मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के
- मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
- कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
- नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
सार छन्द : होरी
छप्पय छन्द
नाली भरगे हाय, सरे कस बस्सावत हे।
करही कोन ह साफ, समझ मा नइ आवत हे।
कचरा के हे ढ़ेर, फेर ये झिल्ली पन्नी।
लाखों होगे पार, फेक के चार चवन्नी।
कचरा भ्रष्टाचार के, लेस देव चतवार के।
बहिरी धर सब साफ कर, बेरा हे इंसाफ कर।1।
वादा के भरमार, चार दिन चलही संगी।
टकला बर सरकार, लान के देही कंघी।
अब चुनाव हे पास, खास हो जाही जनता।
नेता आही गाँव, पेट भर खाही जनता।
मुद्दा के हर बात ला, दार साग अउ भात ला।
मतलब बर भरमाय सब, जनता के जज्बात ला।
रचरच रचरच आय, सड़क मा बइला गाड़ी।
गाँव गवतरी जाय, करय अउ खेती बाड़ी।
घन्नर घेंच बंधाय, बाजथे घनघन घनघन।
दउड़त सरपट जाय, हवा कस सनसन सनसन।
आज नंदागे कालके , बइला गाड़ी छाँव रे।
मोटर गाड़ी मार हे, तब ले सुन्ना गाँव रे।
आसा अउ बिस्वास, माँग के कोन ल मिलथे।
अपन हाथ अउ गोड़, चला के जिनगी खिलथे।
होबे जाँगर चोर, नदी मा दीया ढिलबे।
फुटय करम हा तोर, आन के चादर सिलबे।
छोड़ आलसी बीर बन, करम कमा रणधीर बन।
पोंगा पण्डित माँग के, भोग लगाथे भाँग के।
आँटे पैरा डोर, बइठ के पैरा जिनगी।
कभू बेच के चाय, तलत हे भजिया जिनगी।
करम करे का लाज, शुरू कर बढ़बे आगे।
दुनियाँ हे रफ्तार आज सब दाउड़े भागे।
चलत चलत सागर मिलय, रुके धार बसाय रे।
ठीहा मिलही ठेल के, ठेलहा धोखा खाय रे।
रोना रोये आज, करम के गठरी बाँधे।
संसो के तँय साग,ऊँ जिनगी भर राँधे।।
काबर लगे लाज , काम तो करे ल परथे।
बनके जाँगर कोड़िया, सो सो उमर बिताय जी।
बोझा होगे जिन्दगी, बिरथा जान गवाय जी।
हमन भूखर्रा तान, कमा के खाथन तब ले।
गड्थन सीधा जाय, गोड़ मा काँटा हब ले।।
उघरा हम रह जान, ढाँक के तन दूसर के।
मरथन भूख मा फेर, नहीं हक मारन पर के।।
छत्तीसगढ़िया सोज रे, करथन बिनती रोज रे।
रोज मनाथन जोग रे, दे के छप्पन भोग रे।
मया ल काबर मोर,नहीं तँय जाने बइरी।
मन मा करते सोर, पाँव के तोरे पइरी।।
निष्ठुर नैना तोर, करेजा घायल होगे।
कहिथे पूरा गाँव, टुरा अब पागल होगे।।
पीरा बाचे हे अभी,ले के जाही जान रे।
सुरता तोरे अब बही, छोड़े नही परान रे।।
जब्बर कर गोहार , उठा के हाथ अपन के।
माँगे बिन अब यार, मिलय हक नही सबन के।
कलजुग के भगवान, यही मन होगे संगी।
मोठ्ठा बर अनुदान, दुबर बर भारी तंगी।
जब सब जनता गाँव के, पनही धर के पाँव के।
