मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,

सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।



सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

सुवा करमा अउ ददरिया,   पण्डवानी अउ जसगीत हे।
किस्सा कहानी आनी-बानी ,कतका मया पिरित हे ।
मुँह म ये रस घोरत रहिथे, जइसे मीठ बतासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारू,  छत्तीसगढ़ी भासा हे।

हमर ये महतारी भासा , हमर गरब गुमान ये।
जे अप्पड़ के भासा कहिथे, वो सिरतोन वो नदान ये।
हम तो सीना ठोक के कहिथन, इही परान के आसा हे।
सब भासा ले मीठ मयारू, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

सारी दुनियाँ  अपने भासा, मा करथे  सब काम जी।
लिखथे -पढ़ते अपने भासा,  करथे जग मा नाम जी।
हमर राज बर छत्तीसगढ़ी, इही हमर अभिलासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

बड़े-बड़े गुनी गियानी मन, साहित्य ला सिरजाये हे।
दुनियां भर म एकर मया के, झंडा ल फहराये हे।
अपने घर म तभो ले काबर, रही जाथे ये  पियासा य
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

स्कूल कालेज, कोट- कचहरी, छत्तीसगढ़ी बोलव जी।
विधानसभा के दुवारी ल, महतारी बर खोलव जी।
बैरी मन ह खेल करत हे, जस  सकुनी के पासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

हमर राज ला हमी  चलाबो,  रद्दा नांवा गड़बो जी।
हमरो विकास होही जब हम,  अपने भासा पढ़बो जी।
परबुधिया मन काय समझही, का तोला  का मासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु, छत्तीसगढ़ी भासा हे।

लड़े ब परही त लड़ जाबो , छत्तीसगढ़ महतारी बर।
मरे बर परही त मर जाबो, अपने घर अउ दुवारी बर।
हमरे राज मा हमी भिखारी, बस अतके हतासा हे।
सब भासा ले मीठ मयारु ,छत्तीसगढ़ी भासा हे।


 

कुण्डलिया प्रसाद के

भूख गरीबी ले भले, जनता हे लाचार।
फुलत फरत हावे तभो, कइसे भ्रष्टाचार।
कइसे भ्रष्टाचार, नाग कस फन फैला के।
लीलत हावय देश, धरम ला बिख बगरा के।
निज स्वारथ जे लोग,  बने हे चोर फरेबी।
हे उखरे बैपार, हमर ये भूख गरीबी।

 बेचावत हे न्याव हा, खड़े बीच बाजार ।
संग धरे हे चोर के, अब जम्मो रखवार।
अब जम्मो रखवार, लूट के खा थे सबला।
काकर तिर गोहार, करय जी जनता अबला।
अपराधी मन पोठ, रोज होवत जावत हे।
लोग बने लाचार, न्याव हा बेचावत हे।

जन गन मन के साथ मा, हे अधिनायक कउन।
जय हे स्वारथ साधना, भाग्य विधाता मउन।
भाग्य विधाता मौन, खड़े हे काबर बोलय ।
लोकतंत्र  मा लोक, कहाँ हे राज ल खोलय।
राजनीति हा बोंय, हवे ये बीज पतन के। 
धन बल  छल अटियाय, चलय ना जन गन मन के।




