मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,

छत्तीसगढ़ी मुक्तक

कोनो तोला कतको बोलय,हर काम ल टाले कर।
मतलब अपन निकाले खातिर,हाँसी मुख मा पाले कर।
तँय कतका गुनवन्ता होथस,ये तो सब झन जानत हन,
तोला कुछु करना ही नइ हे, गलती मोर निकाले कर।

छोड़ सबो ला जाना पड़थे।




जमे जमाय बिराना पड़थे।
रीता कर रितियाना पड़थे।
जोड़े कतको गोटी माटी,
छोड़ सबो ला जाना पड़थे।

खोंदरा नवां बनाना पड़थे ।
खोज के दाना खाना पड़थे।
ये जिनगी ले जतका लेबे,
करजा जमो चुकाना पड़थे।

वोखर बुलाय आना पड़थे।
अपन करम सोरियाना पड़थे।
का बोये हँव काटे परही ,
सुरता कर पछताना पड़थे।

निभय नहीं त निभामा पड़थे ।
अचरा मा गठियाना पड़थे।
मया ह माँगे मिलय नहीं जी,
जोहत जिनगी बिताना पड़थे।

गजल : हमला तो मयखाना चाही।

नित नवां बहाना चाही।

हमला तो मयखाना चाही।

 

अब चुनाव मा सब दल मिलके

पव्वा रोज पियाना चाही ।

 

तुमन कमाहूं पाँच साल जी,

हमला फ़ोकट खाना चाही।

 

वादा के हे काय भरोसा,

सोच समझ गुठियाना चाही।

 

रतिहा मँय सपना देखे हँव,

हरहा ला हर्जाना चाही।

 

आंख रहत जे बन गे अन्धरा,

वो मनखे मर जाना चाही।

 

डिस्पोजल हर मुड़ मा चढ़गे,

अब 'प्रसाद' घर जाना चाही।

गजल : हर पँछी ला दाना चाही।




















जइसे भी हो आना चाही।

हर पँछी ला दाना चाही।

 

ये सरकारी हुकुम हे खच्चित,

फांदा मा फँद जाना चाही।

 

लोकतंत्र के खुले खजाना,

देश भले लूट जाना चाही।

 

ये धरती मा जनम धरे हन्, 

भाग अपन सगराना चाही।

 

बस स्कूल म नाँव लिखादिन,

पास सबो हो जाना चाही।

 

रेचका मेचका हगरु पदरू,

पढ़ लिख गे पद पाना चाही।

 

अस्पताल बर लइन लगावव,

हमला तो मयखाना चाही।

 

रिस्तेदारी बहुत निभा देन,

सब ल अपन घर जाना चाही।

 

हमर मया के कोन पुछारी।

सँगी ला सब भाना चाही।

 

टूट जथे सब दिन के सपना,

नींद घलो तो आना चाही।

 

मया करे अउ आँशु पाय,

अउ का तोला खजाना चाही।

 

फेर सँगी के सुरता आ गे, 

चल प्रसाद अब गाना चाही।




खाना वाना खाया कर।


बीवी तो कहती है अक्सर
रोज कमा के लाया कर।
और पिताजी दे कर घुड़की
कहते और कमाया  कर।
 
कहने को सब क्या क्या कहते
जब  मिलती माँ कहती है,
कितना काम करेगा बेटा
समय पे खाना खाया कर।

 


कितना पाबन्दी है मुझ पर
इधर उधर मत जाया कर।
जिधर भी जाये सबसे पहले
मुझको रोज बताया कर।
 
मां है तो है टोकाटाकी
माँ के बाद जमाने मे
कौन कहेगा दुबला हो गया
खाना वाना खाया कर।

टूट गया हूँ अब लगता है
सोंच सोंच दुखता है सर।
इस दुनियां के भाग दौड़ में,
कब तक भागूं मैं मर मर।
 
ताना दे दे सब कहते है
मैं भी हुआ नकारा हूँ,
बाबूजी होते तो कहते
बेटा खुद पे भरोसा कर।

 


रण है ये दुनियादारी भी
कब तक किसे पुकारेगा।
अपने ही साहस के बल पर
नैया पार उतारेगा।
 
