मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के

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कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,

सार छन्द : होरी

राधा बोलिस मोहन काली, होरी खेले आबे।
रास रचाबे हमर गाँव मा, रंग गुलाल उड़ाबे।

वृषभानू के राज दुलौरिन, मोर गाँव बरसाना।
करिया कारी कालिंदी के, तिरे तिर चले आना।

रद्दा देखत खड़े रहूँ मँय, फरिया पहिरे सादा।
आना परही काली तोलि, भुला जबे झन वादा।

मनमोहन हा हाँसत बोलिस, आहूँ काली राधा।
कइसे तोला भुला जहूँ रे, तोर बिना मँय आधा।

जब जब मोला सुरता करबे, अपन तिर म पाबे।
होरी होही ब्रज मा अइसे, जीयत भर सुरताबे।

गोरी मोरे रंग रंग के, लाल लाल हो जाबे।
बन जाहूँ मँय तोरे राधा, किसना बन इतराबे।








छप्पय छन्द

नाली भरगे हाय, सरे कस बस्सावत हे।
करही कोन ह साफ, समझ मा नइ आवत हे।
कचरा के हे ढ़ेर, फेर ये झिल्ली पन्नी।
लाखों होगे पार, फेक के चार चवन्नी।
कचरा भ्रष्टाचार के, लेस देव चतवार के।
बहिरी धर सब साफ कर, बेरा हे इंसाफ कर।1।

वादा के भरमार, चार दिन चलही संगी।
टकला बर सरकार, लान के देही कंघी।
अब चुनाव हे पास, खास हो जाही जनता।
नेता आही गाँव, पेट भर खाही जनता।
मुद्दा के हर बात ला, दार साग अउ भात ला।
मतलब बर भरमाय सब, जनता के जज्बात ला।

रचरच रचरच आय, सड़क मा बइला गाड़ी।
गाँव गवतरी जाय, करय अउ खेती बाड़ी।
घन्नर घेंच बंधाय, बाजथे घनघन घनघन।
दउड़त सरपट जाय, हवा कस सनसन सनसन।
आज नंदागे कालके , बइला गाड़ी छाँव रे।
मोटर गाड़ी मार हे, तब ले सुन्ना गाँव रे।

आसा अउ बिस्वास, माँग के कोन ल मिलथे।
अपन हाथ अउ गोड़, चला के जिनगी खिलथे।
होबे जाँगर चोर, नदी मा दीया ढिलबे।
फुटय करम हा तोर, आन के चादर सिलबे।
छोड़ आलसी बीर बन, करम कमा रणधीर बन
पोंगा पण्डित माँग के, भोग लगाथे भाँग के।

आँटे पैरा डोर, बइठ के पैरा जिनगी।
कभू बेच के चाय, तलत हे भजिया जिनगी।
करम करे का लाज, शुरू कर बढ़बे आगे।
दुनियाँ हे रफ्तार आज सब दाउड़े भागे।
चलत चलत सागर मिलय, रुके धार बसाय रे।
ठीहा मिलही ठेल के, ठेलहा धोखा खाय रे।

रोना रोये आज, करम के गठरी बाँधे।
संसो के तँय साग,ऊँ जिनगी भर राँधे।।
काबर लगे लाज , काम तो करे ल परथे।

बनके जाँगर कोड़िया, सो सो उमर बिताय जी।
बोझा होगे जिन्दगी, बिरथा जान गवाय जी।

हमन भूखर्रा तान, कमा के खाथन तब ले।
गड्थन सीधा जाय, गोड़ मा काँटा हब ले।।
उघरा हम रह जान, ढाँक के तन दूसर के।
मरथन भूख मा फेर, नहीं हक मारन पर के।।
छत्तीसगढ़िया सोज रे, करथन बिनती रोज रे।
रोज मनाथन जोग रे, दे के छप्पन भोग रे।

मया ल काबर मोर,नहीं तँय जाने बइरी।
मन मा करते सोर, पाँव के तोरे पइरी।।
निष्ठुर नैना तोर, करेजा घायल होगे।
कहिथे पूरा गाँव, टुरा अब पागल होगे।।
पीरा बाचे हे अभी,ले के जाही जान रे।
सुरता तोरे अब बही, छोड़े नही परान रे।।

जब्बर कर गोहार , उठा के हाथ अपन के।
माँगे बिन अब यार, मिलय हक नही सबन के।
कलजुग के भगवान, यही मन होगे संगी।
मोठ्ठा बर अनुदान, दुबर बर भारी तंगी।
जब सब जनता गाँव के, पनही धर के पाँव के।
हकआपन माँगथे, खूंटी मा टोपी टाँगथे।

अमृतध्वनि छन्द

आ के मँय दरबार मा, हे हनुमन्ता तोर ।
पाँव परँव कर जोर के, सुन ले बिनती मोर।।
सुन ले बिनती, मोर पवनसुत, बिपदा भारी।
कँरव आरती, थाल सजाके, तोर पुजारी।।
फूल पान मँय, लाने हावव, माथ नवा के ।
दे दे दरसन, करके किरपा, तीर म आके।।

फागुन आगे ले सगा, गया ले तहूँ हा फाग।
बजा नगारा खोर मा, गा ले सातो राग।
गा ले सातो, राग मतादे, हल्ला गुल्ला।
आज बिरज मा, बनके राधा, नाचय लल्ला।
अब गोरी के, कारी नैना, आरी लागे।
मया बढाले, नैन मिलाले, फागुन आगे।

बोली बतरस घोर के, मुचुर-मुचुर मुस्काय।
मुखड़ा है मनमोहिनी, हाँसत आवय जाय।।
हाँसत आवय, जाय हाय रे, पास बलाथे।
तीर मा आ के, खन खन खन खन , चुरी बजाथे।।
नैन मटक्का, मतवाली के, हँसी ठिठोली।
जी ललचाथे, अब गोरी के, गुरतुर बोली।।