छत्तीसगढ़ी गजल : हवा अब आन दे।


बात के बड़का महल झन तान दे।
पेट खाली हे हवा अब आन दे।

तँय सियासत के कहानी झन सुना,
छोड़ ओला बाँध के अब पान दे।

पोठ चारी गाँव भर के कर डरे। 
जा अपन घर मा घलो अब ध्यान दे।

मुड़ म चढ़ के एक दिन वो नाचही,
नीच मनखे ला बड़े झन मान दे।

रोज पथरा हा मनाये मानथे ,
वो नहीं माने करेजा चान दे।

झन गवा बिरथा उमर ला प्यार बर।
ये जवानी देश खातिर जान दे।

साग भाजी होय हे सपना सहीं, 
रोज चटनी रोज बासी खान दे।

फेर काली मँय मयारू आ जहूँ।
रात होगे अब मोला घर जान दे।

मापनी 2122 2122 212

भक्ति के पद : मोर दुर्गा दाई


मोर दुर्गा दाई, चरण ल तोर पखारँव।
अपन चरण के दास बना ले, अँगना  तोर बहारँव।
जनम सफल हो जाथे जबजब, नाँव ल तोर उचारँव।
दिन दुखी के आस तहीं वो, कोन द्वार गोहारँव।
कर के किरपा दरसन दे दे, जब जब नैन उघारँव।
जीत हार सब बिरथा जग के, दर तोरे सब हारँव।
भाव भजन नइ आवय मोला, जुच्छा चरण दुलारँव।








छत्तीसगढ़ी गजल : साथ मा उखरे सदा जन जन चलय।


साथ मा उखरे सदा जन जन चलय।
तोल के जउने जबो के मन चलय।

काम आथे आदमी के हौसला,
जब बिपत मा छोड़ के सब झन चलय।

तोर छाती  पोठ कर पथरा सहीं ,
बिन सहे काकर इँहा जीवन चलय।

देख के अनियाव मँय ललकारहूँ।
सामने गोली भले दनदन चलय।

का डराही मउत ले वो मन भला, 
जान ले के हाथ मा जेमन चलय।

जीत उखरे चूमथे खुद  पाँव ला 
हार ला बोझा बनाये झन चलय।

नाँव उखरे लेत हे संसार भर 
छोड़ के घर बार जे मन बन चलय।

मापनी 2122 2122 212 

छत्तीसगढ़ी गजल : आदमी हा आदमी ला खात हे।

2122 2122 212 

भूख मनखे ला कहाँ ले जात हे।
आदमी हा आदमी ला खात हे।

रोज चर्चा होत हे अखबार मा,
राजनेता बइठ  के पगुरात हे। 

चाट के हम नून बासी खात हन, 
प्याज आलू के कहाँ औकात  हे।

प्यार के माने बदल गे आजकल,
जेब भारी देख दिल हरियात हे।

भ्रष्ट होगे सब व्यवस्था देख तो,
देश करजा मा बुड़े चिचियात हे।

धान के बिजहा लगा के रोत हन
खेत मा  करगा खड़े अटियात हे।

का भरोसा हम करन बरसात के।
रोज बादर हा घलो तरसात हे।

कोन थारी भर मया परसे  भला, 
दार नइ हे तब  रिसाए भात हे।


रूपमाला छन्द गीत : लेस दे जे घर अपन वो मोर सँग मा आय।

youtube पर यह कविता सुने
देख के रद्दा म काँटा मँय मढाथव  पाँव।
अउ दही के भोरहा कपसा घलो ला खाँव।
झन कहूँ बिजहा मया के बोंय के पछताय।
लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

मँय कबीरा मँय ह मीरा, मँय ह अनगढ़ गीत।
जीत के सब हार गे हँव, हार के जग जीत।
मोर धन ला बाँट कतको, रोज बाढ़त जाय।
लेस दे जे घर अपन वो मोर सङ्ग मा आय।

फूल पर के भाग काँटा मोर हे तकदीर ।
मोर मन ला भाय सिरतों ये मया के पीर।
रोय भीतर फेर बाहिर हाँस के मुस्काय।
लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।

घाम सह के प्यास रह के जे नही अइलाय।
जे भरोसा राम के तुलसी सहीं हरियाय।
मोर बिरवा हा मया के रातदिन ममहाय। 
लेस दे जे  घर अपन वो मोर सँग मा आय।