भले थका है लड़ते लड़ते
ये बाजी तू मारेगा।
बाबूजी होते तो कहते
बेटा तू नइ हारेगा।

गजल : सुनना कहाँ हे।

तै आये कहाँ तोला जाना कहाँ हे।
ये दुनियां रहे के ठिकाना कहाँ हे।

 


दु पइसा कमा देवता बन जथे सब,
इहाँ आदमी अब बता ना कहाँ हे।

 


अपन जेन होथे पिरा ला समझथे,
पिरोहिल करा दुख जताना कहाँ हे।

 


मनौनी जे खोजे फुलाये हे मुँह ला,
बता पूछ के ओला आना कहाँ हे।

 


बिकट तोल के चाल चलथे जमाना,
कहाँ रोना हे मुस्कुराना कहाँ हे।

 


चिरैया चलो छोड़ के गाँव घर ला, 
इहाँ पेट बर चार दाना कहाँ हे।

 


महुँ बेच दौ भूख ईमानदारी
मिलै पेज पसिया, बियाना कहाँ हे।

 


सड़क मा गरु अउ बियारा मा पैरा,
कका तोर गोठान ला ना कहाँ हे।

 


बने रोज "परसाद" कहिथे कहानी ,
मगर कोन सुनथे सुनाना कहाँ हे।


गीत : गाड़ी आही जब टेसन मा सबला चढ़ के जाना हे।





ये दुनियाँ  इक गाड़ी टेशन,
पल दु पल सुस्ताना हे।
गाड़ी आही जब टेशन मा,
सब ला चढ़ के जाना हे।

 


कोन रहे बर आय इहाँ हे,
काकर इहाँ ठिकाना हे।
गाड़ी आही जब टेशन मा,
सब ला चढ़ के जाना हे।

 


अपन करम के गठरी बाँधे,
रद्दा खर्ची राख बने।
खीसा  टमरय घेरी बेरी, 
टमर टमर के फेर गने।

 


कतको मन हर ब्याकुल हावे, 
डर मा चोर लुटेरा के।
ताकत हावय  घड़ी ल कतको
गाड़ी आये बेरा के।

 


टिकिस कटा के करत अगोरा,
भीड़ इहाँ मनमाना हे।
गाड़ी आही जब टेशन मा,
सब ला चढ़ के जाना हे।

 


ककरो ककरो रिजर्वेशन हे,
स्लीपर ऐसी कोच म।
वेटिंग वाले टिकिट धरे हे,
कतको हे परे सोच मा।

 


जनरल वाला धक्का खा खा
खड़े खड़े पछताही।
जेकर जइसे करम कमाई,
सीट ल वइसन पाही।

 


कतको झन हा बिना टिकिट के,
जाही करत बहाना हे।

 




कुण्डलिया : जूता मार

लम्पट लबरा लालची, स्वार्थी अउ मक्कार।
बात बोलबे बाद में, पहली जूता मार।
पहली जूता, मार नहीं ते, मुड़ चढ़ जाही।
गाँव गली घर, रिश्ता नाता, आग लगाही।
मार दु थपरा, पाट जमो ला, खन के डबरा।
बात बना के, फेर फसाही, लम्पट लबरा।


