जुठा पतरी चाटन , वो मन रसगुल्ला खाही।


देर होतिस त कुछू नई कहितेन, होवत हे अंधेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व , छत्तीसगढ़िया सेर।


हमरे जंगल, हमरे भुंइया , तब ले हमीं भिखारी।
हम होगेन जोतनहा बइला , वो मन धरे तुतारी।


हमरे राज ले हमरे पलायन ,छुटत घर अउ दुवारी।
हमी बन गेन निच्चट कुटहा, खाथन उंकर गारी।


कुआँ खनव जी अब सुनता के, सुमत के टेरा टेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व, छत्तीसगढ़िया सेर।


हमरे गाँव, सहर हे हमरे, हमरे घर अउ दुवारी।
हमरे भाखा संस्कृति अब , खोजत हे चिन्हारी।


हमरे मन्दिर देवता धामी, वोमन बने पुजारी।
हमरे मुड़ मा हमरे पनही, उंकर सोनहा थारी।


सुते रहव झन बेसुध हो के, देखव नजर ल फेर।
अब मुँह फाड़व , अउ दहाड़व ,छत्तीसगढ़िया सेर।


वो मन साहूकार बने हे, नेता अउ बैपारी।
धन बल सब हो गे उखर, हमर जिनगी उधारी।


सोन चिरईया,धानकटोरा ,छत्तीसगढ़ महतारी,
ओकर बेटा धरे कटोरा, छी कैसे लाचारी।


क्रांति के कुकरा बासन दे , चढ़ के अब मुंडेर।
अब मुँह खोलव, अउ दहाड़व, छत्तीसगढ़िया सेर।

मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


सब भासा ले मीठ मयारू,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


सुवा करमा अउ ददरिया, 
      पण्डवानी अउ जसगीत हे।


किस्सा कहानी आनी-बानी ,
      मया अउ पिरित हे ।


मुँह म ये रस घोरत रहिथे,
ये ह मीठ बतासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारू ,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



दाई के कोरा ले सीखे हवन,
       ये हमर गरब गुमान हे।
जे अप्पड़ के भासा समझे,
       सिरतोन वो नादान  हे।



हम तो सीना ठोक के कहिथन,
इही परान के आसा हे।

सब भासा ले मीठ मयारू,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



जम्मो राज म अपने भासा म,
       होवत हे सब काम जी।
लिखथे -पढ़ते अपने भासा म,
       करथे जग म नाम जी।



हमर राज बर छत्तीसगढ़ी,
इही हमर अभिलासा हे।


सब भासा ले मीठ मयारु
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


बड़े- बड़े गुनी गियानी मन,
सहित एकर सिरजाये हे।

दुनियां भर म एकर मया के,
झंडा ल फहराये हे।


अपने घर म तभो ले काबर,
रही जाथे ये ह पियासा हे

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा ये।



इस्कूल कालेज , कोट- कचहरी म,
छत्तीसगढ़ी बोलव जी।
विधानसभा के दुवारी ल,
महतारी बर खोलव जी।



बैरी मन ह खेल खेलत हे,
जस  सकुनी के पासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा ये।



हमर राज ल हमी  चलाबो,
नवा रद्दा अब गड़बो रे।
तभे  हमर बिकास होही।
जब अपन भासा म पढ़बो रे।



परबुधिया मन काय समझही,
का तोला  का मासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



लड़े बर परही त लड़बो,
छत्तीसगढ़ महतारी बर।
मरे बर परही त मर जाबो,
अपन घर अउ दुवारी बर।



हमरे राज म हमी भिखारी,
बस अतके हतासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु ,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


प्रेम गीत: जिनगी सरहा पताल होगे


जिनगी सरहा पताल होगे।
तोर मया जी के जंजाल होगे।


छुटगे जम्मो सँगी-सँगवारी ,
घर मा  घलो बारा हाल होगे।

नइ  बाँचव मँय हा हाय ददा ।
ये बोकरा फोकट हलाल होगे।


उत्ती बुड़ती रात-दिन तोर सुरता
हिरदे मा ये का भूचाल होगे।


जबरन मँय देखेव तोर सपना
गाँव भर मा फोकट बवाल होगे।



जेन दिन बिहिनियां तोला देखव
मोर बर उही नावाँ साल होगे।

 जेन हा  सिरतोन मया मा लुटगे, 
'प्रसाद' उही  मालामाल होगे।



का रे कारी, कारी नैना हा तोर !!




