मथुरा प्रसाद वर्मा एक क्रियाशील शिक्षक है साथ ही एक कवि और साहित्यकार है . छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के
- मथुरा प्रसाद वर्मा 'प्रसाद'
- कोलिहा लवन , बलौदाबजार, छत्तीसगढ, India
- नाम- मथुरा प्रसाद वर्मा पिता- स्व. जती राम वर्मा माता- श्रीमती पितरबाई वर्मा जन्मतिथि- 22-06-1976 जन्मस्थान - ग्राम -कोलिहा, जिला-बलौदाबाजार (छ ग ) कार्य - शिक्षक शा पु मा शाला लहोद, जिला बलौदाबाजार भाटापारा शिक्षा - एम् ए ( हिंदी साहित्य, संस्कृत) डी एड लेखन- कविता, गीत, कहानी,लेख,
सुन्दरी सवैया : हदराही
सुन्दरी सवैया : मत माथ नवाँ
झन लालच मा परके लुलवा, पर के मत खा अब गा तँय गारी।
सिधवा बन के बइला बनके, तँय काज करे कतको बढ़ भारी।
अरविन्द सवैया : भगवान
लड़थे दिनरात तभो न सबो, मनखे मन होवय जी बलवान।
मन हार गए सब हारत हे, मन जीत लिए जग जीत जवान।
पथरा कहिथे कतको ह भले, विसवास करे मिलथे भगवान।
अरविंद सवैया : सैनिक
जब सैनिक भारत माँ बर जी,तन ला हँस के करथे बलिदान।
उखरे तप त्याग हरे हम ला, दुनियाँ भर मा मिलथे पहिचान।
मत भूल कभू उपकार सँगी, मरगे अउ देश बढाइन मान।
जस गा कवि माथ नवाँ अपने, उखरे अब देश करे गुनगान।
सुन्दरी सवैया : बेटी
परिवार रहे सुख मा गुनके, विपदा सुख -त्याग निवारय बेटी।
अभिमान हरे घर के कुल के, लिख के पढ़के कुल तारय बेटी।
जिनगी भर तो लड़थे दुख ले,पर के सुख खातिर हारय बेटी।
अरविंद सवैया : गुरु कृपा
कुमहार रचे हड़िया जइसे, रचथे गुरु हाथ बने इनसान।
गुरु के पग मा विसवास करे, जतके सुनबे तँय जी रख ध्यान।
जिनगी हर धन्य बने तुमरे , बनथे जग मा तब नाम महान।
त्रिभंगी छन्द
लाँघन रही रही के, भूख सही के, रोज कमा के, गुजर करे।।
तँय बनके भोला, फैला झोला, जीभ लमावत, कहाँ चले।
दूसर के थारी , झाँक दुवारी, माँग खाय ले, मौत भले।1।
जे लाज सरम ला, बेंच धरम ला, माथ नवाँ के, गोड़ धरै।।
चिक्कन खा खा के, बड़ इतराके , खाय तभो ना, पेट भरे।
जेखर लालच मा, जीभ ह सच मा, लार बोहावय, धार धरे।2।
स्वारथ बर मरथे, कोनो करथे, लोक भलाई, काम कहाँ।।
सुनता अब टुटगे,ममता छुटगे, लोग लड़त हे, रोज तने।
घर अपने भर के, शोषण करके, महल बनाए, लोग बने।3।
मन ला तरसा के, मोह लगा के, कोन गली मा , जाय चली।।
हम गोबर चोता, नागर जोता, प्यार मुहब्बत, काय करन।
जेखर धर हाथे, ओखर साथे, जियत मरत तक, साथ रहन।4।
दोहा: सिखावन
दोहा
मुड़ मा मुतथे मेकरा , जब जब अवसर पाय।
खल देखाथेआचरण, बइठे घात लगाय।।
ये जनसेवक आजके, लूट देस ला खाय।।
शक्ति
122 122 122 12
*शक्ति छन्द*
बनाये बने राम संसार ला।
नहीं पाय कोनो कभू पार ला।
भवर मा फसाये किनारा बने।
तहीं आदमी के सहारा बने।
तहीं भूख दे पेट खाए सके।
दिए हाथ रोटी कमाए सके।
जिहाँ चाह दे राह दे हस तहीं।
विधाता कहूँ तोर जइसे नहीं।
