मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,

सपना भर निराला दिही


सपना बने निराला दिही।
रोज नवाँ  घोटाला दिही।

नेता  बड़े हरय  देश  ला
डवकी,लइका, साला  दिही।

चाबी दे दे हवे चोर ला,
फ़ोकट मा अब ताला दिही।

अखबार चलाने वाला मन ला
रोज नवाँ मसाला दिही।

रेती,सिरमेंट,छड़ खाने वाला
भुखउ ला काबर निवाला दिही।

काम कोनो ला नई देवय
जपे बर सबला माला दिही ।

हर  चौक मा दारू भट्टी ,
हर हाथ म प्याला दिही।।

सबे इहाँ हे खाखाये भुखाय,
कोन हा  कोन ला,काला दिही।।

'प्रसाद' अपन घर ला जला जला के '
कब तक पर ला उजाला दिही।

मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

अपन पियास बुझात हे


बबा किहिस मोर ले
एक सवाल हे तोर ले
ये जो रोज रोज  चीखने -चिचियाने वाला
मन कोन  ए ?


 जेन भुखाय हे ?
जेन पियासे हे?
जे  बेघर हे ?
जे  नंगा हे ?
का उकर दंगा हे?


में चेथी  ल  खजवावत
बने सोचेंव 

अउ गोठियायेव
ये बाबा तँय नइ जानस !
वो मन कइसे चिल्लाही ? 


वो बिचारा मन तो 

अपने मारे मरत
कलेचुप मौन हे
त तहीं  बता न रे नाती!
ये चिचियाने वाला कोन हे?  

कोन हे ? 
कोन हे?


मँय  कहवे बबा!
इही बात के तो रोना हे

इहाँ आन के गाय अउ 
आन के दुहना हे।

इहाँ उही मन चिल्लात हे /
जेन मन देश आजादी  के 

बाद ले  अब तक ,
हमर भूख अउ गरीबी ला 

सवारथ बर  भुनात हे/
हमर पियास ले, 

अपन पियास  बुझात हे।


* मथुरा प्रसाद  वर्मा "प्रसाद"

शिक्षा कब मिलही

तरिया पार म बइठ के 
 बाबा ह करे मुखारी।
आती जाती लोगन मन पूछय हाल।

अब नई पूछय कोनो कोनो ले
कहाँ जात हस
कब लहुटबे।
सबे झन 
अपन अपन म बूड़े हे । 

पढ़े लिखें के इही सुभीता
कोनों ला कोनों ले 
कोनों  मतलब नई हे।

गाँव गाँव  मा  स्कुल खुलगे।
बड़े बिहिनिया लोग लइका
स्कूल जाथे।

स्कूल मा अब लइका मन ला 
सब मिल जाथे।
खाना /पीना , 
कापी पुस्तक 
ओनहा कपड़ा  । 
शौचालय घलो अब स्कूले मा बनगे 
  चकाचक । 

गुनत रइथे काका दाई हा 
अब स्कूल मा लइका मन ला 
कब शिक्षा मिलही
जिहा हमर लइका
थारी धर के पढ़े बर जाथे । 


मथुरा प्रसाद वर्मा" प्रसाद'

छत्तीसगढ़ के पूत

भाजपा नेता माननीय श्री सोहन पोटाईजी नेएक जन सभा को सम्बोधित करते हुए आउट सोर्सिंग के खिलाफ खुलकर अपनी बात रखी। उनके साहस को सलाम।

बात तो सही बोलेव , पोटाई जी ।
आप तो मुह खोलेव , पोटाई जी।

आउट सोर्सिंग के सच बोले हव।
सरकार।के नियत खोले हव।
छत्तीसगढ़िया मजबूर के कतका।
कसाई के हाथ म छेरी जतका।
पार्टी अनुशासन टोरेव फेर ,
माटी के संग होलेव पोटाई जी।

माटी के तै कर्जा चूका दे।
चट्टू मन के मुड़ ल झुक दे।
छत्तीसगढ़िया शेर दहाड़े।
कुनीति के जबड़ा फाडे।
देर करे फेर आखिर बोल े
भेद बड़े खोलेव , पोटाई जी।

