मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,

छत्तीसगढिया शायरी




बहुत अभिमान मँय करथँव
                     छत्तीसगढ़ के माटी मा ।
मोर अंतस जुड़ा जाथे
                    बटकी भर के बासी मा।
ये माटी नो हय महतारी ये
                         एखर मान तुम करव 
बइला आन के चरतथे
                    काबर  हमर बारी मा ।।



मय तोरे नाँव लेहुँ
                   तोर गीत  गा के मर  जाहूँ ।।
जे तँय इनकार कर देबे
                      कुछु खा के मर जाहूँ।।
अब तो लगथे ये जी हा जाही
                      संगी  तोरे  मया मा;
 कहूँ इकरार कर लेबे
                     त मँय पगला के मर जाहूँ।।


ये कइसे पथरा दिल ले
                 मँय हा काबर प्यार कर डारेव ।। 
जे दिल ला टोर के कहिथे
                  का अतियाचार कर डारेव ।।
नइ जानिस वो बैरी हा
                     कभू हिरदय के पीरा ला
 जेकर मया मा जिनगी ला
                     मँय अपन ख़्वार कर डारेव।।


मोर घर म देवारी के
                  दिया दिनरात जलते फेर।।
महूँ ल देख के कोनो
                  अभी तक हाथ मलत फेर।।
  मैं तोरे नाव  ले ले के
                  अभी तक प्यासा बइठे हौ
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर  
                       बादर बरसथे फेर।।

महू तरसे  हँव तोरे बर
                  तहुँ ला तरसे ला परही।।
 मँय कतका दुरिहा रेंगे हँव
                 तहूँ ला सरके ला परही।।
मँय तोरे नाँव के चातक
                अभी ले प्यासा बइठे हँव,
तड़प मोर प्यास  मा  होही
               त तोला बरसे ला परही।

मोर घर छितका कुरिया अऊ,
                  तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ,
                   मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भर पेट नई खावस,
                  महु भर पेट नई खावव 
तोर अब भूख नई लागय,
              मोर करा जुच्छा थारी हे ।


ओखर हक मा नइ आवय फूल, 
                          जे  काँटा आन बर बोंही।
के दिनभर  हाँसही चाहे, 
                          कलेचुप साँझ के  रो ही।
पीरा ला देख के कखरो , 
                            कभू तँय झन हाँसे कर ,
आज मोर साथ होवत हे, 
                        काली तोर साथ मा हो ही। 

      
नसा  नस-नस मा समागे, आज के समाज के ।
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।




उल्लाला




बिनती सुन से मोर प्रभु, करबे तँय उद्धार जी।
पालन हारी जान के, आए हँव मँय द्वार जी।

नहीं नहीं कोई कहे, कोई दय दुत्कार जी।
माँग माँग के जिन्दगी, लगही बेड़ापार जी।

सुन्दर तोरे सुन्दरी, रुप रंग अउ चाल वो।
माते हाँवव देख के, होगे हँव कंगाल वो।

मूरख तन के का गरब, बिरथा एखर प्रीत जी।
माटी माटी मा मिलय, इही जगत के रीत जी।

माटी महतरी सहीं, सहिथे सबके भार ला।
कोन जगत मा छूटही, ममता के उपकार ला।

माटी होगे रे इहाँ, बड़े बड़े बलवान मन।
का संगी धन के गरब, का ले गे इंसान मन।

मनखे मनखे एक हे, छोट बड़े न कोय रे।
फल तोला मिलही उही, जइसन बिजहा बोंय रे।  

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कीमत मनखे के कहाँ, महिमा पइसा के जिहाँ।
मानवता ह नँदात हे, मनखे मनखे खात हे।

