मोर गुरुवर के कृपा दे दिस हवे सद्ज्ञान।मोह बँधना मा परे मँय, राह ले अनजान।गुरु चरण मा मँय नवा के, राख दे हँव माथ।भाग मोरो जाग गे हे, अब करम के साथ।।मोर हे शुभकामना हो , जिंदगी खुशहाल।आपके सूरज सही मुख, होय लालेलाल।मोंगरा कस तोर खुसबू आज हे ममहायआज गुरुजी आप ला मोरो उमर लग जाय।ये चरन मा राख मोला , तँय बढ़ाये मान।
रोज सेवा कर सकव मँय, तोर हे भगवान।तँय बनाये मोर माटी आदमी के रूप।पोठ करदे तँय पका के, ज्ञान के दे धूप।।जान जाए फेर मोला, देश खातिर आज।
बात अइसन बोलना हे, खोल ले आवाज।।बाद मा बइरी ल होही, जे सजा तँय यार।देश के गद्दार मन ला, आज गोली मार।।जेन थारी खाय छेदय, अब उही ला लोग।जेल मा हे फेर भोगे, रोज छप्पन भोग।कोन हे आतंकवादी, मन घलो के साथ।खोज के वो लोग मनला, आज कातव हाथ।मोर माटी ला उही मन, नइ लगावै माथ।जेन बैरी के मितानी, बर करत हे घात।साँप बन के लील देथे, देश के सुख चैन।अब गटारन खेलबो रे, हेर उखरे नैन।छोड़ दे तँय आलसी ला, बात सुनले मोर।मेहनत के संग आही,गाँव मा अब भोर।हमन शिक्षा जोत घर घर,चल जलाबो यार।लोग लइका हमर पढ़ के, बन जही हुसियार।खींच लानिस तीर सबला , तोर सुरता आज।तोर सुग्घर गीत कविता, मोहनी आवाज।कोन कहिथे तँय चलेगे, छोड़ के संसार।गीत तोरे ले जही तोला समय के पार।भीख नइ माँगय कभू भी आपले बनिहार।हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।हम कमाथन टोर जाँगर ,दे अपन मन प्राण।हाथ मा छेनी हथौड़ी , देश नव निर्माण।कोन जनता के सुनत हे वोट दे के बाद।बाढ़गे कांदी भकाभक चूसथे सब खाद।सब कमीशन खात हे जी, बाँट के भरपूर।चोर नेता भष्ट अफसर,न्याय चकनाचूर।कोन सच के राज खोलय, चुप हवे संसार।जेन जनता बर लडत जी, पोठ खावय मार।न्याय कारावास भोगय, हो जथे बीमार।जब कलम मजबूर हो के, नाचथे दरबार।जेन ला रखवार राखन, हे उही मन चोर।कोन जाने अब कहाँ ले, गाँव आही भोर।पेज पसिया बर लड़त हम, जिन्दगी भर रोन ।मोर बाँटा के अँजोरी , लेग जाथे कोन ?जोगनी बन जेन लड़थे, रात भर अँधियार।वो बिहिनिया मान जाथे, रोशनी ले हार।।कोंन जाने कब सिराही,देश मा संग्राम।रार ठाने हे भरत हा, रोय राजा राम।।गाँव मोरो आज होतिस, सब डहर खुशहाल।अब किसानी मा कमाई, होय सालोसाल।चाहिये ना गाँव ला जी, काकरो उपकार।बस फसल के मोल दे दय, अब बने सरकार।गाँव देथे तब सहर हर, पेट भरथे रोज।गाँव हर बनिहार होगे, सहर राजा भोज।।गाँव सिधवा मोर हावे, अउ शहर मक्कार ।आदमी के खून चूसे, रोज ये दरबार ।।हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।भीख नइ माँगन कभू हम हन भले बनिहार।।हम कमाबो टोर जाँगर ,दे अपन ये प्राण।हाथ धर छेनी हथौड़ी , देश बर निर्माण।।साँझ दे के आन ला मँय हर बिसाथव घाम।साँस चलही मोर जब तक नइ करँव आराम।।ले किसानी छोंड़ के आ सहर मा तोर।मँय किसानी ला करे बर लें उधारी तोर।( कोन कर्जा ला चुकाही जान जाथे मोर।।)( मँय किसानी छोड़ आ गें अब सहर मा तोर।)हे शरद के पूर्णिमा मा, चंद्रमा हर गोल।आज चंदा हा धरे हे , रूप जी अनमोल।।हे जगत के जीव मन बर,मोहनी कस रात।ओस बन के आज अमरित, बरसथे बरसात।।कैद होगे आज बचपन, अउ जवानी मोर।होत हे काबर अकेल्ला, अब बुढापा तोर।।कोन घर मा बाँध देथे , खींच के दीवार।आज मोबाइल तको तो, बाँटथे परिवार।।मुड़ म बाँधे लाल पागा, डोकरा हरसाय।आज नाती के बराती, बर बबा अघुवाय।।हे कहाँ अब डोकरी हा, डोकरा गे भूल।छोकरा बन अब गली मा, बाँटथे जी फूल।।रूप अइसन हे सजाए, सालहो सिंगार।लान दे ना डोकरी बर, डोकरा तँय हार।।हे रचाए हाथ मेहदी, अउ महावर पाँव।ओठ में लाली लगा के,घूमे सारा गाँव।।
मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के
- मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
- कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
- नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
रूपमाला छंद : मुक्तक
चौपई/ जयकारी छन्द: कोरोना
सुन लव भाई सुनव मितान।
मोर गोठ ला दे के ध्यान।
हे संकट मा सबके जान।
आज मोर तँय कहना मान।
वाइरस एक कोरोना नाँव।
फैलत हवे सहर अउ गाँव।
डर के मारे काँपय लोग।
बन्द होत हे सब उद्योग।
सोसल मिडिया करे बखान।
रोग ह भारी लेवय प्रान।
दुनियाँ भर हावे परशान।
खोजे मा नइ पाय निदान।
हमर परोसी चीन ह ताय।
जेन जीव ला कच्चा खाय।
सांप बिछी तक चट कर जाय ।
इही रोग के कारन आय।
सुन के कोरोना के नाम।
आज जगत हर काँपय राम।
फैलावत कतको अफवाह।
सुन लेवव बांचे के राह।
जर बुखार अउ खासी छींक।
मुड़ पीरा नइ होवय ठीक।
साँस लेत मा लागे जोर।
निमोनिया कस लक्षण तोर।
फेर डरे के नइ हे बात।
डर हर करथे जादा घात।
हिम्मत राखव मन मा जोर ।
इही ह प्रान बचाही तोर।
कोरोना के का उपचार।
मार मचे हे हाहाकार।
दवा नही कोनो हर पाय।
सावधानी हर एक उपाय।
भीड़ भाड़ मा तुम मत जाव।
घर म रही के समय बिताव।
शाकाहारी खाना खाव।
स्वच्छता ला तुम अपनाव ।
नही हवा मा फैलय रोग।
वाइरस ल फैलाथे लोग।
हलो हाय के चलन ल छोड़।
राम राम कर हाथ ल जोड ।
जाड़ नमी मा ये हा भोगाय।
गर्मी म वाइरस मर जाय।
तेखर ले झन ठंडा खाव।
जाड़ा लगे उँहा झन जाव।
जेला सर्दी खासी आय।
छिक छिक के जी घबराय।
अपने हर झन करय उपाय।
अस्पताल तुरते ले जाय।
बार बार जे हाथ ल धोय।
साबुन लगा लगा के कोय।
साफ रहे नइ खतरा होय।
इही उपाय ला राख सँजोय।
https://youtu.be/w9iiY2FBId4
चौपई : कोरोना
सुन लव भाई सुनव मितान। मोर गोठ ला दे के ध्यान।
हे संकट मा सबके जान। आज मोर तँय कहना मान।
वाइरस एक कोरोना नाँव। फैलत हवे सहर अउ गाँव।
डर के मारे काँपय लोग। बन्द होत हे सब उद्योग।
सोसल मिडिया करे बखान। रोग ह भारी लेवय प्रान।
दुनियाँ भर हावे परशान। खोजे मा नइ पाय निदान।
हमर परोसी चीन ह ताय। जेन जीव ला कच्चा खाय।
सांप बिछी तक चट कर जाय। इही रोग के कारन आय।
सुन के कोरोना के नाम। आज जगत हर काँपय राम।
फैलावत कतको अफवाह। सुन लेवव बांचे के राह।
जर बुखार अउ खासी छींक। मुड़ पीरा नइ होवय ठीक।
साँस लेत मा लागे जोर। निमोनिया कस लक्षण तोर।
फेर डरे के नइ हे बात। डर हर करथे जादा घात।
हिम्मत राखव मन मा जोर । इही ह प्रान बचाही
तोर।
कोरोना के का उपचार। मार मचे हे हाहाकार।
दवा नही कोनो हर पाय। सावधानी हर एक उपाय।
भीड़ भाड़ मा तुम मत जाव। घर म रही के समय बिताव।
शाकाहारी खाना खाव। स्वच्छता ला तुम अपनाव ।