जिए-खाये बर परदेश जाथन।
जांगर तोर हमें कामथन।
तभो ले नई हे हमर बनौती।
जिनगी हमर रोज।चुनौती।
चीख चीख के आज गली म
पीरा ल हमर रो लेव पोटाई जी ।

बाहिर के जब नेता मंत्री।
बाहिर के सब ऑफिसर  सन्तरी।
का करही ये हमर उद्धार।
बैपारि ये करही बैपार ।
छत्तीसगढ़िया जोहर हे तोला
स्वाभिमान दिल म घोलेव , पोटाई जी।

मथुरा प्रसाद वर्मा प्रसाद

तै पढ़ा तै पढ़ा तै पढ़ा गुरूजी।

तै पढ़ा,तै पढ़ा , तै पढ़ा गुरूजी।



रहय कोनो झिन अड़हा गुरूजी।।
तै पढ़ा, तै पढ़ा ,तै पढ़ा गुरूजी।।



एक-एक कक्षा,सौ सौ लइका;
              हर लइका ल ज्ञान दे ।
का व्यवस्था,का बेवस्था ;
             एला तै  झिन धियान दे।

तोरे भरोसा हे कइसनो कर फेर;
तही ह जोखा ल मढ़ा गुरूजी।।


तै पढ़ा, तै पढ़ा ,तै पढ़ा गुरूजी।।


जेन लइका स्कूल नई आवय,
               ओला स्कूल म लाने ल परही।
निति हे शासन के चाहे बिन चाहे ;
                   तोला ,ओला माने ल परही ।

शिक्षा झिन मिलय फेर साक्षर बनाना हे।
नाव ल रजिस्टर म चढ़ा गुरूजी।।


तै पढ़ा तै पढ़ा तै पढ़ा गुरूजी ।



फोकट म सब ला ,सब कुछ चाही
                 नवा जमाना के इही लोकतन्त्र ये ।
चलनी म चाल फेर रजगा झन निकालबे
            सस्ता लोकप्रियता के इही मूलमन्त्र ये।

खिंच-तान अउ ढकेल-पेल फेर;
सबो ल आघू बढ़ा गुरूजी।


तै पढ़ा, तै पढ़ा, तै पढ़ा गुरूजी।



न बने बिजहा,न उपजाऊ भुइयां;
                 न बने खातू , न हवा पानी ।।
परही तुतारी , तुही ल रे  बइला;
                   तोरे भरोसा होही किसानी।।



न समय पे तोला मिलही रे चारा
फेर फसल रहय झन  कड़हा गुरूजी ।।


तै पढ़ा,तै पढ़ा, तै पढ़ा गुरूजी।



   मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद'
   ग्राम-कोलिहा ,लवन 
       बलौदाबाजार  छ ग 
           8889710210 ु

मुक्तक छत्तीसगढ़ी



                         1.
बहुत अभिमान मँय करथौं,छत्तीसगढ के माटी मा।
मोर अंतस जुड़ा जाथे, बटकी भर के बसी मा।
ये माटी नो हाय महतारी ये, एकर मान तुम करव 
बइला आन के चरथे, काबर  तुम्हर बारी मा।
                       2
मँय तोरे नाँव लेहुँ , तोरे गीत  गा के मर  जाहूं ।।जे तै इनकार कर देबे,  कुछु खा के मर जाहुं ।।अब तो लगथे ये जी हा जाही,संगी तोर मया मा,  
कहुँ हाँ कही देबे, त मय पगला के मर जाहुं ।।

                      3
ये कइसे पथरा दिल ले मँय हा काबर प्यार कर डारेंव ।। 
जे दिल ला टोर के कईथे,का अतियाचार कर डारेंव ।।
नइ जानिस वो बैरी हा, कभू हिरदे के पीरा ला, 
जेकर मया जिनगी ला,मँय अपन ख़्वार कर डारेंव।।