काँटा बोलय गोड़ ला, बन जा मोर मितान।
जन सेवक ला आज के, जोंक बरोबर मान।।
जोंक बरोबर, जान मान ये, चुहकय सबला।
बनके दाता, भाग्य विधाता, लूटय हमला।।
अपन स्वार्थ मा, धरम जात मा, बाँटय बाँटा।
हमर राह मा, बोवत हे जे, सब दिन काँटा।

फुलवारी मा मोंगरा, महर महर ममहाय।
परमारथ के काज हा, कभू न बिरथा जाय।।
कभू न बिरथा, जाय हाय रे, बन उपकारी।
प्यास बुझाथे, सबला भाथे, बादर कारी।।
मरते सैनिक, करथे सबके, पहरेदारी।
तभे वतन हा, ममहाथे जी, जस फुलवारी।।

लबरा मन हर बाँटही, आस्वासन के भात।
रहय चँदैनी चार दिन, फेर कलेचुप रात।।
फेर कलेचुप, रात ह कारी, तोर दुवारी।
अब छुछुवाही, सब झिन आही, आरी पारी।।
मार मताही, खलबल खलबल, सबझन डबरा।
दे दे चारा, जाल फेकही, नेता लबरा।।

नारी ममता रूप हे, मया पिरित के खान।
घर के सुख बर रात दिन, देथे तन मन प्रान।।
देथे तन मन, प्रान लगाके, सेवा करथे।
सुख दुख सहिथे, अउ घर भर के , पीरा हरथे।।
दाई-बेटी, बहिनी- पत्नी, अउ संगवारी।
अलग अलग हे, नाम फेर हे, देवी नारी।

कुण्डलिया


जब जब मनखे हारथे, खुले जीत के राह।
गिर उठ कर के हौसला, खोज नवा उत्साह।
खोज नवा उत्साह, चाह ला पंख नवा दे।
झन जुड़ाय अब आग, रोज तँय  फूँक हवा दे।
मारे जब झटकार, हाथ ले सकरी खनके।
बँधना टोरय खास, आस कर जब जब मनखे।1।

तोरे बस मा राम हे, झन तँय कर आराम।
जिनगी माँगे तोर ले, कर ले बेटा काम।।
कर ले बेटा काम, भाग ला अपन गढ़ ले।
खेत खार ला देख ,संग मा थोकुन पढ़ ले।।
पानी कस हे धार, मेहनत दउड़य नस मा।
हार जीत सब यार, रही तब तोरे बस मा।2।

खाथे मलाई रात दिन, नेता मन हर खास।
आजादी के नाव ले , आजो हमला घाँस।।
आजो हमला घाँस, फाँस हिरदय मा गड़थे।
निज स्वारथ ल साध, आज सब आघु बढ़थे।।
जनता है बर्बाद, बढ़े, ऊँच नीच के खाई।
मरे भूख से देश, आज वी खाय मलाई।3।

चाटी चुरगुन गाय गरू, अपन पेट बर खाय।
वोखर जग मा नाव हे, परहित जे मर जाय।।
परहित जे मर जाय, उही इतिहास म जीथे।
नीलकण्ठ बन जेन, जेन जगत के जहर ल पीथे।।
धन दौलत अउ नाम,सबो हो जाही माटी।
मानुस पर बर आय, अपन बर जीवय चाटी।4।

रोटी है संसार मा, भूखे बार भगवान ।
सुरुज उगे जब पेट मा, तन मा तब दिनमान।।
तन मा तब दिनमान, रात हा घलो सुहाथे।
मिहनत कर इंसान , पेट भर अन ला खाथे।।
सबो हाथ ला काम, लाज बर मिलय लँगोटी।
किरपा कर भगवान, सबो ला  दे दे रोटी।5।

बइठे आमा डार मा, कउवा बोलय काँव।
कोन गली हे कोयली, सुन्ना परगे गाँव।।
सुन्ना परगे गाँव, छाँव हा घलो नँदागे ।
बिरवा कटगे हाय, गाँव मरघट्टी लागे।।
करे नहीं अब बात, रहे सब मुँह ला अइठे।
चौरा हे न चौक, कहाँ अब मनखे बइठे।6।

दुर्गा दाई आज तँय, धर चण्डी के रूप।
बइरी मन के नास कर, रणचण्डी तँय झूप।।
रणचण्डी तँय झूप, गाँज दे मुड़ के खरही।
लहू बोहावय धार, तोर जब बरछी परही।।
बढ़गे अतियाचार, तहीं हा हमर सहाई।
आजा रन मा आज, मोर तँय दुर्गा दाई।7।

हर दफ्तर मा मातगे, चिखला भ्रष्टाचार।
सरकारी अनुदान तँय, कइसे पाबे यार।।
कइसे पाबे यार,चढ़ावा बिना चढाये।
बाबू साहब लोग, सबो हे जीभ ल लमाये।
का करबे प्रसाद, फँसे एखर चक्कर मा।
घुस खाये के होड़, मचे हे हर दफ्तर मा।8।


विपदा तोरे जिंदगी , के करही सिंगार।

तपके सोना के सहीं, पाबे तहूँ निखार।

पाबे तहूँ निखार, हार के झन थक जाबे।

रेंगत रेंगत यार, एक दिन मंजिल पाबे।

आसा अउ विस्वास, राख के मन मा जोरे।

हिम्मत जाही जीत, हारही विपदा तोरे।9।


पनिहारिन मन  हॉस के , तरिया नदिया आय।

घाट घठौन्डा फूल कस,महर महर ममहाय।

महर महर ममहाय, गाँव के गली गली हा।

देखय अउ सरमाय, फूल के कली कली हा।

सुख दुख अपन सुनाय, चार झिन सँगवारिन मन।

हाँसत आवय जाय, आज जब पनिहारिन मन।





रोला

जिनगी के दिन चार, बात ला मोरो सुन ले।
माया हे संसार, आज तँय एला गन ले।
        जीयत भर के नाँव, तोर पल मा मिट जाही।
        जोरे धन भरमार, काम नइ तोरो आही। 1।