हक ल आपन माँगथे, खूंटी मा टोपी टाँगथे।
अमृतध्वनि छन्द
पाँव परँव कर जोर के, सुन ले बिनती मोर।।
सुन ले बिनती, मोर पवनसुत, बिपदा भारी।
कँरव आरती, थाल सजाके, तोर पुजारी।।
फूल पान मँय, लाने हावव, माथ नवा के ।
दे दे दरसन, करके किरपा, तीर म आके।।
बजा नगारा खोर मा, गा ले सातो राग।
गा ले सातो, राग मतादे, हल्ला गुल्ला।
आज बिरज मा, बनके राधा, नाचय लल्ला।
अब गोरी के, कारी नैना, आरी लागे।
मया बढाले, नैन मिलाले, फागुन आगे।
मुखड़ा है मनमोहिनी, हाँसत आवय जाय।।
हाँसत आवय, जाय हाय रे, पास बलाथे।
तीर मा आ के, खन खन खन खन , चुरी बजाथे।।
नैन मटक्का, मतवाली के, हँसी ठिठोली।
जी ललचाथे, अब गोरी के, गुरतुर बोली।।
जन सेवक ला आज के, जोंक बरोबर मान।।
जोंक बरोबर, जान मान ये, चुहकय सबला।
बनके दाता, भाग्य विधाता, लूटय हमला।।
अपन स्वार्थ मा, धरम जात मा, बाँटय बाँटा।
हमर राह मा, बोवत हे जे, सब दिन काँटा।
परमारथ के काज हा, कभू न बिरथा जाय।।
कभू न बिरथा, जाय हाय रे, बन उपकारी।
प्यास बुझाथे, सबला भाथे, बादर कारी।।
मरते सैनिक, करथे सबके, पहरेदारी।
तभे वतन हा, ममहाथे जी, जस फुलवारी।।
रहय चँदैनी चार दिन, फेर कलेचुप रात।।
फेर कलेचुप, रात ह कारी, तोर दुवारी।
अब छुछुवाही, सब झिन आही, आरी पारी।।
मार मताही, खलबल खलबल, सबझन डबरा।
दे दे चारा, जाल फेकही, नेता लबरा।।
घर के सुख बर रात दिन, देथे तन मन प्रान।।
देथे तन मन, प्रान लगाके, सेवा करथे।
सुख दुख सहिथे, अउ घर भर के , पीरा हरथे।।
दाई-बेटी, बहिनी- पत्नी, अउ संगवारी।
अलग अलग हे, नाम फेर हे, देवी नारी।
कुण्डलिया
जब जब मनखे हारथे, खुले जीत के राह।
गिर उठ कर के हौसला, खोज नवा उत्साह।
खोज नवा उत्साह, चाह ला पंख नवा दे।
झन जुड़ाय अब आग, रोज तँय फूँक हवा दे।
मारे जब झटकार, हाथ ले सकरी खनके।
बँधना टोरय खास, आस कर जब जब मनखे।1।
तोरे बस मा राम हे, झन तँय कर आराम।
जिनगी माँगे तोर ले, कर ले बेटा काम।।
कर ले बेटा काम, भाग ला अपन गढ़ ले।
खेत खार ला देख ,संग मा थोकुन पढ़ ले।।
पानी कस हे धार, मेहनत दउड़य नस मा।
हार जीत सब यार, रही तब तोरे बस मा।2।
खाथे मलाई रात दिन, नेता मन हर खास।
आजादी के नाव ले , आजो हमला घाँस।।
आजो हमला घाँस, फाँस हिरदय मा गड़थे।
निज स्वारथ ल साध, आज सब आघु बढ़थे।।
जनता है बर्बाद, बढ़े, ऊँच नीच के खाई।
मरे भूख से देश, आज वी खाय मलाई।3।
चाटी चुरगुन गाय गरू, अपन पेट बर खाय।
वोखर जग मा नाव हे, परहित जे मर जाय।।
परहित जे मर जाय, उही इतिहास म जीथे।
नीलकण्ठ बन जेन, जेन जगत के जहर ल पीथे।।
धन दौलत अउ नाम,सबो हो जाही माटी।
मानुस पर बर आय, अपन बर जीवय चाटी।4।