                     4
मोरो घर मा देवारी कस, दिया दिनरात जरत हे फेर।।
महूँ ला देख के कोनो,अभी ले हाथ मलत हे फेर।।
मँय तोरे नाँव  ले ले के, अभी ले प्यासे बइठे हौं
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर, बादर बरसत हे फेर।।

                    5

महूँ तरसे  हँव तोरे बर, तहुँ ला तरसे ला परही 
मय कतका दुरिहा रेंगे हौ,तहूँ ला सरके ला परही।।
मँय तोरे नाँव के चातक,अभी ले प्यासे बइठे हौं
तड़प मोर प्यास  मा  होही त तोला बरसे ला परही।
                   6
मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।
तोर घर रोज महफिल अऊ,मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहुँ भर पेट नइ खावस,महुँ भर पेट नइ खावव 
तोला अब भूख नइ लागय,,अउ मोर जुच्छा थारी हे ।

                          7 
कभू करथे दिल मोरो,  के मँय देवदास हो जातेंव।।
नई परतेंव तोर  चक्कर मा त कुछु ख़ास हो जातेंव।।
अगर होतिस सिलेबस मा,तोरे रूप के चर्चा;
ता एसो के परीक्षा मा ,महुँ हा पास हो जतेंव।।

                            8   

उही मा राजी ख़ुशी हे, जेला हम पा जाथन ।
प्यार से कोनो बलाथे, त हममन आ जाथन।
तुहीं मन राख लव , मया म तराजू धर के,
हम तो मुहब्बत म मलोवन,घलो बेचा जाथन।

                             9


तहीं हा टोर के बँधना मया के चल देथस।
कुँवर करेजा ला गोड़ मा मसल देथस।
मँय खड़े हावव अभी ले तोर अगोरा मा,
तीर मा आ के तँय हा बदल देथस।

प्रेम गीत: जिनगी सरहा पताल होगे


जिनगी सरहा पताल होगे।
तोर मया जी के जंजाल होगे।


छुटगे जम्मो सँगी-सँगवारी ,
घर मा  घलो बारा हाल होगे।

नइ  बाँचव मँय हा हाय ददा ।
ये बोकरा फोकट हलाल होगे।


उत्ती बुड़ती रात-दिन तोर सुरता
हिरदे मा ये का भूचाल होगे।


जबरन मँय देखेव तोर सपना
गाँव भर मा फोकट बवाल होगे।



जेन दिन बिहिनियां तोला देखव
मोर बर उही नावाँ साल होगे।

 जेन हा  सिरतोन मया मा लुटगे, 
'प्रसाद' उही  मालामाल होगे।



हे कुर्सी देव


हे कुर्सी देव तोर महिमा हे भारी।।
देश के जम्मो नेता तोरे हरन पुजारी।।



हमला तो रइथे तोरेच आसरा 
चाहे बैठन हम चाहे हमर सुवारी।।



तोरे दरस बर बन जाथन भिखारी।
तोरे खातिर जनता के सूनथन गारी।



तोला गवां के कुकुर अस गिजरथन
हवा म उडाथन तय जब बनथस संगवारी।


हे कुर्सी देव ....

घेरी बेरी तोरे ख़ातिर मारत हन लबारी ।
तोर बिना नई होवय ककरो चिन्हारी।



तोरे किरपा ले झड़कथन रसगुल्ला
तोर बिना पर जाथे चाटे बर थारी ।।



तोरे ऊपर बइठ के तोर करथन रखवारी।
पांच बछर नई आवे फेर हमर पारी ।



आज जेन मन हमर आगुपाछु गिंजार्थे 
हांव हांव करही वो कुकुर मन सरकारी ।



हे कुर्सी देव ......