रीसा झन तँय आज, बात तोरे माने हँव।
लच्छा खिनवा हार, तोर बर लाने हँव।
         तँय जिनगी मा मोर, मया रस  घोरे हस।
         सुख राखे परिवार, मोर ले गठजोरे हस।2।

भूखन लाँघन लोग, कभू झन कोनो सोवय।
बाँधे पथरा पेट, नहीं अब लइका रोवय।
         दे दे सबला काम, सबो ला रोजी-रोटी।
         किरपा कर भगवान, मिलय सब झन ल लँगोटी।3।

नेता खेलय खेल, बजावै  जनता ताली
अब तिहार तो रोज, मनावै जनता 
खाली
        सस्ता चाउर-दार, पढावै हमला पट्टी।
        ले लय सबला लूट, खोल के दारू भट्ठी।

काँटा बों के यार, फूल तँय कइसे पाबे।
अपन करम के भार, तहूँ हा इहें उठाबे।
        पर पीरा बर रोय, मान वो जग मा पाथे।
        उदिम करइया हाथ, भाग ला खुद सिरजाथे।

मछरी काँटा मोर, घेच मा अइसे फँसगे।
आवय- जावय साँस , नहीं अब  जउहर  भइगे।
         होगे आँखी लाल, लार मुँह ले चुचुवावय।
         काबर खाये आज, सोच के मन पछतावय।

जूता चप्पल मार, फेक के वो मनखे ला।
खन के गड्ढा पाट, चपक दे माटी ढेला।
        काम करे न काज, रोज जे मार लबारी।
         मनखे मनखे भेद, करे स्वारथ बर भारी।

कहाँ रिहिस हे बात, करे के दारू बन्दी।
धान पान के भाव, घलो तँय मारे डंडी।
        मिठलबरा तँय मार,लबारी मन भरमाये।
        भूखन जनता देख, पेटभर कइसे खाये।
        

कइसे मरय  किसान, कभू नइ सोंचे काबर।
लउठी धर के देख, फाँद के बइला नाँगर।          गुंगवावत हे तोर , करम के गांजे खरही।
       अब चुनाव हे आज, लबारी भारी परही।
        

उल्लाल ३

चल जोड़ी अब बाजार मा, लाली भाजी बेच के।
मँय पैरी लेहव गोड़ बर, अउ माला ला घेच के।।

जा गोटी सुरता के गड़य, जोही तोरे पाँव रे।
तँय किंदर  दुनियां भले, फिर आबे अब गाँव रे।

उल्लाला 2

कीमत मनखे के कहाँ, महिमा पइसा के जहाँ।
मानवता ह नदात हे, मनखे मनखे  खात हे।।

जंगल के सब जानवर, आवत जावत हे सहर।
पछतावत मन मार के, जंगल सबो उजार के।

जहर हवा मा घोरथे, आघु पाछु डोलथे।
रोटी रोटी बोलथे, अउ मनखे ला तोलथे।

मोर गाँव के डोकरा, संग संग मा छोकरा।
खाये जाथे ओखरा, खाथे मिलके बोकरा।

तिवरा भाजी राँध के, भउजी भेजे बाँध के।
भइया खावय चाट के, सबो मया ला बाँट के।।

उल्लाला 1

बिनती सुन ले मोर प्रभु, करबे तँय उद्धार जी।
पालनहारी जान के, आये हँव मँय द्वार जी।।