 2122 2122, 2122 21

छत्तीसगढ़ी गज़ल : रोज सुध कर के जेखर छाती जरे।

2122  2122  212

रोज सुध कर के जेकर छाती जरे।
नइ फिरय वो फेर अब बिनती करे।

कोन बन मा जा भटक गे राह ला 
रेंगना आइस जिखर अँगरी धरे।

तँय लगा बिरवा मया के चल दिये,
देख आ के वो कतिक फूले फरे ।

हे अँजोरी घर म तोरे नाँव ले, 
जोत अँगना मा बने रोजे बरे ।

जब गिरे के बाद कोनो थामथे
जान लेथव हाथ वो तोरे हरे।

मापनी 2122 2122 212 

कुण्डलिया


मुट्ठी भर के दान अउ, दाता कस अभिमान।
देने वाला मन कभू, नइ छोड़य पहिचान।
नइ छोड़य पहिचान, जेन मन जी भर देथे।
मगरमच्छ कर रोय, तेन मन सेल्फी लेथे।
स्टेटस ये चमकाय, नेट मा  शेयर कर के।
लाइक पावय लाख, दान दे मुठ्ठी भर के।

जिनगी मा सब  मौज हे, उखरे चारोखूट ।
भरे हवे भंडार ला, जेन मचा के लूट।
जेन मचा के लूट ,भरे हे अपन खजाना।
उखरे बर सरकार , रोज के डारय दाना।
परे रथे  दरबार, पाँव मा उखरे जब तब।
बिपत कहाँ छू पाय, मजा हे जिनगी मा सब।

भय भर के सामाज मा, मार मचाये लूट।
जन गण मन शोषित हवे, देश म चारोखूंट।
देश म चारोंखूंट, झूठ हा पाँव पसारे।
सत हर लाँघन पेट, फिरत हे मारे मारे।
हाँसय भ्रष्टाचार, जीभ ला लप लप कर के।
मनखे सिधवा हाय, मरत हे मन भय भर के।

छप्पय छन्द : परदेसी सजन

सजना हे परदेश गांव मा रहिथे गोरी।
भर-भर भर-भर हाय,  जगत हे तन मन होरी।
अँगरा सही गुलाल, लागथे तन मा बैरी।
साँप बिछी कस रोज, चाबथे पाँव ल पैरी।
बिन सजना ससुरार मा, गोरी के ये साल हे ।
देह सुखागे काठ कस, बही बरोबर बाल हे।

कुण्डलिया : होरी


 

होरी हर मन मा जलय,  मिटय कुमत कुविचार।
मथुरा मया गुलाल ले, नाचय बीच बजार।
नाचय बीच बाजार, फाग गा गा संगी।
मदहा समझय लोग, समझ ले कोई भंगी।
पिचकारी भर रंग, छन्द बरसाहँव गोरी।
साधक सब सकलाय, मात गे हमरो होरी।

लावणी छन्द: नवाँ बिहिनिया आही रे।


सुरुज के बिजहा ला बोंहव, अंधियारी के छाती मा।
तेल बना के लहू जराहंव, तन के दीया बाती मा।
बिरबिट कारी अँधियारी हे, तबले रात पहाही रे,
मोरे खांद म चढ़ के इक दिन, नवाँ बिहिनिया आही रे।

आगी सहीं जरत हे भुइँया,  सुरुज अँगरा बरसाथे।
प्यास म व्याकुल प्राणी मन ला, तरिया नदिया तरसाथे।
बादर के जब मया बरसही, माटी हर ममहाही रे।
मोरे खांद म चढ़ के इक दिन, नवाँ बिहिनिया आही रे।

मँय किसान के सिधवा बेटा, कपट कमाई नइ जानव।
मिहनत ले जे अन मिल जाथे,  अपन भाग के मँय मानव।
मोर सही अपने बाँटा ला, कोन बाँट के खाही रे।
मोरे खांद म चढ़ के इक दिन, नवाँ बिहिनिया आही रे।

परे रहे ले दसना मा जी,  नींद बाँह ला धर लेथे।
काम करइया तभे बिपत ले, झगरा जिनगी भर लेथे।
मिहनत के भट्ठी मा जागर, जोर त आलस जाही रे।
मोरे खांद म चढ़ के इक दिन, नवाँ बिहिनिया आही रे।