नही हवा मा फैलय रोग। वाइरस ल फैलाथे लोग।
हलो हाय के चलन ल छोड़। राम राम कर हाथ ल जोड ।
जाड़ नमी मा
ये हा भोगाय। गर्मी म वाइरस मर जाय।
तेखर ले झन ठंडा खाव। जाड़ा लगे उँहा झन जाव।
जेला सर्दी खासी आय। छिक छिक के जी घबराय।
अपने हर झन करय उपाय। अस्पताल तुरते ले जाय।
बार बार जे हाथ ल धोय। साबुन लगा लगा के कोय।
साफ रहे नइ खतरा होय। इही उपाय ला राख सँजोय।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
रविवार, मार्च 15, 2020
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कोलिहा, छत्तीसगढ़ 493526, भारत
ताटंक छंद : मनखे हो के मनखे खातिर
मनखे हो के मनखे खातिर, मन मा धरे नहीं पीरा।
माटी के महिमा नइ जाने, गँवा दिए कइसे हीरा।
बिरथा तन के गरब करे अउ, मया प्रित ला जाने ।
रुपिया पइसा धन दौलत बर, हपटत हावय मनमाने।
अइसन धन ला घुन्ना खाथे, तन मा लग जाथे कीरा।
मनखे हो के मनखे खातिर, मन मा धरे नहीं पीरा।
जात धरम के खाँचा खन खन, काबर बोंवत हे काँटा।
निज स्वारथ मा चानी चानी, होगे मनखे के बाँटा।
अमरित राना मन पीथे अउ, जहर इहाँ पीथे
मीरा।
मनखे हो के मनखे खातिर, मन मा धरे नहीं पीरा।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
शुक्रवार, मार्च 13, 2020
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कोलिहा, छत्तीसगढ़ 493526, भारत
ताटंक छंद गीत
16, 14 अंत मा तीन गुरु
मोर मयारु मया भूलागे, मोला नइ पहिचाने रे।
मोर मया ला काँदी कचरा, माटी पथरा जाने रे।
हिरदय के धड़के ले संगी , सुरता तोरे आथे
रे।
जब जब लेथँव साँस मोंगरा, के जइसे ममहाथे रे।
तोरे खातिर मँय बइहा बन, गली गली गाथँव गाना।
गाँव गाँव मँय नाँचत फिरथँव, पहिरे जोगी
कस बाना।
रतिहा भर सपनाथँव तोला, गवाँगे बिहाने रे।
तोर नशा मा झूमत रहिथँव, का मोहनी खवाए रे।
रद्दा देखँव तोर रात दिन, फेर नहीं तँय आए रे।
हाँसस बोलस पहिली कइसे, अब का हो गे हे तोला।
कोन जनी का गलती हो गे, काबर बिसरी दे मोला।
अपन बना के काबर गोरी, मोला कर दे आने रे।
ये दुनियाँ तो मया करइया मनखे बर खनही खाँचा।
काबर तँय हा डर्राखस वो, मोर मया हर हे साँचा।
मोर कलपना जाय न बिरथा तहूँ समझबे रानी रे।
पथरा कस हिरदय पिघलाही, मोर नैना के पानी रे।
सुधबुध मोर भुलागे बइरी, तँय कइसे मनमाने रे।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
सोमवार, मार्च 02, 2020
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कोलिहा, छत्तीसगढ़ 493526, भारत
कुकुभ छंद : राजनीति
राजनीत ह मोर गाँव मा, बोतल मा भरके आथे।
बरसा के पुरा कस नाला, गाँव गली बोहा जाथे।
कपट कमाई के रक्सा हा, लिलत जात हे मरजादा।
दरूहा मन के जमघट होगे, मोर गाँव सीधा सादा।
निचट लपरहा नेता बनथे, चमचा बनय अलाली मा।
सरी गाँव भर इतरावत हे, बनवा महल दलाली मा।
भूखर्रा मन हदरीही मा, फोकट के पा के खाथे।
काम करे ना काज तभो ले ,सबले जादा अटियाथे।
मुफ्तखोर छानही म होरा, भूँजत हे आरा पारा।
चार चवन्नी फेंक फेंक के, चतुरा मन
चरथे चारा।
निज स्वारथ बर गिर के मरथे, लालच पर के पछताथे।
नेता मन के पाछू जा के ,हाथ म काखर का आथे।