नहीं नहीं कोई कहे, कोई दय दुत्कार रे।
माँग-माँग के जिंदगी, लगही बेड़ापार रे।।

सुन्दर तोरे सुन्दरी, रुप रंग अउ चाल वो।
माते हाँवव देख के, हो गे हँव कंगाल वो।।

मूरख तन के का गरब, बिरथा एखर प्रीत रे।
माटी माटी मा मिलय, इही जगत के रीत रे।।

माटी हो गे हे इहाँ , बड़े-बड़े बलवान मन।
का संगी धन के गरब, माटी के इंसान मन।।

मनखे मनखे एक हे, छोट बड़े न होय जी।
माटी फल तोला दिही, जइसे बिजहा बोय जी।।

प्रसाद के दोहा : इंटरनेट

गूगल बाबा हे गजब, खोज जिनिस सब लाय।
कोन वेबसाइट कहाँ, का का करे बताय । 1।

मजेदार यू ट्यूब हे, विडियो के भरमार।
बइठ अपन घर देख ले, पल भर मा संसार ।2।

फेमस हे संसार मा ,  फेसबुक महाराज।
पहली करथे पयलगी ,छोड़ जबो सब काज।3।

सुग्घर  हे विकिपीडिया , भरे ज्ञान भंडार।
सब भाखा सब  विषय मा, मिलही तोला सार।4।

पनिहारिन मन घाट मा,सुख दुख ल गोहराय।
ट्विटर म घलो वइसने , चहल पहल सकलाय।5।

नेट रेट हा बाढ़गे, सर्वर होगे लेट।
गेट गेट मा वेट हे ,काकर भरबो पेट। 6।

दिन भर नाचय अंगरी, रंग मंच  कीबोड।
मेमोरी कतको बढ़े ,डेटा ओवरलोड।7।

रिश्ता नाता  नेट मा , मया मयारू गोठ ।
सोसल मिडिया मा जुरे, बतियावत हे पोठ।8।

इंटरनेट  रईछई, दुनियाँ भर बगराय।
जइसे जाला मेकरा, भितरभितर लपटाय। 9।

एम एस ऑफिस मा सरल,  सब दफ्तर के काम।
पढ़ना लिखना पोछना , सकल  बुता आराम।10।

नेट म बैंकिंग ह सरल, लेन देन सदुपाय।
जल्दी जल्दी  मा घलो ,सकल काज सलटाय।11।

प्रसाद के दोहा : चुल्हा

चुल्हा माटी के हमर, घर भर बर जर जाय।
पेट जरे झन काकरो, मालिक करव उपाय।1।

छेना लकड़ी नइ बरय, चुल्हा हर कुहराय।
कलकलहिन हो बहुरिया ,सुख घर के जर जाय।2।

सबला देथे राँध के ,सुग्घर मन हरसाय।
घर के चुल्हा हाँसथे, नारी जब मुस्काय।3।

आगी चुल्हा मा बरे, घर भर हर सकलाय।
डबकत चाहा संग जी, सबके मया बंधाय। 4।

दाई चुल्हा गोरसी, छेना लकड़ी बार।
घर के सुनता झन बरे, सुखी रहे संसार। 5।

जब घर के चुल्हा फुटय, मुड़धर रोय सियान।
भाई-भाई लड़ मरय, तिरिया चरित महान।6।

गोरस चुरोय गोरसी , चुल्हा हा जी चाय।
नेवरनिन के मन चुरय, छोड़ बिछौना जाय।7।

चुल हा  चुल्हा  म चु लहा, बारे बर बम्बार।
जिनगी हे दिन चार के, चलना सोच विचार।8।

✍🏼मथुरा प्रसाद वर्मा "प्रसाद"

प्रसाद के दोहा : गुरु घासीदास बाबा

🙏🏼 बबा गुरु घासीदास जी के चरण म मोर  दोहा 🙏🏼

जात पात मानय नहीं ,सत के महिमा गाय।
पावन  जेखर आचरण, वो सतनामी आय।1।

नशापान अब बंद कर , मांसाहार ल  त्याग।
ज्ञान गुरु के हे इही , सतनामी तँय जाग।2।

मनखे आघू झन नवव, करव सिरिफ सम्मान।
जात पात ला त्याग के, सत बर दे दव जान।3।

अमरौतिन के लाल तँय ,मँहगू  के संतान ।
जनम धरे सतकाज बर, बाँटे सत के ज्ञान।4।

जैतखाम सत बर खड़े,धजा स्वेत लहराय।
गिरौदपुर के धाम हर , सत के  जस बगराय।5।

कपट करे मा साधना, अउ लालच मा त्याग।
भोग करे महिमा घटय ,मोह मया बैराग ।6।

सत बर देथे प्रान ला ,  तप बर त्यागे भोग।
साधक बाबा के सरल, जिनगी उंखरे जोग ।7।

चमत्कार तो ज्ञान हे, दिये गुरु बगराय।
ठगनी जग ठगता फिरय, निज स्वार्थ बिलमाय । 8।

🙏🏼

मथुरा प्रसाद वर्मा ' प्रसाद'

ये तो साले हद होगे यार।

ये तो साले हद  होगे यार।

गुदुम बजात , गद होगे यार ।
ये तो साले हद होगे यार।

बनाये बात बिगड़ जाथे।
नवा सड़क कस उखड़ जाथे।

लइका सिखाये म सिखय नही।
मुड़ पटक फेर लिखय नही।

रोग गुरुजी गारी खाथे।
एरे-गेरे मन आँखी दिखाथे।

उदिम जम्मो फोकट होगे यार।
ये तो साले हद होगे यार।


नेता मन ककरो सुनय नहीं।
ये बात ल जनता गुनय नहीं।

कुर्सी पा गे लबारी म।
देश बुड़ गे उधारी म।

बैपारी मोटात हे।
किसनहा दुबरात हे।

ससताहा चाँउर बिपत हो गे यार।
ये तो साले हद  होगे यार।

अस्पताल प्राइवेट , भट्टी सरकारी।
स्कूल म ताला, मास्टर बर तुतारी।

फोकट म राशन।
रोज नवा आस्वासन।

अखबार हरे के विज्ञापन।
पइसा पा के छापन।

साँस लेवाई झंझट हो गे यार।
ये तो साले हद  होंगे यार।

अधिकारी जे बुता कमीशनखोरी ।
दुकानदार बर कर(tex) के चोरी।

जनता बर लाने नवा योजना।
मिल बाँट खीसा म बोजना।

दुर्गति का ये, बेरोजगार ले पूछ।
योग्यता रहन दे , पहिली घुस।

बीमारी ये कइसे निचट हो गे यार।
ये तो साले हद  होगे यार।

प्रसाद के दोहा


जियत भर तो लगे रही, मोह मया के राह।
ये तन इहें जर  जही, छूूूट जही  सब चाह।१।

रोटी पानी पेट ला , दे दे पालनहार।
रोज रोज के बइठका, करत रही सरकार।२।

नीति कुनीति बिचार के, जीभ तोर लहुटार।
जीभ डोले जिया जले, जर जाए संसार।३।

मुफ़त म देथे  बाँटके, दार भात सरकार।
पुरसारथ  गिरवी धरे, जनता हे लाचार।४।

छोड़न छाडन बर कहूँ, छोड़ दिही संसार ।
छि छि अइसन प्रेम ला, बार बार धिक्कार।५।

पेट म रोटी ओनहा, तन बर दे दे आज।
छइहाँ दे दे  ढाकहूँ, मुड़ ल घलो महराज।।६

माँगत माँगत तोर से , लगे नहीं अब लाज।
देने वाला  हस  तहीं, देवत हस महाराज।७।

कइसे होही कहव का,  ये जिनगी हा पार।
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।८।