बिगाड़े बनाये मिटाए तहीं।
कि जीना सबे ला सिखाए तहीं।
अभी घाम हे छाँव हो के रही।
इही जिंदगी के कहानी सही।
हवे प्यास पानी घला हे इँहा।
बिपत हे तभे हौसला हे इँहा।
कहीं दुख कहीं सुख रचाए तहीं।
भरे भाव दुनियाँ बनाए तहीं।
विष्णुपद छन्द :
चौपई : कइसे दिन आ गे हे आज
टूटत हे जनता के साँस। नोच नोच के खाँवय माँस।।
नइ लागय कोनो ला लाज। कहाँ जात हे आज समाज।।
गुरतुर बोली मन भरमाय। लाज सरम ला बेच के खाय।।
वर्दी बन के इखर गुलाम। रोज मचावय कत्लेआम।।
जेती मतलब ओती डोल। अउ स्वारथ बर हल्ला बोल।।
जब जब माँगय पानी चाय। जनता हा नँगरा हो जाय।।
मौका पावय झडकय माल। बिगड़े हे सबझन के चाल।।
मनखे कुकुर सही छुछुवाय। येखर ओखर पाछू जाय।
जतका बड़े बड़े हे नाँव। काला बचाव काला खाँव ।।
मार लबारी भर भण्डार । देश धरम के बंठाधार ।।
जनता हो गे हे लाचार। त्राही त्राही करे पुकार।।
चौपई : भले लेड़गा हँन महराज। हम हर नोहन धोखेबाज।।
चौपई : मोर सिखोंना धरले आज
तोर मूड़ नइ गिरही गाज। बन जाही सब तोरे काज।।
बिपत परे नइ चाबय नाग। जाग जही जी तोरो भाग।।
देश धरम बर जान गवाय। ये जिनगी बड़ भागी पाय।।
गाँव गली अउ खेती खार। रख सबले मीठा व्यवहार ।।
बड़े बड़े मनखे के धाक। रोग गरीबी करथे खाक।।
पर के झन लेवव उपकार। अपन बाट अपने चतवार।।
पर के काज अड़ा झन टाँग।दउड़ भले ले दू फललाँग।।
गोठ अपन भाई के मान। सच के खातिर तज दे प्रान।।
पहिली उतरे देखे धार ।। भवसागर ले पाबे पार।।
रूपमाला छन्द
जेन जनता बर लडत जी, पोठ खावय मार।
न्याय कारावास भोगय, हो जथे बीमार।
जब कलम मजबूर हो के, नाचथे दरबार।
आल्हा: लोकतंत्र के महा परब हे
ध्यान लगा के सबझन सुनलव, लोकतंत्र के महिमा गाव।।
लोकतंत्र मा जनता राजा, अउ प्रतिनिधि मन सेवक आय।
चुनथे जनता मन नेता ला, बने बने वो राज चलाय।।
फेर आजकल उल्टा गंगा, बोहावत हे चारो ओर।
राजा बनगे ये नेता मन, जनता होगे हे कमजोर।।
काबर अइसन होवत हे जी, काबर बढ़गे अत्याचार।
का का गलती हमन करत हन, सोच समझ के करव सुधार।।
धन बल जेखर हावै जादा, ओखर चलथे काबर जोर।
जनता रोवय करम ठठा के, कुर्सी पाथे करिया चोर।।
जेला होना जेल चाहिए, वोहू मन बइठे दरबार।
लूटत हावे आज देश ला, राजनीत के बने अजार।।
अपराधी मन नेता बन के, फैलावत हे भ्रष्टाचार।
कोन बचाही राजनीत ला, माते हावे हाहाकार।।
हमरो हावे दोष बहुत जी, हमी करे हन गलत चुनाव।
अपन ओट ला बेंच डरे हन, औने पौने करके भाव।।
कभू चुनत हन जात देख के, कभू धरम बर कर मतदान।
लालच मा पर वोट गवाथन, माते हावन कर मदपान।।
कभू योग्यता नइ देखन जी, जनहित कोन करत हे काज।
कोन मयारू माटी के हे, कोन चलाही बढ़िया राज।।
पढ़े लिखे विद्वान रहे जे , करे देश के जे सम्मान।
नेता उही ल चुन के भेजव, जे हर सत बर दे दय प्रान।।
लोकतंत्र मा बहुत जरूरी, होथे जी जनता के ओट।