बखत परे मा कहे ल परथे, ये नेता काखर होथे।
मतलब खातिर अपन बने अउ, बेरा बीते पर होथे।
जात पात अउ ऊँचनीच के, भेद कलेचुप बगराथे।
आगी खा के अँगरा उछरे, जइसे ये मन नितराथे।
सुनता के बँधनी टोरे बर, बिख के ये बिजहा बोंथे।
दुखपीरा मा हितवा बन के, घड़ियाली रोना रोथे।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
सोमवार, मार्च 02, 2020
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कुकुभ छंद : राधा
राधा तोला आना होही, मोर बाँसुरी सुन काली।
जमुना तट मा महारास हे, सुरता रखबे मतवाली।
गोप गोपिका सब झन आही, बँधा मया के डोरी मा।
तोला खोजत रही नैन हा, राधा कहाँ किशोरी मा।
मया करे मा सचमुच कहिथँव, ये जग बैरी हो जाथे।
फूल बाँटने वाला मन बर, काँटा सब झन बगराथे।
जेन ह पीरा सह के गाथे, गीत मया के राधा रे।
मया करइया मन ला कोनो, राक सके ना बाधा रे।
तहूँ चले आबे जानत हँव, करबे देरी झन रानी।
नइ ते बिरहा के आगी मा, जरही जमुना के पानी।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
रविवार, मार्च 01, 2020
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छप्पय
छप्पय =रोल+उल्लाला।
रच-रच रच-रच आय,
सड़क मा बइला गाड़ी।
गाँव गँवतरी जाय, करँय
जी खेती बाड़ी ।
घन्नर घेंच बँधाय,
बाजथे घनघन घनघन।
दउड़त सरपट जाय,
हवा कस सनसन सनसन।
आज नँदागे हे सबो,
बइला गाड़ी छाँव रे।
मोटर गाटा भागथे,
तब ले सुन्ना गाँव रे।
भ्रष्टाचारी आज, बेच के देश ल खावय।
सब होगे बइमान, कोन हा देश बचावय।
कव्वा कुकूर बाज, सहीं सब माँस चिथइया।
जनता रोवय रोज, कोन हे हमर बचइया ।
रखवारी कर देश के, नेता मन ले आज रे।
बेचत हे बइमान मन , महतारी के लाज रे ।
नाली भरगे हाय, सरे कस बस्सावत हे।
कोन ह करही साफ, समझ मा नइ आवत हे।
कचरा के हे ढ़ेर, फेर ये झिल्ली पन्नी।
लाखों होगे पार, फेक के चार चवन्नी।
कचरा भ्रष्टाचार के, लेसव अब चतवार के।
धर बहरी सब साफ कर, बेरा हे इंसाफ कर।
वादा के भरमार चार, दिन चलही संगी।
टकली बर सरकार, लान के देही कंघी।
अब चुनाव हे पास, खास हो जाही जनता।
नेता आही गाँव, पेट भर खाही जनता।
जनता के हर बात ला, दार साग अउ भात ला।
नेता मन भरमाय रे, देश बेंच के खाय रे।
आशा अउ बिस्वास, माँग के कोन हा पाथे।
करम करइया हाथ, भाग अपने सिरजाथे।
पर के आसा छोड़, जेन दिन आघु बढ़बे।
अपने हाथे गोड़, चला के पाहड़ चढ़बे।
आलस तज दे बीर बन, करम कमा रणधीर बन।
हर बाधा ला टार दे, जिनगी ला चतवार दे।
चोवा चंदन पोत, पात के घर घर जाथे।
धरम करम के नाँव, डरा के दान कराथे।
काम करय ना काज, हमर मति ला भरमाथे।
होथे जाँगर चोर, माँग के जेन ह खाथे।
पोंगा पंडित आज रे, बन जाथे महराज रे।
डरना का भगवान ले, ठग जग ला पहिचान ले।
आँटे पैरा डोर, बइठ के खटिया जिनगी।
बेंचत चलथे चाय, तलत हे भजिया जिनगी।
काम करे का लाज, काम छोटे झन जानव।
मिहनत ले मिल जाय, भाग के अपने मानव।
खाय बइठ के ठेलहा, अउ जादा अटियाय जी।
बड़े बड़े धनवान तक, बखत म धोखा खाय जी।
रोना रोए आज, करम के गठरी बाँधे।
संसो के तँय साग, अपन जिनगी भर राँधे।
काम करे ना काज, काय तँय हक मा पाबे।
फैला के तँय हाथ, झोंकवा अन्न ल खाबे.