नीयत मा हे गंदगी,  कुछ तो होय निदान।
भ्रष्टाचारी बर चलय, हाथ सफइ अभियान।९।

शाला में ताला लगे, मदिरालय आबाद।
व्यापारी राजा हमर, पीढ़ी एक बर्बाद।१०।

लोभी कामी मन इहाँ,बने पुजेरी आज।
करम धरम जानै नही,हमर हवै महराज।11।

लोकतंत्र मा वोट के, महिमा अपरंपार
बेचारा जनता बने, मजा करे सरकार।12।

बिन पइसा के आप ला , मिले नहीं अब मान
दो कौड़ी के भाव मा, बेचावत  ईमान।13

मया अउ बन के मिरगा, भटकत खारे-खार।
मया  करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।14।

प्रसाद के दोहा : मया


मया मरम जानय नहीं, मया मया चिचियाय।
पल भर मा जर के सहीं,  चढहे उतरे हाय। ।1।

काकर बर मैं राखहूँ, ये हिरदे सिपचाय।
बइरी  होंगे हे मया, जीय ल मोर जलाय।2।

मया परे तन हा जरय, मन प्यासे मर जाय।
तन  मन पैरावट सहीं, भितर भितर गुगवाय।3।

आँखी  काजर आँज के, लाली ओठ रँगाय।
रूप सजा के मोहनी , बिजुरी मन म गिराय।4।

संगी रे तोर  सुरता, जब जब मोला आय।
जिनगी  बोझा  कस लगे, सांस आय अउ जाय।।5।

कइसे होही का कहव ,  ये जिनगी हा पार।
डोंगा डगमग डोलथे, फसे बीच मजधार।6।

मन मिरगा संसार मा, भटकय खारे-खार।
मया  करे ले ही कहूँ, मिलय मया नइ यार।7।

मथुरा प्रसाद वर्मा

हपट के मरथे

मीठलबरा के गोठ ह चलथे।
सिरतोन कहे म जम्मो उसलथे।

करम कमाई कोनो नई पूछय,
बेईमानी के सिक्का चलथे।

उही बनाते इहाँ सड़क ल,
खा के डामर पेट ह पलथे।

कानून कायदा, खेलवारी होंगे
मतलब परगे साचा म ढलथे।

राजनीती के चिक्कन रद्दा
सोजमतिहा के पांव खसलथे ।

झपट परे सब गुर कस चाटा,
जे नई पावय हाथ ल मलथे।

उहि ह पाथे ठीहा ठिकाना
गिरे परे म घलो खासलथे ।

धीरज धर चल परसाद सरलग,
दौड़ाइए हर हपट के मरथे।

मथुरा प्रसाद वर्मा प्रसाद

मोर छत्तीसगढ़ मुक्तक






नसा  नस-नस मा समागे , आज के समाज के ।
नसा के गुलाम होगे , नवजवान आज के ।
पीढी -दर -पीढी एखर  परचार चलत हे
अरे एखरे कमाई मा  सरकार चलत हे ।



मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।
तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव ,
तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।




मोर छत्तीसगढ़ी गीत: गणतंत्र

मोर छत्तीसगढ़ी गीत: गणतंत्र

गणतंत्र

अपील हे, अनुरोध है।
बालक ये अबोध हे।
कहत हौ सुन लव
मने मन गु लव
हाथ जोड़ के बिनती हे।

साल दर साल
देश के माथा म
चटक जाथे
एक अउ गिनती हे।

में आज तक नई
समझ पायेव
खुश होवव
की रोवव

काबर कि
जेला गणतंत्र
तुमन कहिथव
वो  समझ के भूल हे।

अउ जेला गणतंत्र
मैं समझथव
वोकर बारे में
गोठियाना फिजूल हे।

आओ पढ़बो अउ पढ़ाबो,

आओ पढ़बो, अउ पढ़ाबो,
गियान के उजियार फैलाबो।
अंधियारी ल मिटारे खातिर,
चल न दिया जलाबो।
गाँव गाँव अउ घर घर म।
गली गली अउ डगर डगर म।

हिरदे के बात कका

बता मत हिरदे के बात काका ।
करही  सारी दुनिया ह घात काका।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे।
बांटत गियान साँझ सबेरे।
अपन भीतर झाँकय नहीं।
पुछही तोर औकात कका।
पोंगा पण्डित महिमा मण्डित।
बाँटत समाज करत विखण्डित।
सब स्वार्थ के खेल हरे जी,
मूर्खता हे जातपात कका।
बड़बोला मन, खाये मनमानी
सोजमतिहा नई पावय पानी।
सच गोठियाबे त झंझटिहा अस,
बदल गे अब हालात कका।

छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी


1.
आज मोर देश मा हे, चारो कोती बेईमानी,
बाढ़त मंहगाई ले, लोग परेसान हे।
पक्ष अउ विपक्ष मा, माते हावे झगरा ह, 
जनता के हित बर, कोन ल धियान हे?
नेता मन मीठ मीठ, गोठ कर भुलवारे, 
मजदूरी किसानी मा, छुटत परान हे।
झन कही बात सहीं, तही बैरी बन जाबे,
चोर पहरेदार के,  बनगे मितान हे।

2.
छत्तीसगढ़ी भाखा ल, छत्तीसगढ़  म सँगी
राजभासा हक अब, देवाये ल परही।
उही कवि लेखक ह, रही इतिहास म जी,
जे निज भाखा बर,  जिही अउ मरही।
जे हा बैरी मन के जी, पाँव तरी परे रही,
उही बेशरम चारा, चार दिन चरही।
कहे परसाद ह जी,हाथ जोड़ पाव पर,
मर जा तै हक बर, पुरखा ह तरही।