जंगल के सब जानवर, हे बस गे आ के सहर।
पछतावत मन मार के, जंगल जमो उजार के।

जहर हवा मा धोरथे, भट्ठी मा सब जोरथे
ये नेता मन टोरथेअपने बने बटोरथे।

आघु पाछु वो डोल के, अउ जनता ला तोल के।
बेंचत हे बिनमोल के, खावत हे सब झोल के।

मोर गाँव के डोकरा, अउ सँग मा छोकरा।
मार मार के बोकरा, सब खावत हे वो करा।

तिवरा भाजी राँध के,  भउजी भेजय बाँध के।
भइया खावय चाँट के, मया बरोबर बाँट के।

प्रसाद के दोहा


काकर बर मैं राखहूँ, ये हिरदे सिपचाय।

बइरी होगे हे मया, जियरा मोर जराय।     

 

बँसरी हा मनमोहना, मन ला मोर लुभाय।

सुध-बुध तन के नइ रहय, हिरदय श्याम समाय।

 

गोरी गोरी राधिका, करिया किसना रुप।

राधा कान्हा के मया, जइसे जाड़ म धूप।

 

मोहन लबरा तँय हरस, तोर मया दिन चार।

तब ले तोरे आस मा, छोड़े हँव संसार।

 

तोर मया मा  मोहनी , माते हव दिनरात ।

दुनियाँ बइरी कस लगय, तोर लगय निक बात ।


सेल्फ़ी लेवत हे टुरी , मुँह ला अस बिचकाय ।

धर मोबाइल हाथ मा , अउ मुचुर मुचुर मुस्काय ।

 

आँखी काजर आँज के, लाली ओठ लगाय।

रूप सजा के मोहनी, बिजुरी मन मा गिराय।

 

माँगत माँगत तोर ले , लगय नहीं अब लाज ।

देने वाला हस तहीं , देवत हस महराज ।

 

लोभी कामी मन तको, बने पुजेरी आज ।

करम करय वो कइसनो , हमर बनय महराज ।

 

लोकतंत्र मा वोट के महिमा अपरंपार ।

बेचारा जनता बने , मजा करय सरकार ।


बिन पइसा के आप ला, मिलय नहीं अब मान ।

दु कौड़ी के भाव मा , बेचावत इनसान ।

 

हो जही मोर देश मा, सबके कष्ट निदान।  

भ्रष्टाचारी बर चलय, हाथ सफइ अभियान ।

 

काकर घर के साग ला, काकर घर अमराय ।

माली भर भर के मया, बाँट बाँट सब खाय ।

 

साँप बिछी तज दय जहर, पा जाए  सत्संग।

कपटी मन छोड़य नहीं, अपन कपट के रंग ।

 

जिनगी ला मँय का कहँव, जइसे नदिया धार।

थकने वाला डूब गे, तउरिस जे वो पार।


बिरथा मानुस के जनम, हे बिन मया दुलार।

प्यार बिना संसार मा, जीना हे बेकार।

 

आप अतिथि हो हमर, हम बड़ भागी आज।

पा के संगत आपके, गदगद संत समाज।

 

मन के हारे हार हे, मन के जीते जीत।

मन के गठरी बाँध ले, मिल जाही मनमीत।


पर धन अउ पर नार बर, जेखर मन करुवाय।

मरही रे अनदेखना,  दाग नहीं ये जाय।

 

अचरा दाई के हरय, मोर मया के खान।

उन्ना होए नइ कभू, जब जब माँगन पान।

 

जब ले तोरे नाँव ले, जुड़ गे हे मोर नाँव।

घर भर लागे पर सहीं, बइरी होगे गाँव।

 

जग बर होथे लेखनी, निज दुख पीरा टार।

कवि के रोना हाँसना, गुस्सा अउ व्यवहार।

 

जात धरम जानय नहीं, भूख खाय सब चाँट ।

मया करइया मन कभू, करय न बारा बाँट ।

 

करु करेला गोठ हे, लीम सहीं व्यवहार।

अटियाथस काबर मुरख, बाँचे हे दिन चार।

 

रद्दा मा देखत चलव, गिरे परे इनसान।

मदद करे ले बाँचथे, मानवता के प्रान।

 

काँटा बों के आन बर, फूल कोन हर पाय।

दया मया मन मा रखव, जिनगी भर ममहाय।

 