डरा डरा के सहत रहे ले, बइरी जादा बढ़ जाथे।
जिनगी भर के मुडपीरा बन, जब ये मुड़ मा चढ़ जाथे।
अतियाचारी रकसा कब तक, फ़ोर करेजा खाही रे।
मोरे खांद म चढ़ के इक दिन, नवाँ बिहिनिया आही रे।

मत्तगयंद सवैया : माखनचोर

मत्तगयंद सवैया
 7 भगण(211) 2 गुरु
211 211 211 211 211 211 211 22


माखन ला घर के नइ खावय जा पर के घर चोर कहाथे।
दूध दही घर मोर भरे हड़िया हड़िया सब लोग नहाथे।
काय सखी मँय बात कहौ सब ग्वालन मोर करा अटियाथे ।
ये बिलवा किसना हर मोर गली घर गाँव म नाक कटाथे।


गीत : मोर सुरता आही।

आही आही आही वोला मोर सुरता आही।

मोर मयारू बहाना बना के बलाही।
आही आही आही वोला मोर सुरता आही।
गाना गा गा के बइहा हा  सीटी बजाही।
आही आही आही  वोला मोर सुरता आही।

खाना खाही चाबत चाबत जीभ हा चबही।
पानी पियत देख लेबे फट ले अटक जाही।
कव्वा बोलत छान्ही मा सुध मोर लमाही।
रतिहा भर जाग जाग दिन मा उँघाही।
बइठे बइठे घर भीतरी मोबाइल दबाही
आही आही आही वोला मोर सुरता आही।

के दिन ले मयारू सँगी मोर ले रिसाही।
बिन बोले मोर मन ला कतका जलाही।
अनबोलना अउ कतका मोला सतही।
कतको जतन कर ले बैरी कइसे बिस्राही।
आही आही आही वोला मोर सुरता आही।

संझा बिहना भँवरा मोर गली मा आथे
आती जाती मोला देख देख मुस्कुराथे।
देख देख देख मोला हपत के गिर जाथे।
मुहाटी म साइकिल के चैन चढाथे।
मोर सुरता हा सुरता के नार ल लमाही।
आही आही आहौ वोला मोर सुरता आही। 

रोला छन्द

रोला छन्द - मथुरा प्रसाद वर्मा

जिनगी के दिन चार, बात ला मोरो सुनले।
माया ये संसार, हरे रे संगी गुन ले।
जोरे हस जे नाम, तोर माटी हो जाही।
तोरे धन भरमार, काम नइ कोनों आही।

बाँधे पथरा पेट, कभू  झन कोनों सोवय।
भूखन लाँघन लोग , कहूँ  मत लइका रोवय।
दे दे सब ला काम, सबों ला रोजी रोटी ।
किरपा कर भगवान, मिलय सब ला लंगोटी ।

नेता खेलय खेल, बजावय जनता ताली ।  
जरय पेट मा आग, खजाना होगे खाली ।
फोकट चाउर दार, बाँट के गाल बजावय। 
राजनीत हर आज , सबो ला पाठ पढ़ावय। 

धन बल कर अभिमान, आज झन मनखे नाचय ।
पर के घर ला लेस, छानही काकर बाँचय । 
काँटा बों के कोन , फूल ला भाग म पाथे  ।
अपन करम बोझ, सबे  हा इहे उठाथे ।

पर के आँशु पोंछ, हाँस के मन ला जोरय
खावय सब ला बाँट, मया रस बात म घोरय
मनखे उही महान, जेन परहित मर जाथे ।
पर दुख देखय रोय, उही सुख मन मा पाथे ।
   
जाँगर पेरय रोज, घाम मा तन ला घालय ।
जेखर बल परताप, काँप के पथरा के हालय ।
माथ बिपत के नाच, करम के गाना गाथे ,
उदिम करइया हाथ, भाग ला खुद सिरजाथे ।