रोटी है संसार मा, भूखे बार भगवान ।
सुरुज उगे जब पेट मा, तन मा तब दिनमान।।
तन मा तब दिनमान, रात हा घलो सुहाथे।
मिहनत कर इंसान , पेट भर अन ला खाथे।।
सबो हाथ ला काम, लाज बर मिलय लँगोटी।
किरपा कर भगवान, सबो ला दे दे रोटी।5।
बइठे आमा डार मा, कउवा बोलय काँव।
कोन गली हे कोयली, सुन्ना परगे गाँव।।
सुन्ना परगे गाँव, छाँव हा घलो नँदागे ।
बिरवा कटगे हाय, गाँव मरघट्टी लागे।।
करे नहीं अब बात, रहे सब मुँह ला अइठे।
चौरा हे न चौक, कहाँ अब मनखे बइठे।6।
दुर्गा दाई आज तँय, धर चण्डी के रूप।
बइरी मन के नास कर, रणचण्डी तँय झूप।।
रणचण्डी तँय झूप, गाँज दे मुड़ के खरही।
लहू बोहावय धार, तोर जब बरछी परही।।
बढ़गे अतियाचार, तहीं हा हमर सहाई।
आजा रन मा आज, मोर तँय दुर्गा दाई।7।
हर दफ्तर मा मातगे, चिखला भ्रष्टाचार।
सरकारी अनुदान तँय, कइसे पाबे यार।।
कइसे पाबे यार,चढ़ावा बिना चढाये।
बाबू साहब लोग, सबो हे जीभ ल लमाये।
का करबे प्रसाद, फँसे एखर चक्कर मा।
घुस खाये के होड़, मचे हे हर दफ्तर मा।8।
विपदा तोरे जिंदगी , के करही सिंगार।
तपके सोना के सहीं, पाबे तहूँ निखार।
पाबे तहूँ निखार, हार के झन थक जाबे।
रेंगत रेंगत यार, एक दिन मंजिल पाबे।
आसा अउ विस्वास, राख के मन मा जोरे।
हिम्मत जाही जीत, हारही विपदा तोरे।9।
पनिहारिन मन हॉस के , तरिया नदिया आय।
घाट घठौन्डा फूल कस,महर महर ममहाय।
महर महर ममहाय, गाँव के गली गली हा।
देखय अउ सरमाय, फूल के कली कली हा।
सुख दुख अपन सुनाय, चार झिन सँगवारिन मन।
हाँसत आवय जाय, आज जब पनिहारिन मन।
रोला
माया हे संसार, आज तँय एला गन ले।
जीयत भर के नाँव, तोर पल मा मिट जाही।
जोरे धन भरमार, काम नइ तोरो आही। 1।
लच्छा खिनवा हार, तोर बर लाने हँव।
तँय जिनगी मा मोर, मया रस घोरे हस।
सुख राखे परिवार, मोर ले गठजोरे हस।2।
बाँधे पथरा पेट, नहीं अब लइका रोवय।
दे दे सबला काम, सबो ला रोजी-रोटी।
किरपा कर भगवान, मिलय सब झन ल लँगोटी।3।
अब तिहार तो रोज, मनावै जनता खाली।
ले लय सबला लूट, खोल के दारू भट्ठी।
अपन करम के भार, तहूँ हा इहें उठाबे।
पर पीरा बर रोय, मान वो जग मा पाथे।
उदिम करइया हाथ, भाग ला खुद सिरजाथे।
आवय- जावय साँस , नहीं अब जउहर भइगे।
होगे आँखी लाल, लार मुँह ले चुचुवावय।
काबर खाये आज, सोच के मन पछतावय।
खन के गड्ढा पाट, चपक दे माटी ढेला।
काम करे न काज, रोज जे मार लबारी।
मनखे मनखे भेद, करे स्वारथ बर भारी।
धान पान के भाव, घलो तँय मारे डंडी।
मिठलबरा तँय मार,लबारी मन भरमाये।
अब चुनाव हे आज, लबारी भारी परही।
उल्लाल ३
मँय पैरी लेहव गोड़ बर, अउ माला ला घेच के।।