ये रचना मोर बहुत पहली के ये 
दैनिक भास्कर माँ प्रकाशित घलो हो चुके हे

अब फेर आही

मुक्तक

बहुत अभिमान मँय करथव, छत्तीसगढ़ के माटी मा।
मोर अन्तस जुड़ा जाथे बटकी भर के बासी मा।
ये माटी नो हय महतारी ये,एकर मान तुम करव,
ये बइला आन के चरथे, काबर हमर बारी मा।

मय तोरे नाव लेहूँ, तोरे गीत  गा के मर  जाहूं ।।
जे तँय इनकार कर देबे, त  कुछु खा के मर जाहुं ।
अब तो लगथे ये जी हा जाही संगी तोरे  मया मा
कहुँ इकरार कर लेबे, त मँय पगला के मर जाहुं ।।

ये कैइसे पथरादिल ले, मँय हा काबर प्यार कर डारेव ।
जे दिल ल तोर के कहिथे का अतियाचार कर डारेव।
नइ जनिस वो बैरी ह कभू हिरदे के पीरा ला,
जेकर मया मा जिनगी ला मँय अपन ख्वार कर डारेव।

मोर घर म देवारी के दिया दिनरात जलते फेर।
महूँ ल देख के कोनो अभी तक हाथ मलत फेर।
मैं तोरे नाव  ले ले अभी तक प्यासा बइठे हौ
मोरो चारो मु़ड़ा घनघोर  बादर बरसथे फेर।।
                    
महू तरसे हव तोरे बर, तहु ल तरसे ला परही।
मँय कतका दुरिहा रेंगे हँव,तहूँ ल सरके ला परही।
मँय तोरे नाव क चातक अभी ले प्यासा बइठे हौं,
तड़प मोर प्यास  म  होही त तोला बरसे बर परही।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।
तहु भर पेट नई खावस, महु भर पेट नई खावव,
तोर अब भूख नई लागय, मोर करा जुच्छा थारी हे ।

छत्तीसगढिया शायरी


नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।। 
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।। 
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।।



मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव 
तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

अब फेर आहीं


अब फेर आहीं हमर दुवारी वो मन ।।

करही एक दूसर के चारी वो मन।।



काबर कि आवत हे अब फेर चुनाव।

बन जाहीं हमन के संगवारी वो मन।।



देखाहीं हमला फ़ेर सुराज के सपना

मारहीं आनीबानी के लबारी वो मन ।।



अभी तो माढ़ ही इखर गोड़ भुइयां मा

फेर आगास मा उड़ाही वो मन।।



हम मन ला भुला जाही पांच बछर फेर

कुर्सी के करही रखवारी वो मन ।।

सड़क

ये डबरा ला तुमन सड़क कहिथौ।।
इहाँ गिरे मा झन भड़क कहिथौ।।

जे बात कहे म लाज आना चाही
 वो बात ला तुमन बेधडक कहिथौ।

वोट मागे बर मोर दूवारी आ के
मुहीच ला थोर कुन सरक कहिथौ।।

मै बात कही देव कबर कि सिरतोन
मोला दू चटकन झड़क कहिथौ।

मार देही मोला,


मार देही मोला, फेर मि‍टा नई सकय
ए रद्दा ले कोनो, हटा नई  सकय
मया आंव संगी, हिरदे मा रहि जाहूं
मोर हस्‍ती ला कोनो, भूला नई सकय
मोर हाडा कठवा आय, भुंजा जाही फेर
आगी ले डेरा के कोनो, पिघला नई  सकय

कारी मोटियारी टुरी रोपा लगात हे ।।


माडी भर चिखला मा तन ला गडाए, 
 कारी मोटियारी टूरी रोपा लगात हे ।।
असाढ के बरसा मा तन ला भिजोए, 
 अवइया सावन के सपना सजात हे ।।

धान के थरहा ला धर के मुठा मा, 
 आज अपन भाग ला सिरतोन सिरजात हे ।।
भूख अउ पियास हा तन ला भुला गे हे, 
जांगर के टूटत  ले गउकिन  कमात हे ।।

मेहनत के देवता ला आज मनाए बर,
 माथ के पसिना ला एडी मा चुचवात हे ।।
सावर देह मा चिखला अउ माटी के, 
 श्रृगार हर मोर संगी कइसन सुहात हे ।।