खाँचा पर बर झन खनव, कैर कपट दव त्याग।

कोन बइरी लूटही, जेन लिखे हे भाग।

 

डर के नँव झन गोड़ मा, बढ़ही अत्याचार।  

मर मर के जीना तको, जिनगी भर धिक्कार।


काँटा खन खन रेंगहूँ, देहूँ बाँट चतवार।

ताल ठोंक ललकार हे, सावधान दरबार।

 

शाला मा तारा लगे, मदिरालय आबाद।

बैपारी राजा बने, पीढ़ी एक बरबाद।

 

मिरगा बन बन मा फिरय, भटक भटक मर जाय।

ये मन मूरख तँय कहाँ, गली गली छुछुवाय।

 

चानी आमा के भला, जे बन जाय अथान।

बटकी भर बासी घलो, देथे जीवनदान।

 

बिन गेरुवा के गरू, रइचर बिन खलिहान।

बैपारी राजा बने कोन बने, कोन बचाही प्रान।

 

आखर दू आखर लिखव, सत् बर तज दव प्रान।

कलम बिकय झन जी कभू, भले जाय जी जान।

 

लबरी घर के का बरी, अउ लबरा के दार।

थूक म लाडू बाँध के, बन जाथे सरकार।

 

काँटा बों के आन बर, फूल कोन हर पाय।

पर बर जे खाँचा खनय, खुद गिर के मर जाय।

 

अँगना लीप बहार के, पाछू चुल्हा बार।

घर भर मधुरस घोरथे, मिठ बोली बेवहार।


नारायन हे तार कस, वीर कोन अउ आन।

भूखे जनता बर तहीं, लड़ लड़ के दे प्रान।

 

जे भूइयाँ मा तोर कस, जनम धरे संतान।

तोरे सँग होगे अमर, माटी सोनाखान।

 

जुरमिल बइरी ले भिड़व, मत माँनव जी हार।

माँगे ले हक नइ मिलय, जोर करे अधिकार।


 गिरथे उठथे रेंगथे, बिना थके कर काम।

नदिया के धारा सहीं, सागर तक अविराम।

 

जलधारा के जोर ले, हो जाथे मजबूर।

बड़े बड़े पाहार कस, बाधा चकनाचूर।

 

परमारथ बर जिन्दगी, जे करथे कुर्बान।

जी जाथे मर के घलो, मनखे उही महान।

 

जिनगी ओखर हे सफल, जे नइ मानय हार।

गिर गिर के उठ उठ जथे, दउड़य पल्ला मार।

 

मरना माँ बर बीर के, बिरथा कभू न जाय।

माटी माटी मा मिलय, महर महर ममहाय।

 

मोती माथा ले चुहय, मिहनत करय किसान।

बदला जाँगर के तभे धरती देथे धान।

 

ढेकी होगे जिन्दगी, ये तन बहना ताय।

जब तक बहना धान हे, तब तक कूटत जाय।

 

चुल्हा माटी के हमर, धर भर बर जर जाय।

पेट जरय झन काकरो, मालिक करव उपाय।


छेना लकड़ी नइ बरय, चुल्हा हर कुहराय।

कलकलहीन बहुरिया, सुख घर के बर जाय।

 

सबला देथे राँध के, सुग्घर मन हरसाय।

चुल्हा तक हर हाँसथे, नारी जब मुस्काय।


आगी चुल्हा मा बरे, घर भर हर सकलाय।

डबकत चाहा संग मा,  सबके मया बँधाय।

 

ये दुनियाँ मेला हरे, मिलथे कतको लोग।

मन मा कोनो बस जथे, लगा मया के रोग।

 

माँगे ले मिटथे गरब, बाँटे बड़थे मान।

छेरछेरा म तो तभे, माँगत हे भगवान।

 

रोज छेरछेरा इँहा, जनता माँगे खाय ।

नेता मन दानी बने, दे दे के इतराय। 

 

दाई चुल्हा गोरसी, छेना लकड़ी बार।

घर के सुन्ता झन बरय, सुखी रहय सँसार।

 