रूपमाला : मोर गुरुवर

गुरु वंदना

वंदना गुरु आपके पग, मा करँव कर जोर।

कर कृपा आशीष दे दव, प्रार्थना हे मोर।

जेन पाए ये चरणरज, जिंदगी तर जाय।

हँव खड़े प्रभु आश करके, कब कृपा हो जाय।


मान गुरु के बात जिनगी भर नवा के माथ।

हर बिपत ले जे उबारे, वो धरे हे हाथ।

एक अँगरी के इशारा, हा उहाँ पहुचाय।

खोज मा जेखर भटकते, ये उमर खप जाय।


मँय सुने हँव मोर गुरु के, हाथ पारस आय।

जेन पथरा हा छुवाये, सोन वो हो जाय।

अर्थ पाइस मोर जिनगी, साथ पा के तोर।

पाय हँव जब ले चरणरज, भाग खुलगे मोर।


व्यर्थ भटकत शब्द मन ला दे सके नव अर्थ।

अर्थ के सार्थक गठन बर, होय जेन समर्थ।

जे सदा परमार्थ खातिर, ही करे कविकर्म।

हे उही हकदार कविपद के बताए धर्म।


गुरुचरण मा सीख मिलथे, गुरु कहे मा ज्ञान।

गुरु बिना अँधियार लागे, ये जगत दिनमान।

एक अँगरी के इशारा, गुरु कृपा जब पाय।

हर कठिनपथ हा बताए ले सरल हो जाय।


पाँख जामे ले उड़े बर, हौसला नइ आय।

ये जमाना के चकाचक रोशनी भटकाय।

भागथे पल्ला सबोझन, कोन मंजिल पाय।

देख अँगरी ला गुरु के, चल सफल हो जाय।


मँय खड़े मजधार मा हँव, कोन करही पार।

हे लहर बड़ तेज अउ छाँय हे अँधियार।

कुछ समझ नइ आत हावय राह अब देखाव।

मोर गुरुवर हाथ धर के, पार मा ले जाव।


हे कठिनपथ साधना के, बिन थके चल पाय।

पाँव मा काँटा गड़े के बाद भी मुस्काय।

रोंठ गुरु के पोठ चेला, हा कहाँ घबराय।

टोर के सब पाँव बँधना, सोज चलते जाय।

(साधना गुरुज्ञान पाके, पोठ होते जाय।)



एक मन के हे भरोसा, एक हे विश्वास।

जब बिपत हर घेर लेही, टूट जाही आस।

मोर गुरुवर हाथ धर के, लेगही वो पार।

वो कभु नइ हाथ छोड़य, छोड़ दय संसार।


गुरु बताए सोज रद्दा, चल सको ते आव।

मेहनत दिनरात कर अउ झन कभू सुस्ताव।

हे सफलता के मरम ये, जान लव सदुपाय।

कर सकय जे साधना सिरतोन मंजिल पाय।

गीत : अउ कतका अखबार पढ़ौ ।


पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ ।
मन ला अतका भटकावत हे, काकर काकर सार पढ़ौ।

पढ़े लिखे मन निज स्वारथ मा, मानवता नीलाम करे।
जहर उगावय ये भुइयाँ मा, देश धरम बदनाम करे।
जात पात के भेद भाव ला, बगरावत दरबार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

खावत हावय मनखे ला अब, रक्सा हर महंगाई के।
पाई पाई खातिर होगे, बैरी भाई भाई के।
काकर गरदन कोन काटही, तानत हे तलवार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ ।


अप्पड़ मनखे जांगर पेरे, मिहनत के ये घानी मा।
सींच सींच के रोज पसीना,करजा लुवव किसानी मा।
सत्ता के सँग फुगड़ी खेलत, फलत फुलत बैपार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ ।

बबा ह कहिथे मनखे पढ़लिख, हो जाथे हुसियार बने।
सीख जथे सिधवा मनखे तक, चुहके बर कुसियार बने।
महुँ बने बर रस चुहकइया, बन जावव सरकार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

सड़क तिरन के खेत बेचागे, सुनथव कीमत भारी हे,
सहर लिलत हे हमर गांव ला, रुख राई तीर आरी हे।
बेजा कब्जा भूमि माफिया, माते हाहाकार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

सतवंता हर फाँसी चढ़गे, फेर मिलही अब न्याय कहाँ।
कोट कचहरी पुलिस दरोगा, खोजय चारा पाय कहाँ।
लहू सनाये बेवस्था मा, मँय कतका चीत्कार पढ़ौ।
पढ़त पढ़त अब मति छरियागे, अउ कतका अखबार पढ़ौ।

मनहरण घनाक्षरी



येती वोती  चारो कोती, बोलो जी काकर सेती,
भ्रष्टाचार के ये खेती, हा लहलहात हे।।
योजना ला सरकारी, नेता अउ अधिकारी, 
मिल बाँट आरी पारी, दिनरात खात हे।।
बादर मा बना बरी, ठठा के करम मरी,
काकर भरोसा करी, समझ न आत हे ।।
जिनगी के मारा मारी, भाजी भाटा तरकारी,
मँहगी होवत भारी, मनखे लुलुवात हे।।