भिजे ओनहा ला सरीअंग मा लपेट के , 
कोन जानी कोन धन ला छुपात हे ।।
सुरूर सुरूर चारो कोती चलत पुरवाई मा, 
 गोरी के जाड मा ओठ कपकपात हे ।।

सिर तोन कहत हव  कवि देखके वोला , 
तन मा लगत हे आगी मन हा जुडात हे ।।
 महादेव लागत हे जइसे आज पारवती के, 
 प्रेम मा मतंग हो के मदरस बरसात हे ।।


कभू खिलखिला के हासे करे रे ठिठोली, 
 कोन जनी  का सोच के  मने मन लजात हे ।।
गीत गा के मनमोहनी हिरदे मा हुक मारे, 
 अउ कभू नाचे सही कनिहा डोलात हे ।।

देख के रूप गोरी के मय हो गेव पानी पानी, 
देख के देखत मोला मुड ला नवात हे ।।
ताना मारे सहीं अपन संगी संगवारी मन ला, 
कोन  जाने कोन भाखा म काय समझात हे ।।

जतिक तउरत हौ मै हा डूब डूब मरत हावव, 
प्‍यास मोर काबर आज नई सिरात हे ।।
गुरू मोर मन ला छोड आज कहां चलदे तै, 
अब मोला कोनो नहीं रददा बतात हे ।।

                       मथुरा प्रसाद वर्मा   प्रसाद
gurturgoth मा  घलो हे

मोला रोवासी आ जाथे ।


देख के इकर हाल मोला रोवासी आ जाथे । ।।
रोए नी सकव मोर मुँह मा अब हाँसी आ जाथे ।।

आज काल के लइकामन भुला गिन मरजादा,
मुहाटी मा आके सियान ला तभो खासी आ जाथे ।।

बरा अउ सोहारी बेटा बहु रोज खाथे ,
सियानिन के भाग मा बोरे बासी आ जाथे ।।

पढ लिख के बेटा हा हो गेहे सहरिया ,
हाल पुछ बर कभू कभू चपरासी आ जाथे ।।


                     मथुरा प्रसाद वर्मा   प्रसाद
                                               8889710210 

मोर देश मा बाढ़त खरपतवार के निंदाई कोन करही ।



बबा कहिथे  कस  रे नाती !
ये का हे तोर खुरापाती !

खेत-खार मा कतका बुता परे हे !
फेर तोर आँखी कोन कोती गड़े हे !

ए बाबा !
ते मोला बता
घान हा बोवागे,
खातु घलो  छितागे,
त अउ का बुता परे हे ?

अरे बईहा ! 
जा बारी-बखरी ला बने निहार !
चारो डाहार खरपतवार बाडहे हे
तेन ला चतवार !

ये बेलिया ,दुबी अउ किसम -किसम के कांदी मन
भकभक ले जामे हे ।
 भाटा मिरचा अउ पताल  बेसहारा 
भुइयां मा लामें हे ।

जम्मो खातू  के रोस ला 
खरपतवार मन  तीरत  हे  ।
अउ साग -भाजी मन
 मरत गिरत हे ।

देखते-देखत बारी मा
बन हा  पट्टा जाही!
तोर का तभे चेत आही !

तेकरे  सेती
 इकर निंदाई जरूरी हे।
फेर बबा ! 
मोरो एक ठन मजबुरी हे ।

हमर देश मा धलो चारो कोती
किसम -किसम के भष्टाचार के खरपतवार
उपज गेहे
जेन मन विकास योजना के खाद ला 
चुसत हे ।
फेर तोर  दिमाग मा ये बात 
नई घुसत हे ।

आम जनता कमा कमा के मरत हे !
फेर ऐ भ्रष्ट नेता अउ  अधिकारी  मन
 काकरो सनसो नई करत हे ।



चरो डहार भ्रष्टाचार, बेइमानी अऊ  रिश्वतखोरी  के जोर हे ।
जनता के सेवक बने सब
 भ्रष्ट ,बेईमान अउ कामचोर हे।
अउ जनता  बिचारा होवत कमजोर हे ।