जूता चप्पल मार, फेंक के वो मनखे ला। 
खन के गड्ढा पाट, चपक दे माटी ढेला।
जेन देश के खाय, उहे गद्दारी करथे।
चाटय बैरी पाँव, देश के चारी करथे।

लावणी छन्द : खिच के लवड़ी मार कका।









 

हद ले जादा बाढ़त हावय, निस दिन अत्याचार कका।

मुड़ी नवाँ के करन मजूरी, तब ले खाथन मार कका।

ललकारे के बेरा आगे, छोड़ अभी जोहार कका।

जे बैरी हा उतलँग करथे, खिच के लवड़ी मार कका।

 

छतरी कुल के कुलदीपक हम, बड़े बड़े निपटाए हन।

अब का होगेे काकर डर मा, बइठे मुहूं लुकाए हन।

जबले छुटगे हमर हाथ ले, मुरचा खावत धार काका।

पजा डार अब बेरा आगे, कहाँ करे तलवार कका।

 

लक्ष्मीबाई नाम सुने हन, झाँसी वाली रानी के।

हक के खातिर लड़ के मरगे, पूत उही बलिदानी के।

बरछी भाला गिरवी धर के, बन गे हन बनिहार कका।

फेर मान ला नइ बेचे हन, बिक गे खेती खार कका।

 

वीर शिवाजी के गाथा ला, अब ले नहीं भुलाए हन।

हमी समर मा रार मचा के, लहू धार बोहाये हन।

हमर लहू का पानी होगे,  जाँगर खाय दियार कका।

करै कोलिहा मन हर कइसे, बघवा ऊपर वार कका।

 

परबुधिया बन कब तक रहिबो , गँवा अपन चिन्हार कका।

गाँव गली घर पर के कब्जा, हमन सिरिफ रखवार कका।

हमर बाट ला छेकत हावय,  बगरन्डा भरमार कका ।

काँटा खूंटी काट काट के , बाट अपन चत्वार कका।

रूपमाला छंद : मुक्तक


मोर गुरुवर के कृपा दे दिस हवे सद्ज्ञान।
मोह बँधना मा परे मँय, राह ले अनजान।
गुरु चरण मा मँय नवा के, राख दे हँव माथ।
भाग मोरो जाग गे हे, अब करम के साथ।।

मोर हे शुभकामना हो , जिंदगी खुशहाल।
आपके सूरज सही मुख, होय लालेलाल।
मोंगरा कस तोर खुसबू आज हे ममहाय
आज गुरुजी आप ला मोरो उमर लग जाय।

ये चरन मा राख मोला , तँय बढ़ाये मान।

रोज सेवा कर सकव मँय, तोर हे भगवान।
तँय बनाये  मोर माटी आदमी  के रूप।
पोठ करदे तँय पका के, ज्ञान के दे धूप।।

जान जाए फेर मोला, देश खातिर आज।

बात अइसन बोलना हे, खोल ले आवाज।।
बाद मा बइरी ल होही, जे सजा तँय यार।
देश के गद्दार मन ला, आज गोली मार।।

जेन थारी खाय छेदय, अब उही ला लोग।
जेल मा हे फेर भोगे, रोज छप्पन भोग।
कोन हे आतंकवादी, मन घलो के साथ।
खोज के वो लोग मनला, आज कातव हाथ।

मोर माटी ला  उही मन, नइ  लगावै माथ।
जेन बैरी के मितानी, बर करत हे घात।
साँप बन के लील देथे, देश के सुख चैन।
अब गटारन खेलबो रे, हेर उखरे नैन।

छोड़ दे तँय आलसी ला, बात सुनले मोर।
मेहनत के संग आही,गाँव मा अब भोर।
हमन शिक्षा  जोत घर घर,चल जलाबो यार।
लोग लइका हमर पढ़ के, बन जही हुसियार।



खींच लानिस तीर सबला , तोर सुरता आज।
तोर सुग्घर गीत कविता, मोहनी आवाज।
कोन कहिथे तँय चलेगे, छोड़ के संसार।
गीत तोरे ले जही तोला समय के पार।