जब घर के सुन्ता फुटय, मुड़ धर रोय सियान।

भाई भाई लड़ मरय, तिरिया चरित महान।

 

जल के तँय मछरी हरस, हे चंचल मन तोर।

मया जाल मँय मारहूँ, हँव केवट चितचोर।

 

जात पात मानय नहीं, सत के महिमा गाय।

पावन जेखर आचरन, वो सतनामी आय।

 

नशापान ला बँद करव, माँसाहार ल त्याग।

ज्ञान मान गुरु के सबो, अपन जगावव भाग।

 

बैरी आधु झन नवव, झन बेंचव सनमान।

सत के खातिर लड़ मरव, भले जाय जी प्रान।

 

अमरौतिन के लाल तँय, मँहगू के संतान ।

जनम धरे सतकाज बर, बाँटे सत के ज्ञान।

 

जैतखाम सत बर खड़े, धजा सेत लहराय।

हर घर बाबा के भगत, पंथी नाँचय गाय।

 

सत के पथ ला छोड़ के, जपत हँवन सतनाम।

गुरु ज्ञान ल त्याग के, फिरथन झंडा थाम ।   

 

कपट करे मा साधना, अउ लालच मा त्याग।

भोग करे महिमा घटय, मोह मया बैराग।

 

सत बर देथे प्रान ला, तप बर त्यागे भोग।

साधक बाबा के सरल, जिनगी उँखर जोग।

 

चमत्कार तो ज्ञान हे, जे बाबा बगराय।

ठगनी जग ठगता फिरय, निज स्वारथ बिलमाय।

 

गुगल बाबा हे गजब, खोज जिनिस सब लाय।

कोन बेबसाइट कहाँ, का का करय बताय।

 

मजेदार यूट्यूब हे, विडियो के भरमार।

बइठ अपन घर देख ले, पल भर मा संसार।


सुग्घर हे विकिपीडीया, भरे ज्ञान भंडार।

सब भाखा सब विषय मा, मिलही तोला सार।

 

पनिहिरिन मन घाट मा, सुख दुख ला गोहराय।

ट्विटर म घलो वइसने, चहल पहल सकलाय।

 

नेट रेट हा बाढ़ गे, सर्वर होगे लेट।

गेट गेट मा वेट हे, काकर भरबो पेट।

 

दिन भर नाचय अँगरी, रंगमंच कीबोड ।

मेमोरी कतको बढ़ा, डेटा ओवरलोड।

 

रिस्ता नाता नेट मा, मया मयारू गोठ।

सोसलमिडिया मा जुरे, बतियावत हे गोठ।

 

इंटरनेट रँईछँई, दुनियाँ भर बगराय।

जइसे जाला मेकरा, भितर भितर लपटाय।

 

एम एस आफिस मा सरल, सब दफतर के काम।

पढ़ना लिखना पोछना, सबे काम आराम ।

 

चोर चोर के साथ हे, गठबंधन भरपूर।

लड़ लड़ के रखवार मन, होवत चकनाचूर।

 

बिरथा हे सत बोलना, नादानी सतकाज।

झूठ लबारी के चलय, सिक्का अब महराज।

 

दिल्ली के दरबार हे, सब दिन उखरे साथ।

धनबल सब के जोर ले, लाठी जेखर हाथ।

 

रोटी सबदिन भूख ले, खेले अलकर खेल।  

आरी पारी पेट मा, आए जाए रेल।

 

पहिली गुरु के वंदना, करत हँवव कर जोर।

साधक के सब साधना, चरन मा अर्पित तोर।

 

धरम जात के नाँव ले, कट कट मरथे लोग।

मस्त हमर चलते रहय, लोकतंत्र उद्योग।

 

चमचा चाँदी के चलय, चमकत चारो ओर,

करम कमाई हाथ के, खा गय करिया चोर।

आल्हा : हाथ जोड़ के करँव आरती, दाई सुन मोरो गोहार।

हाथ जोड़ के करँव आरती ,  दाई सुन मोरो गोहार।
तोर लेड़गा कोदा लइका, माथ नवाँ करथव जोहार।