वोट करव जी बने विचारे, मन मा राखव झन जी खोट।।
हाथ जोड़ के बिनती करथव, सोच समझ करना मतदान।
संसद मन्दिर लोकतंत्र के, बने रहय ओकर सम्मान।।
आल्हा: करू करेला मोर कलम हे
सोभन छन्द
सोभन छन्द
दूर होही तोर बाधा, मान झन तँय हार।।
हे बिपत होना जरूरी, जिंदगी बर रोज।
बइठ के जाँगर जुड़ाथे, राह दउड़त खोज।।
सोचथव रे आज होही,जिन्दगी खुशहाल।।
नइ सिरावय ये लड़ाई, जिन्दगी भर मान।
जब तलक तँय नइ पठोबे, साँस ला समसान।।
राख होगे जलजला के,मोर सुख अउ चैन।।
देख लेते मोर कोती, हाँस के इक बार।
तोर आशा मा खड़े मँय जिन्दगी भर यार।।
नइ करँव मँय काम कोनो , काकरो मनमार।
मस्त मनमौजी हरँव जी, फेर
विष्णुपद छन्द : ए अभिमानी गरब करे का, ये माटी तन के
ए अभिमानी गरब करे का, ये माटी तन के।
माटी मा मिलही ये चोला, सब माटी बन के।1।
काल लिखे हे अपन कलम मा, मरना सब झन के।
महुँ मिटाहूँ तहूँ मिताबे , पाट दिही खन के।2।
माटी गोटी जोर जोर के, बनगे महल बने।
छोड़ छाड़ के जाना परही, रोवत मने मने।3
पल भर के हेे ये जग मेला, छिन भर तोर मया।
सब चल देही छोड़ एक दिन, लागे नही दया।4।
कोनो सँग मा नइ जावय जी, अब मत समय गवाँ।
मिलखी मारत भूल जही सब, मिलही मीत नवाँ ।5।
हरिगीतिका: अटल जी ला श्रद्धांजलि
हे नम नयन सुरता धरे, श्रद्धा सुमन अर्पित करँव।।
माटी हवे बड़ धन्य जी, तोरे असन पा लाल ला।
करके जतन तँय हर चले,भारत ऊँचा के भाल ला।।
पीरा सहे अपने अपन, चिंता करे संसार के।।
जीवन मरण सुख दुःख सदा, सम जान के स्वागत करे।
तँय काल के भी गाल मा,हाँसत सदा चुम्बन धरे ।।
झुक के तिरंगा मान दय, माथा हिमालय के नवे।।
चाहे रहौं मँय मत रहौं, सिरमौर ये भारत रहे।
ये विश्व गुरु भारत हरे, सँसार ला तँय हर कहे।।
मँय हार नइ माँनव कभू ,ये गीत तँय गावत चले।।
कवि तोर कस कोमल हृदय,दृढ़ता रहे चट्टान कस।
नेता बने बेदाग अउ, तँय देश के पहिचान हस।।
अउ बोल निज भाखा बनाये, देश के पहिचान ला।।
हर कंठ तोरे शब्द हे ,कविता सकल जग गात हे।
धरके अपन कोरा तको, माटी घलो ममहात हे।।
हर पल जिए तँय देश बर, तनमन अपन अर्पित करे।।
सुकुवा सहीं आगास मा, हावे अटल अब नाम हे।
हे पोखरण के बीर तोला आखरी परणाम हे।।
हरिगीतिका
सिधवा हरन, बइला हरन, तँय चाब ले पुचकार ले।
रिस बात के मानन नहीं, जी भर तहूँ दुत्कार ले।
हम घर अपन मजदूर हन, मालिक हमर आने हरे।
छत्तीसगढ़ के भाग ला , परदेशिया गिरवी धरे।
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मत हार के तँय बइठ जा, ये हार रद्दा जीत के।
काँटा घलो हा गोड़ के , रचथे कहानी बीत के।।
चाहे ठिकाना दूर हे, अब बिन रुके चलते चलो।
होथे उही मन हर सफल, जे उठ जथे गिर के घलो।।
हिम्मत करव डटके बने, कल के फिकर ला छोड़ दौ।
करके भरोसा आपके, कनिहा बिपत के तोड़ दौ।
कैसे मुसीबत हारथे ,तँय देख ले ललकार के।