नदी मा उफान आय, आंधी या तूफान आय,
कोनो हर पार नइ, पाए मजधार ले।
ऋषि मुनि जोगी मन, संसारी व भोगी मन,
कोन बाँच पाय नहीं, नैना के कटार ले।
जीव के जंजाल हरे, मनखे के काल हरे,
तब ले झपाय मरे, आदमी अजार ले।
कतको बचाबे भले, पड़ जाथे तभो गले,
कोनो बाँच पाय नही, जवानी म प्यार ले।


तोर मया मोहनी रे, जोग हरे जोगनी रे, 
जानबुच  ठगनी रे, तोर ले ठगाय हँव।।
नैना तोर कजरारे, मोहनी मंतर मारे,
करके भरोसा वा रे,भारी धोखा खाय हँव।।
गुनत रेहेंव काली, छू के ओठ के वो लाली, 
मया म वो मतवाली, तोर काय पाय हँव।।
अतके हे लेना देना, जब ले छुएव है ना,
तोर सँग फुलकैना, महुँ ममहाय हँव।।

गीत : फोकट खाये के चक्कर म


फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।
लालच मा पर के जनता हा, होवत हवे अलाल।

मिहनत के अब खून पछीना, नइ पावत हे मान।
लम्पट मन सब अटियावत हे, महल अटारी तान।
ठलहा बइठे जीभ चलइया, ऊंचा  पीढ़ा पाय।
मिहनत के देवता ह रोवय, बइठे मुड़ ठठाय।

रोजी रोटी नोहर होगे, सिरिफ चलत हे गाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।

कर्जा ले ले घीव पियत हे, सुख भोगे भरपूर।
भावी पीढ़ी के सपना हर, होही चकनाचूर।
राजनीति सौखी मारत हे, फेंक कोडहा  देख।
मछरी मन के भाग म मरना, लिखत विधाता लेख।

आँखी राहत अँधरा हो के, देखत नइ हन जाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।

कागज मा छम छम नाचत हे, सबो योजना खूब।
गाँव गली बस पहुँचे नारा,  धन हर जाथे डूब।
भ्रष्टाचार ह सड़क बनाथे, बइमानी हर पूल।
वादा के का मरजादा हे, पल मा जाथे भूल।

तभे कोलिहा सत्ता पाथे, रेंग टेडगा चाल।
फोकट खाये के चक्कर मा, होगे बारा हाल।

गजल : मानथे कइसे

कोन तोला जानथे अउ मानथे कइसे।
जान जाबे देख हाका पारथे कइसे।

का हे मन मा जानना हे कब सुवारी के,
देख ले रोटी बनावत सानथे कइसे।

जे मया मा मार खाके भी डटे रहिथे,
वो मयारू ले मया मा हारथे कइसे।

घाव जादा अउ पिराथे जान जाए ले,
बान सँगवारी लुका के तानथे कइसे।

कोन बेटा के अयासी देख पाथे ये,
बाप दू पइसा कमा के लानथे कइसे।

अमृत ध्वनि छन्द : फोकट खा खा

खा खा के फोकट कका, लोगन होय अलाल।
काम काज कछु नइ करय, बइठ झड़कथे माल।
बइठ झड़कथे, माल मलाई, कुकरा दारू।
जांगर कोढ़ी, होथे मनखे , बनय बजारू।
मार गरब मा,बोल उराठिल, बोलय भाखा।
स्वाभिमान ला, बेंचत मनखे, फोकट खा खा।

चोर मन ल चोर कहे म डर लगथे

चोर मन  ल चोर कहे मा  डर लगथे।
बइरी के तरुवा चाटे बर मर लगथे।

सत बर लड़ने वाला लड़ के मर जाथे,
साले तुमला साथ रहे मा जर लगथे।

मर मर के जीना भी का जीना ये,
लड़ के मर जाये बर जिगर लगथे।

कुकुर मन ला जूठा पतरी चाटन दे।
स्वाभीमानी ला रोटी जहर लगथे।

बड़े बड़े रावण के राज सिरा जाथे
झुठ के लंका मेटे म छीन भर लगथे।





प्रेरणा गीत : जीत उही ला मिलथे संगी।


जीत उही ला मिलथे संगी, थकय नइ जे हार के।
चलव, रुकव-झन हार मान तुम, मँजिल कहे पुकार के।



भागत- दउडत गिर जाथे जी, बने-बने ह खसल के ।
गिर के कोनो  नइ गिर जाये,  जे उठ जाय सम्हल के ।
नानकुन चांटी चढ़ जाथे;  माथा मा  पहाड़  के ।
चलव, रुकव झन ................