तँय किंदर दुनियां भले, फिर आबे अब गाँव रे।
उल्लाला 2
मानवता ह नदात हे, मनखे मनखे खात हे।।
पछतावत मन मार के, जंगल सबो उजार के।
रोटी रोटी बोलथे, अउ मनखे ला तोलथे।
खाये जाथे ओखरा, खाथे मिलके बोकरा।
भइया खावय चाट के, सबो मया ला बाँट के।।
उल्लाला 1
पालनहारी जान के, आये हँव मँय द्वार जी।।
माँग-माँग के जिंदगी, लगही बेड़ापार रे।।
माते हाँवव देख के, हो गे हँव कंगाल वो।।
माटी माटी मा मिलय, इही जगत के रीत रे।।
का संगी धन के गरब, माटी के इंसान मन।।
माटी फल तोला दिही, जइसे बिजहा बोय जी।।
प्रसाद के दोहा : इंटरनेट
गूगल बाबा हे गजब, खोज जिनिस सब लाय।
कोन वेबसाइट कहाँ, का का करे बताय । 1।
मजेदार यू ट्यूब हे, विडियो के भरमार।
बइठ अपन घर देख ले, पल भर मा संसार ।2।
फेमस हे संसार मा , फेसबुक महाराज।
पहली करथे पयलगी ,छोड़ जबो सब काज।3।
सुग्घर हे विकिपीडिया , भरे ज्ञान भंडार।
सब भाखा सब विषय मा, मिलही तोला सार।4।
पनिहारिन मन घाट मा,सुख दुख ल गोहराय।
ट्विटर म घलो वइसने , चहल पहल सकलाय।5।
नेट रेट हा बाढ़गे, सर्वर होगे लेट।
गेट गेट मा वेट हे ,काकर भरबो पेट। 6।
दिन भर नाचय अंगरी, रंग मंच कीबोड।
मेमोरी कतको बढ़े ,डेटा ओवरलोड।7।
रिश्ता नाता नेट मा , मया मयारू गोठ ।
सोसल मिडिया मा जुरे, बतियावत हे पोठ।8।
इंटरनेट रईछई, दुनियाँ भर बगराय।
जइसे जाला मेकरा, भितरभितर लपटाय। 9।
एम एस ऑफिस मा सरल, सब दफ्तर के काम।
पढ़ना लिखना पोछना , सकल बुता आराम।10।
नेट म बैंकिंग ह सरल, लेन देन सदुपाय।
जल्दी जल्दी मा घलो ,सकल काज सलटाय।11।
प्रसाद के दोहा : चुल्हा
चुल्हा माटी के हमर, घर भर बर जर जाय।
पेट जरे झन काकरो, मालिक करव उपाय।1।
छेना लकड़ी नइ बरय, चुल्हा हर कुहराय।
कलकलहिन हो बहुरिया ,सुख घर के जर जाय।2।
सबला देथे राँध के ,सुग्घर मन हरसाय।
घर के चुल्हा हाँसथे, नारी जब मुस्काय।3।
आगी चुल्हा मा बरे, घर भर हर सकलाय।
डबकत चाहा संग जी, सबके मया बंधाय। 4।
दाई चुल्हा गोरसी, छेना लकड़ी बार।
घर के सुनता झन बरे, सुखी रहे संसार। 5।
जब घर के चुल्हा फुटय, मुड़धर रोय सियान।
भाई-भाई लड़ मरय, तिरिया चरित महान।6।
गोरस चुरोय गोरसी , चुल्हा हा जी चाय।
नेवरनिन के मन चुरय, छोड़ बिछौना जाय।7।
चुल हा चुल्हा म चु लहा, बारे बर बम्बार।
जिनगी हे दिन चार के, चलना सोच विचार।8।
✍🏼मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
प्रसाद के दोहा : गुरु घासीदास बाबा
🙏🏼 बबा गुरु घासीदास जी के चरण म मोर दोहा 🙏🏼
जात पात मानय नहीं ,सत के महिमा गाय।
पावन जेखर आचरण, वो सतनामी आय।1।
नशापान अब बंद कर , मांसाहार ल त्याग।