का रे कारी, कारी नैना हा तोर ।
अइसे मारे बान, जीव ल लेवत हे मोर ।

घर ले जब निकलथव, रुक रुक के चलथव ।
कतको सम्हलथव , मँय तभो ले हपटथव ।
खचवाँ डिपरा दिखय नहीं, दिखथे चेहरा तोर ।
 का रे   कारी, कारी नैना हा तोर ---

काबर तँय इतराथस, मोला देख के बिजराथस !
मोर तीर नइ बोलस अउ पर सँग बतियाथस !
मर जाँहु अइसे झन दाँत ला निपोर ।
का रे कारी,  कारी  नैना हा  तोर ---

झाँक ले न मन भीतर, सूरत मा झन जा।
अपन बना ले मोला, रानी मोर बन जा।
दिया बार कर दे ना जिनगी मा अंजोर---








प्रेरणा गीत : जीत उही ला मिलथे संगी

जीत उही ला मिलथे संगी,
                   नई थके जेन हार के
चलव, रुकव झन,हार मान तुम , 
                   मंजिल कहे पुकार के !

भागत- दउडत गिर जाथे जी,
                     बने-बने हा खसल के !
गिरे ले कौनो नइ गिर जाये,
                  जे उठ जाथे समहल के !

नानकुन चांटी चढ़ जाथे ; 
                      मुड मा  पहाड़  के   !
चलव, रुकव ................

गोंड  मा पर  के जे माटी  ह,
                    खूंदा-खूंदा  के सनाथे !
एक  दिन उही हड़िया बन, 
                मनखे  के प्यास  बुझाथे !


मांटी सही सहे ला परथे; 
                         पीर ला संसार के !!
चलव, रुकव ................

अपन भूखन लांघन रही के ,
                       पर के पेट ला भरथे !
पईयां लागव  मैं  किसान के,
                जे घाम, जाड सब सहिथे !


सूरज ले पहली उठ जाथे;
                   भिंसरहा मुन्धियार  के !
चलव, रुकव ................

हो गेहे रे मन मोर बावरा हो गेहे !!

हो गेहे  रे ..........
मन मोर बावरा 
 हो गेहे !!
खो गेहे रे .......
गांव के गली मा
खो गे हे !

गांव के माटी जैसे चन्दन !
झूमे तन मोर ,नाचे मन !

मन  आके मगन इन्हाँ  हो गे हे !!

बाइला के घंटी घन-घन,घन-घन  !
चूहे माथा के पसीना जैसे कुंदन !!

घटा करिया सघन इंहा हो गे हे !!

खेत खर हरियाली छाही जी
घर घर माँ खुशिहाली आही जी

देखो करिया गगन हो गे हे !!

खपरा ले चूहे मोती छन-छन  !
नरवा नदिया के चढ़ गे यौवन !

धरती के बदन धो गे हे !!

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया





छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया , दुनियां ला ये बताना हे !
आधा पेट खा के रे संगी जांगर टोर कमाना हे !
सोना-चाँदी, हिरा-मोती इंहां के धुर्रा माटी हे !
तभो ले शोषित दलित गरीबहा छत्तीसगढ़ के वासी हे !
रतिहा पहागे अब तो संगी .. नवा बिहनिया लाना हे !
आधा पेट .....................

खेत हमर कागद हे अऊ, कलम हमर बर नांगर हे
हरियर-हरियर धान हमर करम के उज्जर आखर हे !
कौनो रहय अब अनपढ़ झन , पढ़ना अऊ पढ़ाना हे !
आधा पेट ..........................

जगे जगे रहिना हे संगी करना हे देश के रखवारी
रखवार बन के करते वो मन घर घर माँ चोरी !
बेंच दिही लालच में आ के इंकार का ठिकाना हे
घर माँ लुकाये चोर मन ले मोर छत्तीसगढ़ ला बचाना हे!
आधा पेट ..........................

मोर छत्तीसगढ़ के भुइयां

मोर धरती मोर मईयां, मोर छत्तीसगढ़ के भुइयां।
तोर बेटा आन दाई वो, परत हन तोर पईयां ।

तोर कोरा मा हमन दाई, आये हवन वो ।
बड भागी आन माया  पाए हवन वो ।

हमर जिनगी नइया के तँय हर खेवइया  ।
तोर बेटा आन दाई वो, परत हन तोर पईयां ।

महानदी के इन्हां बोहत हे अमृत कस पानी ।
कलकल करय इंदिरावती गाये  गुरुतुर बनी ।

अरपा-पैरी, शिवनाथ, हसदो तोर गोड़ धोवइया
तोर बेटा आन दाई वो ,  परत हन  तोर पईयां ।

जुल मिल के जम्मो झंन  तोर कोरा मा रहिथन ।
तहीं हां सब के महतारी , तोरे गुण ला गाथन ।

तोर रक्षा खातिर दाई हम अपन जान देवइया 
तोर बेटा आन दाई वो, परत हन  तोर पईयां ।



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