भीख नइ माँगय कभू भी आपले बनिहार।
हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।
हम कमाथन टोर जाँगर ,दे अपन मन प्राण।
हाथ मा छेनी हथौड़ी , देश नव  निर्माण।


कोन जनता के सुनत हे वोट दे के बाद।
बाढ़गे कांदी  भकाभक चूसथे सब खाद।
सब कमीशन  खात हे जी, बाँट के भरपूर।
चोर नेता भष्ट अफसर,न्याय चकनाचूर।



कोन सच के राज खोलय, चुप हवे संसार।
जेन जनता  बर लडत जी, पोठ खावय मार।
न्याय कारावास भोगय, हो जथे बीमार।
जब कलम मजबूर हो के, नाचथे दरबार।



जेन ला रखवार राखन, हे उही मन चोर।
कोन जाने अब कहाँ ले, गाँव आही भोर।
पेज पसिया बर लड़त हम, जिन्दगी भर रोन ।
मोर बाँटा के अँजोरी , लेग जाथे कोन ?


जोगनी बन जेन लड़थे, रात भर अँधियार।
वो बिहिनिया मान जाथे, रोशनी ले हार।।
कोंन जाने कब सिराही,देश मा संग्राम।
रार ठाने हे भरत हा, रोय राजा राम।।

गाँव मोरो आज होतिस, सब डहर खुशहाल।
अब किसानी मा कमाई, होय सालोसाल।
चाहिये ना गाँव ला जी, काकरो उपकार।
 बस फसल के मोल दे दय, अब बने सरकार।

गाँव देथे तब सहर हर, पेट भरथे रोज।
गाँव हर बनिहार होगे, सहर राजा भोज।।
गाँव सिधवा मोर हावे, अउ शहर मक्कार ।
आदमी के खून चूसे, रोज ये दरबार ।।


हाथ ला दे काम के तँय, साल भर अधिकार।
भीख नइ माँगन कभू हम हन भले बनिहार।।
हम कमाबो टोर जाँगर ,दे अपन ये प्राण।
हाथ धर छेनी हथौड़ी , देश बर निर्माण।।


साँझ दे के आन ला मँय हर बिसाथव घाम।
साँस चलही मोर जब तक नइ करँव आराम।।    
ले किसानी छोंड़  के आ  सहर मा तोर। 
मँय किसानी ला करे बर लें उधारी तोर।
 ( कोन कर्जा ला चुकाही जान जाथे मोर।।)

     (  मँय किसानी छोड़ आ गें अब सहर मा तोर।)


हे शरद के पूर्णिमा मा, चंद्रमा   हर गोल।
आज चंदा हा धरे हे , रूप जी अनमोल।।
हे जगत के जीव मन बर,मोहनी कस रात।
ओस बन के आज अमरित, बरसथे बरसात।।


कैद होगे आज बचपन, अउ जवानी मोर।
होत हे काबर अकेल्ला, अब बुढापा तोर।।
कोन घर मा बाँध देथे , खींच के दीवार।
आज मोबाइल तको तो, बाँटथे परिवार।।

मुड़ म बाँधे लाल पागा, डोकरा हरसाय।
आज नाती के बराती, बर बबा अघुवाय।।
हे कहाँ अब डोकरी हा, डोकरा गे भूल।
छोकरा बन अब गली मा, बाँटथे जी फूल।।


रूप अइसन हे सजाए, सालहो सिंगार।
लान दे ना डोकरी बर, डोकरा तँय हार।।
हे रचाए हाथ मेहदी, अउ महावर पाँव।
ओठ में लाली लगा के,घूमे सारा गाँव।।