ज्ञान गुरु के हे इही , सतनामी तँय जाग।2।
मनखे आघू झन नवव, करव सिरिफ सम्मान।
जात पात ला त्याग के, सत बर दे दव जान।3।
अमरौतिन के लाल तँय ,मँहगू के संतान ।
जनम धरे सतकाज बर, बाँटे सत के ज्ञान।4।
जैतखाम सत बर खड़े,धजा स्वेत लहराय।
गिरौदपुर के धाम हर , सत के जस बगराय।5।
कपट करे मा साधना, अउ लालच मा त्याग।
भोग करे महिमा घटय ,मोह मया बैराग ।6।
सत बर देथे प्रान ला , तप बर त्यागे भोग।
साधक बाबा के सरल, जिनगी उंखरे जोग ।7।
चमत्कार तो ज्ञान हे, दिये गुरु बगराय।
ठगनी जग ठगता फिरय, निज स्वार्थ बिलमाय । 8।
🙏🏼
मथुरा प्रसाद वर्मा ' प्रसाद'
ये तो साले हद होगे यार।
ये तो साले हद होगे यार।
नवा सड़क कस उखड़ जाथे।
मुड़ पटक फेर लिखय नही।
एरे-गेरे मन आँखी दिखाथे।
ये तो साले हद होगे यार।
ये बात ल जनता गुनय नहीं।
देश बुड़ गे उधारी म।
किसनहा दुबरात हे।
ये तो साले हद होगे यार।
स्कूल म ताला, मास्टर बर तुतारी।
रोज नवा आस्वासन।
पइसा पा के छापन।
ये तो साले हद होंगे यार।
दुकानदार बर कर(tex) के चोरी।
मिल बाँट खीसा म बोजना।
योग्यता रहन दे , पहिली घुस।
ये तो साले हद होगे यार।
प्रसाद के दोहा
जियत भर तो लगे रही, मोह मया के राह।
ये तन इहें जर जही, छूूूट जही सब चाह।१।
रोटी पानी पेट ला , दे दे पालनहार।
रोज रोज के बइठका, करत रही सरकार।२।
नीति कुनीति बिचार के, जीभ तोर लहुटार।
जीभ डोले जिया जले, जर जाए संसार।३।
मुफ़त म देथे बाँटके, दार भात सरकार।
पुरसारथ गिरवी धरे, जनता हे लाचार।४।
छोड़न छाडन बर कहूँ, छोड़ दिही संसार ।
छि छि अइसन प्रेम ला, बार बार धिक्कार।५।
पेट म रोटी ओनहा, तन बर दे दे आज।
छइहाँ दे दे ढाकहूँ, मुड़ ल घलो महराज।।६
माँगत माँगत तोर से , लगे नहीं अब लाज।
देने वाला हस तहीं, देवत हस महाराज।७।
कइसे होही कहव का, ये जिनगी हा पार।
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।८।
नीयत मा हे गंदगी, कुछ तो होय निदान।
भ्रष्टाचारी बर चलय, हाथ सफइ अभियान।९।
शाला में ताला लगे, मदिरालय आबाद।
व्यापारी राजा हमर, पीढ़ी एक बर्बाद।१०।
लोभी कामी मन इहाँ,बने पुजेरी आज।
करम धरम जानै नही,हमर हवै महराज।11।
लोकतंत्र मा वोट के, महिमा अपरंपार।
बेचारा जनता बने, मजा करे सरकार।12।
बिन पइसा के आप ला , मिले नहीं अब मान।
दो कौड़ी के भाव मा, बेचावत ईमान।।13
मया अउ बन के मिरगा, भटकत खारे-खार।
मया करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।14।
प्रसाद के दोहा : मया
मया मरम जानय नहीं, मया मया चिचियाय।
पल भर मा जर के सहीं, चढहे उतरे हाय। ।1।
काकर बर मैं राखहूँ, ये हिरदे सिपचाय।