नइ जानव मँय पोथी पतरी,भटकट दुनियाँ के बाजार ।
डगमग डोलय मोरे नइया, फँसे बीच मा हे मजधार।

मोर शारदे दाई तोरे, महिमा हे वो अपरम्पार।
तोरे किरपा  मोला मिलगे, सदगुरु चरण के उपकार।

गुरु चरण मा सीखें  हाँवव , आखर दू आखर सिरजाय।
झन भटकँव मँय  गलत राह मा, गुरुदेव हा पार लगाय । 

छन्द के छ हा कक्षा नो हय, साधक मन के हे परिवार।
सबे सीखथे अउ सीखाथे ,लिख लिख के जी बारम्बार।

उदिम करत हन सब झन मिलके, छन्द जगत के हम मजदूर।
छत्तीसगढ़ी साहित कोठी, भरे रहय जी अब भरपूर।

 माता रानी के पय्या पर , बिनती कर के माथ  नवाँव।
छत्तीसगढ़िया छन्द आल्हा,आपके आघु  आज सुनाँव।


कुकुभ छंद : राजनीति हा

कुकुभ 16,14
अंत मे 22
राजनीत हा मोर गाँव मा, बोतल मा भरके आथे ।
बरसा के पूरा  कस नाला , गाँव गली बोहा जाथे।


सुनता के बँधना टोरे बर, लालच के बिजहा बोंथे।
दुख पीरा मा हितवा बन के,घड़ियाली रोना रोथे।


स्वारथ  बर छानी मा होरा, भुंज भुंज के सब खाथे।
जात धरम अउ ऊँच नीच के, भेद कलेचुप बगराथे।


निचट लपरहा नेता बनथे, अउ  चमचा जाँगर चोट्टा।
सब झन बर अब खाँचा खनथे, अवसर पाय  खोट्टा।


भूखर्रा मन हदराही मा, फोकट के पा के खाथे।
माधोदास ह दार भात ला, खा खा के बड़ इतराथे।


फोकट के पा के लेड़वा मन , चिचियाथे आरा पारा।
चार चवन्नी फेक फेक के ,चतुरा मन चरथे चारा।


कपट कमाई के रक्सा हा, लिलत जात हे मर्यादा।
दरुहा मन के जमघट होंगे ,मोर गाँव सीधा साधा।


आल्हा : करू करेला मोर कलम हे


करू करेला मोर कलम हे, करू करू मँय करिहौ बात।
रिस झन करहू मोर बात के, मँय जुगनू अँधियारी रात ।।

मोर कहानी  कहे समारू , इतवारा  हर करे विचार।
मंगलु सोचय गुनय बुधारू, मानय बात ल जानय सार।।

बदलत हावे आज जमाना, बदलत हावे सब व्यवहार।
देख जमाना जे नइ बदलय, वो मन पछवा जाथे यार।।

 घर घर जाय दूध बेचइया, अउ मदिरालय आथे लोग।
भाजी वाला भूख मरे अउ, खाय कसाई छप्पन भोग।।

पढ़े लिखे मन घर ला त्यागे, निज स्वारथ  बूड़े दिनरात।
अनपढ़ बेटा दाई ददा ल, करके मजुरी देथे भात।।

अपने भाखा अपने बोली,बोले बर भी लगथे   लाज।
अंग्रेजी नइ आय तभो ले, गिटपिट गिटपिट करथे आज।।

भ्रष्ट आचरण करे कमाई, धन दौलत मा खोजय मान।
दुत्कारे सब दीनदुखी ला, बड़े बड़े ला देथे दान।।

बेरा नइये मनखे बर अउ, मोबाइल मा बाँटय ज्ञान।
सोसल मिडिया मा छाए हे, अउ भटकत हावे सन्तान।।

मनखे होगे आज मशीनी, मर गे हे सबके जज्बात।
बन के बइला पेरावत हे, पइसा के खातिर दिनरात।।

जिनगी के सब सुख  सुविधा बर, जोड़त हे साधन भरपूर।
मजा नहीं अइसन जिनगी मा, होवत हे सब सपना चूर।।