3.
मया मा बंधा के गोरी, मैं हा तोर चोरी चोरी,
कारी कारी नैनन म, नैन अरझाये हौं।
भूख प्यास लागे नहीं,जिहां देखो तोरे सहीं,
रही रही गली गली , चक्कर लगाये हौं।
अब कोनो ताना मारे, कोनो मोला भुलावारे,
तारे-नारे तारे-नारे, गीत तोर गाये हौं।
बइहा सही घुमथौ, नाचत अउ झुमथौ,
घूम घूम तोरे संग,  पिरित लगाये हौं।

4
देश के भविष्य गढ़, पढ़-पढ़ पढ़-पढ़,
अनपढ़ झन रह , चल आगे बढ़ जी।
आखर के खेती कर, कर म कलम धर, 
अंधियारा मेटे बर, डट कर लड़ जी।
उबड़ खाबड़  रद्दा, जिनगी के हावे तभो
उठ-गिर गिर-उठ, पाहड़ मा चढ़ जी।
अड़बड़ गड़बड़, चारो कोती मचे हे जी,
सम्हल के चल तँय, जिनगी ल गढ़ जी।

5,
अब  कोनो ह काबर, हक बर लड़े नहीं,
जेला देख  तिही अब, मुड़ ल नवाये हे।
डर डर डर डर, जियत हे मर मर,
अत्याचारी बैरी करा, सब ला लुटाय हे।
इही माटी हरे जिन्हां, वीर नारायण सिंह,
 देश बर लड़ लड़ , शीश ल चढ़ाये हे।
गुंडाधुर जैसे वीर,बइरी के छाती चीर।
लहू के तरिया मा, तौर के नहाये हे।





यार गदहा रे।

झन सरमा तँय यार गदहा रे।
तोरे  सहीं   संसार गदहा रे ।
नारियाये बर सबे नारियाथे
तही ह  खाथस मार गदहा रे।

लड़ चुनाव मंत्री बन जाबे,
मिहनत हे बेकार गदहा रे।
पढहे लिखे मन करय मजूरी ,
सिस्टम हे बेकार गदहा रे।

का सासन अउ का परसासन ,
माते भ्रस्टाचार गदहा रे।
बड़े बड़े ल कोन सुधारय ,
संसद हे लाचार गदहा रे।

लगाये मुखउटा बाटय गियान,
तोरे रिस्तेदार गदहा रे ।
कतको चेला आघू पाछु,
रोज खड़े हे  दुवार गदहा रे।

नियत म तोर वफादारी हे,
तभे खड़े लाचार गदहा रे।
तहुँ हा ऊँचा पदबी पाबे,
बन थोड़ा मक्कार गदहा रे।

कहे प्रसाद पुकार गदहा रे,
झन करबे  कभू प्यार गदहा रे।

हो जाही कहूँ तोरो शादी

जिनगी तब बेकार गदहा रे।


का सोचत हस?


चल न संगी लोटा धर के ,खेत म जाबो ,
का सोचत हस?
लहुटती बेरा मछरी धरे बर, तरिया मताबो, 
का सोचत हस?


सबके सुन, कर अपन मन के,काहत हे तेन ल काहन  दे ।
सब झन कहिथे पढ़े लिखे हस, तोर बुध तोरे मेर रहन दे।
नौकरी के अब आस छोड़, चल बाजा बजाबो, 
का सोचत हस? 

ओथिहा हो गे लोग बाग सब, जांगर टोर कमाथे कोन?
अब तो समझव चद्दर ओढ़ के,लुका जलेबी खाथे कोन?
चल जुरमिलके सुनता बना के, भट्ठी जाबो .
का सोचत हस?


नवा ज़माना के नवा चलन हे,तइहा  के गोठ ले ग बइहा ।
आज काल के लोग लइका बर,बिरथा हे बर पिपर छइंहा ।
चल बुढ़वा दाई दादा ला,घर ले भगबो, 
का सोचत हस?


पेट म सबके बइठे परेतिन,अउ  मुड़ म बइठे मसान।
नरपिशाच मन गिंजरत हावे,लहू पियत हे दिनमान।
एक मन्तरा हे,समझ बुझ के,ओट दे जाबो
का सोचत हस?