खुन्दा खुन्दा के पाँव तरी, जे माटी ह सनाथे ।
हड़िया बन के उही एकदिन, सबके प्यास बुझाथे ।
माटी सहीं सहे ला परथे;  पीरा ये सँसार के ।
चलव, रुकव झन .......

अन्न उपजाथे मिहिनत कर के, पर के कोठी भरथे।
अपन भुखन लाँघन रह के, भूख आन के हरथे।
सूरज ला जे रोज जगाथे, भिनसरहा मुंधियार के।
चलव, रुकव झन .......

दिन के सपना नइ सोवन दय, जे दिनरात जगाथे।
जे सपना के खातिर जागय, रद्दा नवाँ बनाथे।
कहाँ टिके हे बन के बाधा, जलधार पतवार के।
चलव, रुकव झन .......


अक्षर के सँग करौ मितानी, पढ़ लिख भाग जगावव।
सरग बना दव ये दुनिया ला, उजियारा बगरावव।
नवाँ बिहिनिया  आही रख दव, रद्दा ल चतवार के।
चलव, रुकव झन .......

खावन दे।

ना खाएं ना खावन दे।
न लाने न लावन दे।

दूध दही हो पाही कइसे,
जमय नही बिन जावन दे।


तरसत तन मन प्यास बुझा
घुमड़ घुमन के छावन दे।


आगी होंगे धरती अब, 
दे दे जल्दी सावन दे।

महुँ बरसहूँ जी भर के अब।
आज पिया ला आवन दे 


दु गीत मया के गावन दे।


दू गीत मया के गावन दे।
 दू गीत मया के गावन दे।


एक गीत यार जवानी के 
जिनगी के प्यार कहानी के।
एक गीत अमर बलिदानी बर।
लहू डबकात जे रवानी बर।

बिरवा मँय बोयें जिनगी भर, 
अब फूल सहीं ममहावन दे।

सब मीत मोर सब सँगवारी।
जावत हावे आरी पारी।
कब मोर बुलावा आ जाही।
कब साँस कहाँ थीरा जाही।

जब बोझ साँस के ढोवत हँव,
मन के मनमीत सुनावन दे।

कतको जाही कतको आही।
कवि अपन पिरा ल गोहराही।
ये दुनिया आनीजानी ये ।
जिनगी के इही कहानी ये।

ये रंगमंच मा आज महुँ ला,
रस घोरन दे बरसावन दे।









एक जंग अभी तक जारी है।

 जंग अभी तक जारी है।


इस दौर में भी, इस हाल में भी।
इस लड़खड़ाती चाल में भी।
लड़ना तो फिर भी पड़ता है, 
घिर कर संकट काल में भी।

दिल में जब तक चिंगारी है।
एक जंग अभी तक जारी है।


बैरी है बलवान तो क्या?
छुपा हुआ पहचान तो क्या?
हतास नहीं, निराश नहीं, 
मजबूर हुआ इन्सान तो क्या?