बइरी होंगे हे मया, जीय ल मोर जलाय।2।
मया परे तन हा जरय, मन प्यासे मर जाय।
तन मन पैरावट सहीं, भितर भितर गुगवाय।3।
आँखी काजर आँज के, लाली ओठ रँगाय।
रूप सजा के मोहनी , बिजुरी मन म गिराय।4।
संगी रे तोर सुरता, जब जब मोला आय।
जिनगी बोझा कस लगे, सांस आय अउ जाय।।5।
कइसे होही का कहव , ये जिनगी हा पार।
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।6।
मन मिरगा संसार मा, भटकय खारे-खार।
मया करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।7।
मथुरा प्रसाद वर्मा
हपट के मरथे
मीठलबरा के गोठ ह चलथे।
सिरतोन कहे म जम्मो उसलथे।
करम कमाई कोनो नई पूछय,
बेईमानी के सिक्का चलथे।
उही बनाते इहाँ सड़क ल,
खा के डामर पेट ह पलथे।
कानून कायदा, खेलवारी होंगे
मतलब परगे साचा म ढलथे।
राजनीती के चिक्कन रद्दा
सोजमतिहा के पांव खसलथे ।
झपट परे सब गुर कस चाटा,
जे नई पावय हाथ ल मलथे।
उहि ह पाथे ठीहा ठिकाना
गिरे परे म घलो खासलथे ।
धीरज धर चल परसाद सरलग,
दौड़ाइए हर हपट के मरथे।
मथुरा प्रसाद वर्मा प्रसाद
मोर छत्तीसगढ़ मुक्तक
गणतंत्र
अपील हे, अनुरोध है।
बालक ये अबोध हे।
कहत हौ सुन लव।
मने मन गुन लव।
हाथ जोड़ के बिनती हे।
साल दर साल
देश के माथा म
चटक जाथे
एक अउ गिनती हे।
में आज तक नई
समझ पायेव
खुश होवव
की रोवव।
आओ पढ़बो अउ पढ़ाबो,
गियान के उजियार फैलाबो।
अंधियारी ल मिटारे खातिर,
चल न दिया जलाबो।
गाँव गाँव अउ घर घर म।
गली गली अउ डगर डगर म।
हिरदे के बात कका
करही सारी दुनिया ह घात काका।
बांटत गियान साँझ सबेरे।
अपन भीतर झाँकय नहीं।
पुछही तोर औकात कका।
बाँटत समाज करत विखण्डित।
सब स्वार्थ के खेल हरे जी,
मूर्खता हे जातपात कका।
सोजमतिहा नई पावय पानी।
सच गोठियाबे त झंझटिहा अस,
बदल गे अब हालात कका।
छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी
यार गदहा रे।
झन सरमा तँय यार गदहा रे।
तोरे सहीं संसार गदहा रे ।
नारियाये बर सबे नारियाथे
तही ह खाथस मार गदहा रे।
लड़ चुनाव मंत्री बन जाबे,
मिहनत हे बेकार गदहा रे।
पढहे लिखे मन करय मजूरी ,
सिस्टम हे बेकार गदहा रे।
का सासन अउ का परसासन ,
माते भ्रस्टाचार गदहा रे।
बड़े बड़े ल कोन सुधारय ,
संसद हे लाचार गदहा रे।
लगाये मुखउटा बाटय गियान,
तोरे रिस्तेदार गदहा रे ।
कतको चेला आघू पाछु,
रोज खड़े हे दुवार गदहा रे।
नियत म तोर वफादारी हे,
तभे खड़े लाचार गदहा रे।
तहुँ हा ऊँचा पदबी पाबे,
बन थोड़ा मक्कार गदहा रे।
कहे प्रसाद पुकार गदहा रे,
झन करबे कभू प्यार गदहा रे।
हो जाही कहूँ तोरो शादी
जिनगी तब बेकार गदहा रे।
का सोचत हस?