तलवार झन तलवार के धार देखव जी।


तलवार झन तलवार के धार देखव जी।
हुजूर आज के अखबार देखव जी।



राम ह टोर दे हे अपन मरजादा,
कलजुग म रावन के भरमार देखव जी।



जरत हे खेत खार , दुकाल के मारे,
ऊपर ले मंहगाई के मार देखव जी।



डाक्टर के फ़ीस सुन के मरीज ह मर गे
नर्स कहत हे बुखार देखव जी।



डरपोकना जनता रिश्वतखोर अधिकारी,
आउटसोर्सिंग से बने सरकार देखव जी।



छत्तीसगढ़िया सेर बन्द हे सरकस के पिंजरा म
कोलिहा मन करत हे इन्हे सीकर देखव जी।



गदहा अउ जोजवा मन , अकल के ठेकेदार हो गे
सिक्छा ह बेचात हे सरेबाजार देखव जी।



बहुत होंगे झन सहव, मार हथोड़ा जोर से
दीवार जुन्ना होंगे, दरार देखव जी।



सबे झन अपन ए कोन ल छोड़ दव
दिल म परसाद दुलार देखव जी













भूख

भूख अउ बड़हत हे, वो मन खात जात हे।
सब उंकर भोभस म , भरात जात हे ।

तभो ले भूख साले उंकर नई मिटाय,
लूट लूट के सब ल पचात जात हे।

जमीन जंगल, रुख राई, कहीं  नई बचीस
समसान तको ल पोगरात जात हे।

रेती गिट्टी, सिरमेंट छड़ अउ धुर्रा माटी,
सौहत सड़क ल निपटात जात हे।

वाह रे बेईमान , बाढ़त तुंहर खनदान,
कउवा कुकुर सही जम्मो ल बलात् जात हे।

का करय जनता, उन्डे पी के मन्द महुवा
बेसरम कस वो मन ह भोगात जात हे।

देख देख के  मन कल्पथे, त बोले बर परथे,
'परसाद' अब मति मोरो छरियात जात हे।


उजाला दिही

सपना भर निराला दिही।
रोज नवा घोटाला दिही।


नेता मन ह देस ल अपन,
डउकी , लइका , साला दिही।


चोर मन ल चाबी दे दे के,
फोकट म हमला ताला  दिही।


अखबार चलने वाला मन ल
रोज नवा मसाला दिही।


सिरमेंट रेती छड़ खवैया मन,
का भुखउ ल निवाला दिही।


काम नई देवय कोनो हाथ ल,
जपे बर सबला माला दिही।


हर  चौक म दारु भट्ठी,
अउ पिए बर पियाला दिही।


सबे परे हे खखाये-भुखाये,
कोन ह कोन ल काला दिही।


'परसाद' जला के घर अपन ल
कबतक दूसर ल उजाला दिही।

जिनगी म उकेरे पियार होही।


जिनगी म उकेरे पियार होही।
सिक्का के जीहां बौछार होही।

धन  बर बनही सबो रिस्ता नाता,
मया के डोरी तार तार होही।

दू कौड़ी  मा ईमान बेचाही ,
ये दुनिया ह सिरतोन बजार होही।

लबरा मन के दिन ह बहुरही,
सतवन्ता  के ऊजार होही।

पइसा के बाढ़ही  कतका ताकत
मनखे ह कतका अउ लाचार होही।

जनता लुटाही संझा बिहिनिया,
बैपारी मनके जब सरकार होही।

अब कौन बचाही काकर धन ल,
चोर मन जिहां पहरेदार होही।

कतको बरजबे कोनो नई माने,
परसाद' जिनगी तोरे ख्वार होही।



छत्तीसगढ़िया सेर।

भीख झन मांगव, अब तो जागव, होवत हे अंधेर।
अब मुँह फाडव, अउ दहाड़व, छत्तीसगढ़िया सेर।


बिल्होरे हे मिठलबरा मन, खेलत हावय खेल।
ऊंच पदबी अपने मन पाथे, दे के हमका ढकेल।


हमन चुगली-चारी करथन, अपने मन बर कैराही ।
हमन जुठा पतरी चाटन , वो मन रसगुल्ला खाही।


देर होतिस त कुछू नई कहितेन, होवत हे अंधेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व , छत्तीसगढ़िया सेर।


हमरे जंगल, हमरे भुंइया , तब ले हमीं भिखारी।
हम होगेन जोतनहा बइला , वो मन धरे तुतारी।


हमरे राज ले हमरे पलायन ,छुटत घर अउ दुवारी।
हमी बन गेन निच्चट कुटहा, खाथन उंकर गारी।


कुआँ खनव जी अब सुनता के, सुमत के टेरा टेर।
अब मुह फाड़व अउ दहाड़व, छत्तीसगढ़िया सेर।


हमरे गाँव, सहर हे हमरे, हमरे घर अउ दुवारी।
हमरे भाखा संस्कृति अब , खोजत हे चिन्हारी।


हमरे मन्दिर देवता धामी, वोमन बने पुजारी।
हमरे मुड़ मा हमरे पनही, उंकर सोनहा थारी।


सुते रहव झन बेसुध हो के, देखव नजर ल फेर।
अब मुँह फाड़व , अउ दहाड़व ,छत्तीसगढ़िया सेर।


वो मन साहूकार बने हे, नेता अउ बैपारी।
धन बल सब हो गे उखर, हमर जिनगी उधारी।


सोन चिरईया,धानकटोरा ,छत्तीसगढ़ महतारी,
ओकर बेटा धरे कटोरा, छी कैसे लाचारी।


क्रांति के कुकरा बासन दे , चढ़ के अब मुंडेर।
अब मुँह खोलव, अउ दहाड़व, छत्तीसगढ़िया सेर।

मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


सब भासा ले मीठ मयारू,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


सुवा करमा अउ ददरिया, 
      पण्डवानी अउ जसगीत हे।


किस्सा कहानी आनी-बानी ,
      मया अउ पिरित हे ।


मुँह म ये रस घोरत रहिथे,
ये ह मीठ बतासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारू ,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



दाई के कोरा ले सीखे हवन,
       ये हमर गरब गुमान हे।
जे अप्पड़ के भासा समझे,
       सिरतोन वो नादान  हे।



हम तो सीना ठोक के कहिथन,
इही परान के आसा हे।

सब भासा ले मीठ मयारू,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



जम्मो राज म अपने भासा म,
       होवत हे सब काम जी।
लिखथे -पढ़ते अपने भासा म,
       करथे जग म नाम जी।



हमर राज बर छत्तीसगढ़ी,
इही हमर अभिलासा हे।


सब भासा ले मीठ मयारु
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


बड़े- बड़े गुनी गियानी मन,
सहित एकर सिरजाये हे।

दुनियां भर म एकर मया के,
झंडा ल फहराये हे।


अपने घर म तभो ले काबर,
रही जाथे ये ह पियासा हे

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा ये।



इस्कूल कालेज , कोट- कचहरी म,
छत्तीसगढ़ी बोलव जी।
विधानसभा के दुवारी ल,
महतारी बर खोलव जी।



बैरी मन ह खेल खेलत हे,
जस  सकुनी के पासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा ये।



हमर राज ल हमी  चलाबो,
नवा रद्दा अब गड़बो रे।
तभे  हमर बिकास होही।
जब अपन भासा म पढ़बो रे।



परबुधिया मन काय समझही,
का तोला  का मासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।



लड़े बर परही त लड़बो,
छत्तीसगढ़ महतारी बर।
मरे बर परही त मर जाबो,
अपन घर अउ दुवारी बर।



हमरे राज म हमी भिखारी,
बस अतके हतासा हे।

सब भासा ले मीठ मयारु ,
मोर छत्तीसगढ़ी भासा हे।


बाबा किहिस मोर से।


बाबा किहिस मोर से
एक सवाल हे तोर से

ये रोज रोज चिल्लाने वाला मन कोन ये?
कोन ये?
कोन ये?