अपने माथा पीट के, अपन भाग जे रोय जी।
बइठाँगुर के हाथ मा, धन राखे ना कोय जी।
भूखे हम रह जान, कमाथन रोजे तब ले।
गड़थन डर के हाय, गोड़ मा काँटा हब ले।
चिरहा हमरे भाग, ढ़ाक के तन दूसर के।
मरथन भूख म फेर, नहीं हक मारन पर के।
छत्तीसगढ़िया सोज रे , मरथे पर बर रोज रे।
अपन मनाथे जोग रे, बाँटय छप्पन भोग रे।
मया ला काबर मोर, नहीं तँय जाने बइरी।
मन मा करथे सोर, पाँव के तोरे पइरी।
निरदइया तोर नैन, करेजा चानी चानी।
परथौ पइयाँ तोर, करे कर झन मनमानी।
बइहा होगे हे टुरा , कइथे जम्मों गाँव रे।
जाही मोरे जान हा , ले के तोरे नाँव रे।
अब तो तँय ललकार, उठा के हाथ अपन ला।
माँगे ले कर जोर, मिलय हक नहीं हमन ला।
कब तक करन गोहार, पाँव मा माथ नवाँ के।
हक पाये बर यार, देखबो जान गवाँ के ।
हाथ जोड के हार अब, नइ मानन सरकार अब।
तोर भरम अब तोड़बो, हम हक ले के छोड़बो।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
सोमवार, फ़रवरी 24, 2020
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Location:
कोलिहा, छत्तीसगढ़ 493526, भारत
कुण्डलिया
रोटी हे संसार मा, भूखन बर भगवान।
सुरुज बरोबर पेट मा, उवय तभे दिनमान।
उवय तभे दिनमान, रात हा घलो सुहाथे।
मिहनत कर बनिहार, पेट भर अन ला खाथे।
सबो हाथ ला काम, लाज बर मिलय लँगोटी।
किरपा कर भगवान, सबो ला दे दे राटी।
बइठे आमा डार मा, कउँवा बोलय काँव।
कोन गली हे कोइली, सुन्ना परगे गाँव।
सुन्ना परगे गाँव, छाँव हा घलो नँदागे।
बिन रुखराई आज, गाँव मरघट्टी लागे।
करय नही अब बात, रहय सब मुँह ला अइठे।
चौरा ना चौपाल, कहाँ अब मनखे बइठे।
चिखला कस माते हवे, देश मा भ्रष्टाचार।
सरकारी अनुदान तँय, कइसे पाबे यार।
कइसे पाबे यार, चढावा बिना चढाए ।
नेता अफसर आज, सबो हे जीभ लमाए।
जुरमिल मौज उड़ाय, परे हे पीते खीते।
कोन ह करही साफ, देश चिखला कस माते।
बिपत ह तोरे जिन्दगी, के करही सिंगार।
तप के सोना के सहीं, पाबे तहीं निखार।
पाबे तहीं निखार, हार के झन थक जाबे।
रेंगत रेंगत देख, एक दिन ठिहा ल पाबे।
आशा अउ विश्वास , राख लें मन मा जोरे।
हिम्मत जाही जीत, हारही बिपत ह तोरे।
काबर छूरा देख के, छेरी करय बवाल।
जनहित खातिर बोकरा, होथे सदा हलाल।
होथे सदा हलाल, खाल के ढोल बनाथे।
लोकतंत्र के नाँव, गाँव भर पीथे खाथे।
करथे एक सवाल, आज ये लेड़गा टूरा।
छेरी के घर जाय, रोज ये काबर छूरा ।
बजा बजा के ढोल, नाचथे लेड़गा टूरा।
खुलखुल खुलखुल आज, हाँसथे काबर छूरा।
कवि: मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
at
बुधवार, फ़रवरी 19, 2020
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बालूदा बाज़ार, छत्तीसगढ़ 493332, भारत
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