तलवार झन तलवार के धार देखव जी।
भूख
उजाला दिही
रोज नवा घोटाला दिही।
नेता मन ह देस ल अपन,
डउकी , लइका , साला दिही।
चोर मन ल चाबी दे दे के,
फोकट म हमला ताला दिही।
अखबार चलने वाला मन ल
रोज नवा मसाला दिही।
सिरमेंट रेती छड़ खवैया मन,
का भुखउ ल निवाला दिही।
काम नई देवय कोनो हाथ ल,
जपे बर सबला माला दिही।
हर चौक म दारु भट्ठी,
अउ पिए बर पियाला दिही।
सबे परे हे खखाये-भुखाये,
कोन ह कोन ल काला दिही।
'परसाद' जला के घर अपन ल
कबतक दूसर ल उजाला दिही।
जिनगी म उकेरे पियार होही।
छत्तीसगढ़िया सेर।
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।
बाबा किहिस मोर से।
झूठ लबारी मार झन।
झूठ लबारी मार झन।
भूल ककरो उपकार झन।
आह घलो हा लग जाथे
छानही ककरो ओदार झन।
तीर तार के डूबकैया आस ,
भरे तरिया के पार झन।
हिरदय के मोर हाल पूछ के,
जरे म अउ नून डार झन।
बोर दे चाहे पार लगा,
गठबंधन सरकार झन।
तरी तरी मसकत मलाई,
दीया ल अभी बार झन।
रखवार हे गोल्लर ह इहाँ के,
रइचर ल अभी तार झन।
परसाद जे कोनो सरन म आवे,
कभू ओला दुत्कार झन।
शायरी मोर छत्तीसगढ़ के
सपना भर निराला दिही
रोज नवाँ घोटाला दिही।
डवकी,लइका, साला दिही।
फ़ोकट मा अब ताला दिही।
रोज नवाँ मसाला दिही।
भुखउ ला काबर निवाला दिही।
जपे बर सबला माला दिही ।
हर हाथ म प्याला दिही।।
कोन हा कोन ला,काला दिही।।
अपन पियास बुझात हे
बबा किहिस मोर ले
एक सवाल हे तोर ले
ये जो रोज रोज चीखने -चिचियाने वाला
मन कोन ए ?
जेन भुखाय हे ?
जेन पियासे हे?
जे बेघर हे ?
जे नंगा हे ?
का उकर दंगा हे?
में चेथी ल खजवावत
बने सोचेंव
अउ गोठियायेव
ये बाबा तँय नइ जानस !
वो मन कइसे चिल्लाही ?
वो बिचारा मन तो
अपने मारे मरत
कलेचुप मौन हे
त तहीं बता न रे नाती!
ये चिचियाने वाला कोन हे?
कोन हे ?
कोन हे?
मँय कहवे बबा!
इही बात के तो रोना हे
इहाँ आन के गाय अउ
आन के दुहना हे।
इहाँ उही मन चिल्लात हे /
जेन मन देश आजादी के
बाद ले अब तक ,
हमर भूख अउ गरीबी ला
सवारथ बर भुनात हे/
हमर पियास ले,
अपन पियास बुझात हे।
* मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"
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