ये रोज रोज के रैली
बन्द करथे बड़पेली
ये मन कोन ये?
कोन ये ?
कोन ये ?



का ये मन भूख मरत हे? 
का इंकर पेट जरत हे?



का ये मन बेघर हे?
का ये मन नंगा हे।
का इकर मन के दंगा हे



मय अपन चेथी ल खजवायेव,
बने सचेव अउ गोठियायेव।



ए बाबा वो मन कैसे चिल्लाही
वो परबुधिया मन तो
मंद महुआ पी पी के बौरात हे।
फोकट के पाये बर लाइन लगत हे।



वो मन का  चिल्लाही,
वो मन तो दूसर के गोड़ म
दबे  परे हे।

इकर जिनगी ल तो 
बाहिरी गोल्लर मन चरे हे।



इकर नाव ले वो मन चिल्लात हे।
जेन मन येमन ल लूटत हे
अउ खात हे।

इकर भूक पियास ले 
अपन पियास  बुझात हे।


झूठ लबारी मार झन।

झूठ लबारी मार झन।
भूल ककरो उपकार झन।

आह घलो हा लग जाथे
छानही ककरो ओदार झन।

तीर तार के डूबकैया आस ,
भरे तरिया के पार झन।

हिरदय के मोर हाल पूछ के,
जरे म अउ नून डार झन।

बोर दे चाहे पार लगा,
गठबंधन सरकार झन।

तरी तरी मसकत मलाई,
दीया ल अभी बार झन।

रखवार हे गोल्लर ह इहाँ के,
रइचर ल अभी तार झन।

परसाद जे कोनो सरन म आवे,
कभू ओला दुत्कार झन।

शायरी मोर छत्तीसगढ़ के

उखर हक फूल नइ आवय, जे काँटा आन बर बोंही।
के दिनभर  हाँसही चाहे, कलेचुप साँझ के  रोही।
पिरा ला देख के ककरो , कभू तँय हाँस झन देबे, 
आज मोर साथ होवत हे, काली तोर साथ मा हो ही।

वो मोला देख भर लिही , गुलाबी गाल हो जाही।
प्रेम के फूल हा फूलही अउ बगरके गुलाल हो जाही।
भुलाये नइ सकय  कभू, एसो के होरी ला;
मया के रंग म रंग के , वो लाले लाल हो जाही।

तोर सुरता के गोटी हा गोड़ मा गड़ जाथे।
मया के पा के पंदोली  मुड़ मा चढ़ जाथे।
मँय सोज अपन रद्दा म आथव-जाथव फेर;
जब तोला देख लेथव मोर मति बिगड़ जाथे।

मया म मुँह ओथराबे, त तँय बीमार हो जाबे।
वोखर बर जान दे देबे,तँय अखबार हो जाबे।
पार मा बइठ के रोये ले कोंन ह पार पाये  हे;
उदिम कर तँय हा बुड़ जाबे या  वो पार  हो जाबे।

मोर घर छितका कुरिया अऊ, तोर महल अटारी हे ।।
तोर घर रोज महफिल अऊ, मोर सुन्ना दुवारी हे ।।
तहु भरपेट नई खावस, महु भरपेट नई खावव 
तोला  अब भूख नई लागय, अउ मोर  जुच्छा थारी हे ।।

सपना भर निराला दिही


सपना बने निराला दिही।
रोज नवाँ  घोटाला दिही।

नेता  बड़े हरय  देश  ला
डवकी,लइका, साला  दिही।

चाबी दे दे हवे चोर ला,
फ़ोकट मा अब ताला दिही।

अखबार चलाने वाला मन ला
रोज नवाँ मसाला दिही।

रेती,सिरमेंट,छड़ खाने वाला
भुखउ ला काबर निवाला दिही।

काम कोनो ला नई देवय
जपे बर सबला माला दिही ।

हर  चौक मा दारू भट्टी ,
हर हाथ म प्याला दिही।।

सबे इहाँ हे खाखाये भुखाय,
कोन हा  कोन ला,काला दिही।।

'प्रसाद' अपन घर ला जला जला के '
कब तक पर ला उजाला दिही।

मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'

अपन पियास बुझात हे


बबा किहिस मोर ले
एक सवाल हे तोर ले
ये जो रोज रोज  चीखने -चिचियाने वाला
मन कोन  ए ?


 जेन भुखाय हे ?
जेन पियासे हे?
जे  बेघर हे ?
जे  नंगा हे ?
का उकर दंगा हे?


में चेथी  ल  खजवावत
बने सोचेंव 

अउ गोठियायेव
ये बाबा तँय नइ जानस !
वो मन कइसे चिल्लाही ? 


वो बिचारा मन तो 

अपने मारे मरत
कलेचुप मौन हे
त तहीं  बता न रे नाती!
ये चिचियाने वाला कोन हे?  

कोन हे ? 
कोन हे?


मँय  कहवे बबा!
इही बात के तो रोना हे

इहाँ आन के गाय अउ 
आन के दुहना हे।

इहाँ उही मन चिल्लात हे /
जेन मन देश आजादी  के 

बाद ले  अब तक ,
हमर भूख अउ गरीबी ला 

सवारथ बर  भुनात हे/
हमर पियास ले, 

अपन पियास  बुझात हे।


* मथुरा प्रसाद  वर्मा "प्रसाद"

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