तेकरे सेती बबा मोर गोठ ल तै बने कान देके सुन।
अउ मने मन गुन ।

जइसे निंदाई बिना तोर खेत खार लाचार हे ।
वइसन हमर देश धलो  ये  रोग ले बिमार हे ।

जमो झिन  अपनेच  सनसो करही!
त मोर  देश मा बाढ़त खरपतवार के निंदाई कोन करही ।

हाइकु


ए मनटोरा
आ जाबे मोर घर
तोर  अगोरा

रात पहागे
काबर मोर घर
घुप अंधेरा ।

गरू हो जाथे
बाढ़े बेटी घलो हा
मुड़ के बोझा ।

चुनाव आगे
घर घर पउवा
रोज बटाही

का मजबुरी
विधायक बनगे
रेमटी टुरी ।

ग्राम सुराज
जुरमिल मसक
काय के लाज ।

ग्राम सुराज
सरपंच के दारू
कुकरा आज ।

तोर नाव के
हाथ मा गोदना हे
मन मा मया ।

दिया बुझागे
गरीब के घर मा
तेल सिरागे ।

पढ़ डारेस
अब सड़क नाप
मिलगे ठेका ।

मोर दुवारी
संसद होगे कर
चुगली चारी ।

शिक्षित माने
अब कोनो काकरो
काबर माने ।

नवा जमाना
पेट  के भितर ले
जम्मो सियाना ।

का रे कारी, कारी नैना हा तोर !!




का रे कारी, कारी नैना हा तोर ।
अइसे मारे बान, जीव ल लेवत हे मोर ।

घर ले जब निकलथव, रुक रुक के चलथव ।
कतको सम्हलथव , मँय तभो ले हपटथव ।
खचवाँ डिपरा दिखय नहीं, दिखथे चेहरा तोर ।
 का रे   कारी, कारी नैना हा तोर ---

काबर तँय इतराथस, मोला देख के बिजराथस !
मोर तीर नइ बोलस अउ पर सँग बतियाथस !
मर जाँहु अइसे झन दाँत ला निपोर ।
का रे कारी,  कारी  नैना हा  तोर ---

झाँक ले न मन भीतर, सूरत मा झन जा।
अपन बना ले मोला, रानी मोर बन जा।
दिया बार कर दे ना जिनगी मा अंजोर---








प्रेरणा गीत : जीत उही ला मिलथे संगी

जीत उही ला मिलथे संगी,
                   नई थके जेन हार के
चलव, रुकव झन,हार मान तुम , 
                   मंजिल कहे पुकार के !

भागत- दउडत गिर जाथे जी,
                     बने-बने हा खसल के !
गिरे ले कौनो नइ गिर जाये,
                  जे उठ जाथे समहल के !

नानकुन चांटी चढ़ जाथे ; 
                      मुड मा  पहाड़  के   !
चलव, रुकव ................

गोंड  मा पर  के जे माटी  ह,
                    खूंदा-खूंदा  के सनाथे !
एक  दिन उही हड़िया बन, 
                मनखे  के प्यास  बुझाथे !


मांटी सही सहे ला परथे; 
                         पीर ला संसार के !!
चलव, रुकव ................

अपन भूखन लांघन रही के ,
                       पर के पेट ला भरथे !
पईयां लागव  मैं  किसान के,
                जे घाम, जाड सब सहिथे !


सूरज ले पहली उठ जाथे;
                   भिंसरहा मुन्धियार  के !
चलव, रुकव ................

आज तुम्हार राज के बीत गे जमाना !!

आज तुम्हर राज के बीत गे जमाना  !!
जाग गिस जनता तुम्हर नई हे ठिकाना !!

देखो-देखो नेताजी खिसलत हे कुरसी !
टोर के तिजोरी तुम्हर,भागत हे खजाना !!

बोतल के लालच म नई अब मिले वोट !
अब लेड़गा समारू घाले हो गे हे सियाना !!

मार के लबारी कब तक भूलवारे रहू हमला !
लबरा मन के अब नई चले बहाना !!