मनहरण घनक्षरी

खुद ला बड़े कहे मा, 
कोनो बड़े होय नहीं,
उही बड़े होथे  जेला 
बड़े कहे  लोग हा।

अभिमानी मनखे ला,
 कोनों हर भाय नहीं,
फोकट बढ़ाई मारे , 
बाढ़ जाथे रोग हा।

पर के जे हक मारे, 
लूट लूट धन जोरे,
महल अटारी ताने,
 बिरथा हे भोग हा।

मनखे के हलाये ले, 
एक पान हाले नहीं, 
प्रभु के बनाए ले ही , 
होथे जी संजोग हा।

गीत : छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया, दुनियाँ ला ये बताना  हे ।
आधा  पेट  खा  के  रे  संगी, जाँगर  टोर कमाना हे ।
सोना-चाँदी, हीरा-मोती, इहाँ के धुर्रा माटी हे !
तभो ले शोषित दलित गरीबहा, छत्तीसगढ़ के वासी हे ।
रतिहा पहागे अब तो संगी .. नवा बिहनिया लाना हे ।
आधा पेट .....................
खेत हमर कागद हे अऊ, कलम हमर बर नाँगर हे ।
हरियर-हरियर धान हमर करम के उज्जर आखर हे ।
कौनो रहय अब अनपढ़ झन, पढ़ना अऊ पढ़ाना हे ।
आधा पेट ..........................
जागे-जागे रहना हे सँगी करना हे देश के रखवारी ।
बन रखवार करत हे बैरी मन हा घर घर मा चोरी ।
बेंच दिही लालच मा आ के , इंखर  का ठिकाना हे  ।
घर मा लुकाये चोर मन ले मोर छत्तीसगढ़ ला बचाना हे।
मथुरा प्रसाद वर्मा

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य : तँय पढ़ा,तँय पढ़ा तँय पढ़ा गुरूजी ।


तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।
अब कोनो रहय झन अड़हा गुरूजी।

तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।

एक-एक कक्षा, सौ-सौ लइका,
फेर हर लइका ल ज्ञान दे।
का व्यवस्था हे का बेवस्था ,
एला तँय झन धियान दे।
तोरे भरोसा हे कइसनो कर फेर,
तहीं ह जोखा मढ़ा गुरूजी।
तँय पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।

जेन लइका स्कूल नइ आवय,
ओला स्कूल म लाने ला परही।
नीति हे शासन के चाहे बिन चाहे,
तोला सबो ला माने ला परही ।
सीखय भले झन, फेर साक्षर कहाही ,
नाँव ला  रजिस्टर म चढ़ा गुरूजी।
तँय पढ़ा,तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।

फोकट म सबला,सब कुछ चाही,
नवाँ जमाना के इही लोकतंत्र ये ।
चलनी म चाल फेर रजगा झन निकाल, 
सस्ता लोकप्रियता के इही मूलमंत्र ये।
खिंच-तान अउ ढकेल-पेल फेर,
सबो ल आगु बढ़ा गुरूजी।
तँय  पढ़ा, तँय पढ़ा, तँय पढ़ा गुरूजी ।

न बने बिजहा,न उपजाऊ भुइयां,
न बने खातू ,न हवा पानी ।
परही तुतारी, तुही ल रे बइला,
 तोरे भरोसा होही किसानी ।
भले भूख मरबे नइ पाबे चारा,
फेर फसल रहय झन  कड़हा गुरूजी ।
तँय  पढ़ा,तँय  पढ़ा तँय पढ़ा गुरूजी ।



   मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद'
   ग्राम-कोलिहा ,लवन  बलौदाबाजार ( छ० ग०)
         

विशिष्ट पोस्ट

रूपमाला छन्द

you tube में सुने साँस मोरे जब जुड़ावय, तोर अचरा पाँव। जब जनम लँव मँय दुबारा, तोर ममता छाँव। मोर दाई  तोर बर हम , हाँस के दँन प्र...