चौपई/ जयकारी छन्द: कोरोना


सुन लव भाई सुनव मितान 

मोर गोठ ला दे के ध्यान।

हे संकट मा सबके जान। 

आज मोर तँय कहना मान।


वाइरस एक कोरोना नाँव

 फैलत हवे  सहर अउ गाँव।

डर के मारे काँपय लोग। 

बन्द होत हे सब उद्योग।



सोसल मिडिया करे बखान। 

रोग ह भारी लेवय प्रान।

दुनियाँ भर हावे परशान

 खोजे मा नइ पाय निदान।


हमर परोसी चीन ह ताय। 

जेन जीव ला कच्चा खाय।

सांप बिछी तक चट कर जाय 

 इही रोग के कारन आय।


सुन के कोरोना के नाम 

आज जगत हर काँपय राम।

फैलावत कतको अफवाह।

 सुन लेवव बांचे के राह।


जर बुखार अउ खासी छींक। 

मुड़ पीरा नइ होवय ठीक।

साँस लेत मा लागे जोर। 

निमोनिया कस लक्षण तोर।


फेर डरे के नइ हे बात 

डर हर करथे जादा घात।

हिम्मत राखव मन मा जोर । 

इही ह प्रान बचाही तोर।


कोरोना के का उपचार। 

मार मचे हे हाहाकार।

दवा नही कोनो हर पाय 

सावधानी हर एक उपाय।


भीड़ भाड़ मा तुम मत जाव 

घर म रही के समय बिताव।

शाकाहारी खाना खाव। 

स्वच्छता ला तुम अपनाव ।


नही हवा मा फैलय रोग।

 वाइरस ल फैलाथे लोग।


हलो हाय के चलन ल छोड़।

 राम राम कर हाथ ल जोड ।


जाड़ नमी मा  ये हा भोगाय 

गर्मी म वाइरस मर जाय।


तेखर ले झन ठंडा खाव

 जाड़ा लगे उँहा झन जाव।


जेला सर्दी खासी आय 

छिक छिक के जी घबराय।


अपने हर झन करय उपाय

 अस्पताल तुरते ले जाय।


बार बार जे हाथ ल धोय 

साबुन लगा लगा के कोय।



साफ रहे नइ खतरा होय

 इही उपाय ला राख सँजोय।
https://youtu.be/w9iiY2FBId4

चौपई : कोरोना

सुन लव भाई सुनव मितान मोर गोठ ला दे के ध्यान।
हे संकट मा सबके जानआज मोर तँय कहना मान।

वाइरस एक कोरोना नाँव फैलत हवे  सहर अउ गाँव।
डर के मारे काँपय लोग। बन्द होत हे सब उद्योग।

सोसल मिडिया करे बखानरोग ह भारी लेवय प्रान।
दुनियाँ भर हावे परशान खोजे मा नइ पाय निदान।

हमर परोसी चीन ह ताय। जेन जीव ला कच्चा खाय।
सांप बिछी तक चट कर जाय इही रोग के कारन आय।

सुन के कोरोना के नाम आज जगत हर काँपय राम।
फैलावत कतको अफवाह। सुन लेवव बांचे के राह।

जर बुखार अउ खासी छींक। मुड़ पीरा नइ होवय ठीक।
साँस लेत मा लागे जोर। निमोनिया कस लक्षण तोर।

फेर डरे के नइ हे बात डर हर करथे जादा घात।
हिम्मत राखव मन मा जोर । इही ह प्रान बचाही तोर।

कोरोना के का उपचार। मार मचे हे हाहाकार।
दवा नही कोनो हर पाय सावधानी हर एक उपाय।

भीड़ भाड़ मा तुम मत जाव घर म रही के समय बिताव।
शाकाहारी खाना खाव। स्वच्छता ला तुम अपनाव ।

नही हवा मा फैलय रोग। वाइरस ल फैलाथे लोग।
हलो हाय के चलन ल छोड़। राम राम कर हाथ ल जोड ।

जाड़ नमी मा  ये हा भोगाय गर्मी म वाइरस मर जाय।
तेखर ले झन ठंडा खावजाड़ा लगे उँहा झन जाव।

जेला सर्दी खासी आय छिक छिक के जी घबराय।
अपने हर झन करय उपाय अस्पताल तुरते ले जाय।