अभी हार कहाँ हमने माना,
क्या हुआ कि कुछ लाचारी है।

एक जंग अभी तक जारी है।

घुटनों पर हूँ, पर गिरा नहीं।
मुश्किल में हूँ, पर घिरा नहीं।
चल चल चल अभी चलना है, 
हूँ दूर बहुत, पर फिरा नहीं।

मंजिल तक जाना है मुझको,
कोई बात नहीं दुस्वारी है।

एक जंग अभी तक जारी है।


है सांस जहां तक दौडूंगा।
उम्मीद नहीं मैं छोडूंगा। 
जीवन है जीना ही होगा,
मैं डर कर मुँह न मोडूंगा।

कुछ लेना है कुछ देना है,
ले चुकाने दे जो उधारी है।

एक जंग अभी तक जारी है।


छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल : कोन लिखथे साँच अब अखबार मा ।





कोन लिखथे साँच अब अखबार मा।
बेंच दे हे सब कलम बाजार मा।

मुँह ल खोले के जुलुम होगे हवे।
काट मोरो  घेंच ला तलवार मा।

हाँ तहूँ जी भर कमा ले लूट ले,
तोर मनखे बइठगे सरकार मा।

नाँव के खातिर मरे सनमान बर।
रेंगथे कीरा सहीं दरबार मा।

हे मया कइसे तहूँ हर मान बे,
बेंच दे न बिक जाहुँ बाजार मा।

नइ मिलय मन के मिलौना मोर कस
खोज के जा देख ले संसार मा मा।

बिन मरे कोनो सरग नइ पाय जी,
दुख दरद भरपूर  मिलथे प्यार मा।

मापनी  2122 2122  212

अमृत ध्वनि : मोर कराही




मोर कराही कस हृदय, सब बर हे अनुराग।
माढ़े आगी के ऊपर, दबकावत हँव साग।
दबकावत हँव, साग सबे बर, किसम किसम के।
हरदी मिरचा, मरी मसाला, डारँव जमके।
मन के भितरी,पोठ चुरत हे,  साग मिठाही।
कलम ह करछुल, कविता मोरे,मोर कराही।

छत्तीसगढ़ी गजल : सच कहें ले काय होही।







सच कहे ले काय होही।
झूठ हर भरमाय होही।

जे लबारी मार लेथे,
पेट भर के खाय होही।

देश आगी मा जरत हे,
कोई तो सुलगाय होही।

पोठ पहरा हे पुलिस के, 
चोर मन जुरियाय होही।

भूख  मा लइका बिलखथे,
भात दाई लाय होही।

मँय इँहा बिजहा मया के,
बोंय हँव ममहाय होही।

छोड़ देअब तँय सियानी,
शेर मन हा गाय होही।

फेर मनमाने पियत हे,
आज धोका पाय होही।


 मापनी  2122 2122

सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।



सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

सुवा करमा अउ ददरिया,   पण्डवानी अउ जसगीत हे।
किस्सा कहानी आनी-बानी ,कतका मया पिरित हे ।
मुँह म ये रस घोरत रहिथे, जइसे मीठ बतासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारू,  छत्तीसगढ़ी भासा हे।

हमर ये महतारी भासा , हमर गरब गुमान ये।
जे अप्पड़ के भासा कहिथे, वो सिरतोन वो नदान ये।
हम तो सीना ठोक के कहिथन, इही परान के आसा हे।
सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

सारी दुनियाँ  अपने भासा, मा करथे  सब काम जी।
लिखथे -पढ़ते अपने भासा,  करथे जग मा नाम जी।
हमर राज बर छत्तीसगढ़ी, इही हमर अभिलासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

बड़े-बड़े गुनी गियानी मन, साहित्य ला सिरजाये हे।
दुनियां भर म एकर मया के, झंडा ल फहराये हे।
अपने घर म तभो ले काबर, रही जाथे ये  पियासा य
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

स्कूल कालेज, कोट- कचहरी, छत्तीसगढ़ी बोलव जी।
विधानसभा के दुवारी ल, महतारी बर खोलव जी।
बैरी मन ह खेल करत हे, जस  सकुनी के पासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

हमर राज ला हमी  चलाबो,  रद्दा नांवा गड़बो जी।
हमरो विकास होही जब हम,  अपने भासा पढ़बो जी।
परबुधिया मन काय समझही, का तोला  का मासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

लड़े ब परही त लड़ जाबो , छत्तीसगढ़ महतारी बर।
मरे बर परही त मर जाबो, अपने घर अउ दुवारी बर।
हमरे राज मा हमी भिखारी, बस अतके हतासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु ,छत्तीसगढ़ी भासा हे।


 

विशिष्ट पोस्ट

रूपमाला छन्द

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