जनता के कमाई म मसकेव रसगुल्ला !
अब कहाँ पाहू  तुमन एको ठन  दाना !!

कुम्हकरनी नीद ला अब  टोरेच ला परही !
कभू बाबा रामदेव ,कहू बन के आन्ना !! 

घोटाला के घोल !

घोटाला के घोल पी-पी के ;
जम्मो झन्न घोला गेव रे !
जेकर खातिर नेता बनेव ;
उही जनता ला भुला गेव रे !

लोगन के गोड़ मा चप्पल नई हे ;
हवा म उडव बेईमान मन !
तुमन खाव्व छक्कत ले
भूखन मरे किसान मन !

अब तो फंदहू मुसवा कस
कहाँ  जाहु सैतान मन !
जेल के रोटी अगोरत हे तुमला ;
अमरव जल्दी जजमान मन !



हे कुर्सी देव तोर महिमा हे भारी !

हे कुर्सी देव तोर महिमा हे भारी ।
देश के जम्मो नेता हे तोरे पुजारी ।
हमन ला रहिथे  तोरेच आसरा ;
चाहे बईठन हम, चाहे हमर सुवारी ।

तोरे दरस बर, बन जाथन भिखारी ।
तोरे खातिर जनता के सुनथन गा गारी ।
तोला गवा के कुकुर कस किंजरथन;
हवा मा उड़ाथन  जब बनथस संगवारी ।

घेरी-बेरी तोर खातिर मारत हन लबारी ।
तोर बिना नि होवे ककरो चिन्हारी !
तोर किरपा होवे मा, झडकथन रसगुल्ला।
तोर बिना पर जाते कहते बर थारी ।

तोर ऊपर बैठ के ,तोर करथन सवारी ।
पाँच बच्छर फेर नि पवन अब हमन बारी ।
आज जेन मन हमर आगू पछु गिजरथे;
हांव-हांव करही वो कुकुर मन सरकारी ।




हो गेहे रे मन मोर बावरा हो गेहे !!

हो गेहे  रे ..........
मन मोर बावरा 
 हो गेहे !!
खो गेहे रे .......
गांव के गली मा
खो गे हे !

गांव के माटी जैसे चन्दन !
झूमे तन मोर ,नाचे मन !

मन  आके मगन इन्हाँ  हो गे हे !!

बाइला के घंटी घन-घन,घन-घन  !
चूहे माथा के पसीना जैसे कुंदन !!

घटा करिया सघन इंहा हो गे हे !!

खेत खर हरियाली छाही जी
घर घर माँ खुशिहाली आही जी

देखो करिया गगन हो गे हे !!

खपरा ले चूहे मोती छन-छन  !
नरवा नदिया के चढ़ गे यौवन !

धरती के बदन धो गे हे !!

आज के मार्डन नारी मन !


आज के मार्डन नारी मन ।
ये फैसन के पुजारी मन ।
मार डारिन गा हमला संगी,
ये बड़भारी बीमारी मन ।


अपन  करै सब ठठ्ठा हंसी ।
हमर घेच माँ लगथे फासी। 
हमर हो जाथे बदनामी, 
बाँच जथे कुवारी मन ।

कपडा पहिरे आनी-बानी।
इसनो पाउडर  के मनमानी।
देखत जीवारा मा उतरथे,
ये मीठी कटारी मन।

चटक मटक  दिखे सनान।
अऊ नैना के मारे  बान।
छीन भर मा ले लेते परान,
ये चतुर  शिकारी मन।

रूप के ये मन जाल  बिछा के।
कभू  हांस के कभू लजा के।
बेंदरा सरिक नांच नचाथे;
हमला ये मदारी मन। 


हम तो अड़हा केअड़हा रही गेन
कोनो ला कुच्छु नइ कहेंन।
हमर समझ मा कभू नइ आइस;
अइसन दुनियादारी मन।


घर के राज दुलारी मन। 
ये कनियाकुवारी मन।
हमर जान  के दुश्मन आय।
बाँच के रहू संगवारी मन।



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