बार बार जे हाथ ल धोय साबुन लगा लगा के कोय।
साफ रहे नइ खतरा होय इही उपाय ला राख सँजोय।

ताटंक छंद : मनखे हो के मनखे खातिर


मनखे हो के मनखे खातिर, मन मा धरे नहीं पीरा।
माटी के महिमा नइ जाने, गँवा दिए कइसे हीरा।

बिरथा तन के गरब करे अउ, मया प्रित ला जाने ।
रुपिया पइसा धन दौलत बर, हपटत हावय मनमाने।

अइसन धन ला घुन्ना खाथे, तन मा लग जाथे कीरा।
मनखे हो के मनखे खातिर, मन मा धरे नहीं पीरा।

जात धरम के खाँचा खन खन, काबर बोंवत हे काँटा।
निज स्वारथ मा चानी चानी, होगे मनखे के बाँटा।

अमरित राना मन पीथे अउ,  जहर इहाँ पीथे मीरा।
मनखे हो के मनखे खातिर, मन मा धरे नहीं पीरा।

ताटंक छंद गीत


16, 14 अंत मा तीन गुरु

मोर मयारु मया भूलागे, मोला नइ पहिचाने रे।
मोर मया ला काँदी कचरा, माटी पथरा जाने रे।


हिरदय के धड़के ले संगी ,  सुरता तोरे आथे रे।
जब जब लेथँव साँस मोंगरा, के जइसे ममहाथे रे।
तोरे खातिर मँय बइहा बन, गली गली गाथँव गाना।
गाँव गाँव मँय नाँचत  फिरथँव, पहिरे जोगी कस बाना।

रतिहा भर सपनाथँव तोला, गवाँगे बिहाने रे।

तोर नशा मा झूमत रहिथँव, का मोहनी खवाए रे।
रद्दा देखँव तोर रात दिन, फेर नहीं तँय आए रे।
हाँसस बोलस पहिली कइसे, अब का हो गे हे तोला।
कोन जनी का गलती हो गे, काबर बिसरी दे मोला।

अपन बना के काबर गोरी, मोला कर दे आने रे।

ये दुनियाँ तो मया करइया मनखे बर खनही खाँचा।
काबर तँय हा डर्राखस वो, मोर मया हर हे साँचा।
मोर कलपना जाय न बिरथा तहूँ समझबे रानी रे।
पथरा कस हिरदय पिघलाही, मोर नैना के पानी रे।

सुधबुध मोर भुलागे बइरी, तँय कइसे मनमाने रे।  



कुकुभ छंद : राजनीति



राजनीत ह मोर गाँव मा, बोतल मा भरके आथे।
बरसा के पुरा कस नाला, गाँव गली बोहा जाथे।

कपट कमाई के रक्सा हा, लिलत जात हे मरजादा।
दरूहा मन के जमघट होगे, मोर गाँव सीधा सादा।

निचट लपरहा नेता बनथे, चमचा बनय अलाली मा।
सरी गाँव भर इतरावत हे, बनवा महल दलाली मा।

भूखर्रा मन हदरीही मा, फोकट के पा के खाथे।
काम करे ना काज तभो ले ,सबले जादा अटियाथे।

मुफ्तखोर छानही म होरा, भूँजत हे आरा पारा।
चार चवन्नी  फेंक फेंक के, चतुरा मन चरथे चारा।

निज स्वारथ बर गिर के मरथे, लालच पर के पछताथे।
नेता मन के पाछू जा के ,हाथ म काखर का आथे।

बखत परे मा कहे ल परथे, ये नेता काखर होथे।
मतलब खातिर अपन बने अउ, बेरा बीते पर होथे।

जात पात अउ ऊँचनीच के, भेद कलेचुप बगराथे।
आगी खा के अँगरा उछरे, जइसे ये मन नितराथे।

सुनता के बँधनी टोरे बर, बिख के ये बिजहा बोंथे।
दुखपीरा मा हितवा बन के, घड़ियाली रोना रोथे।

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रूपमाला छन्द

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