अब कर उदिम बस जीत बर, मत हार मानव हार के।
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हे सरसती दाई माहूँ , बिनती करव कर जोर के।
तोरे सरन मा आय हँव, मद मोह बँधना छोर के।
अज्ञान के बादर छटय, अउ पाँख ला आगास दे।
मँय हँव परे अँधियार मा, तँय ज्ञान के परकास दे।
माँ सारदा है आसरा , देवी हरस वो ज्ञान के।
सत्मार्ग मा मँय चल सकव, रद्दा छुटय अज्ञान के।
लइका हरव मँय कमअकल, नइ आय मोला साधना।
माथा नवाँ के मँय करव, तोरे चरन आराधना।
हरिगीतिका: बरसा
अब ताप मा तन मन जरय, आगी बरत हे खार हा।
तरिया सबे अब अउटगे, अउ खेत मन परिया परे।
तँय भेज दे अब नेवता, घन मेघ ला धरती तरे।
हम काम कर दे हन अपन, अब आसरा भगवान के।
नाँगर चले, जाँगर चले, बादर चले तब काम के।
सब खेत ला जोतत हवन, अब हम भरोसा राम के।
गीतिका छन्द गीत : आदमी के सामने का , आदमी का हारही ?
मुड़ नवा के काय जीबे, काय पाबे हार के।
आदमी के सामने का आदमी हा हारही।
जेन दे हे जिंदगानी , वो मुसीबत टारही।
चल तहूँ बन के नदी कस, पाँव बाधा तोर के।
तोर हिम्मत के रहत ले, कोंन बल फुफकारही।
कोंन हे बलवान अतका , जेन तोला मारही।
तोर तन के खर पछिना,नाप देही ताप ला।
हाथ मा थामे हथोड़ा, जेन कस के मारही।
देखबे पथरा घलो हा, मार खा चित्कारही।
जोर के तँय खांद जुड़ जा, तोर साथी मीत ले।
डोल जाही रे सिहासन , गाँठ कतको पारही।
अब जुलमी के रियासत, मेहनत हर बारही।
गीतिका छन्द गीत : आदमी ला चाहिए जी,आदमी बन के रहय।
हार मानय बिन लड़े ये, बात हे धिक्कार के।।
जान जावय पर डराके, अब गुलामी झन सहय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।
कारखाना का हरे बस, लूट के भरमार हे।।
अब किसानी छोड़ काबर लोग मजदूरी करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।
स्वाभिमानी काम करथे, रोज जाँगर टोर के।।
चार रोटी बर कुकुर कस, अब गुलामी झन करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।।
हक अपन ला पाय बर भी, पर तरफ का ताकना।
अब बगावत नइ करे ता,कोड़िहा जाँगर सरय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।
हौसला के सामने मा, बल घलो गिधिया जथे।।
का मरे के बाद होही, जेन करना अब करय।
आदमी ला चाहिए जी , आदमी बन के रहय।
गीतिका मुक्तक
चार खरचा बाढ़ गे हे, कम कमाई मोर हे।।
रोज बाढ़े दाम काबर, कोंन जाने तेल के।
तँय चले सरकार जइसे, हम चलाथन पेल के।।
लोग मन के लाज मरगे, गाँव भर समसान हे।।
मँय मया के बात बोलव, लोग बइरी हो जथे।
मोर रद्दा मा कलेचुप, को काँटा बो जाथे।।
तोर सुख बर अपन तन ला,घाम मा हम घालथन।।
माँग नइ पावन भले हक, पेट हमला टाँगथे।
मेहनत के बाद तन के ,भूख रोटी माँगथे।।
हम मया के बात करबो, लोग मन के साथ मा।
तँय धरम के नाँव ले के, बाँट डर संसार ला।
हम उठाबो खांद मा जी, अब सबो के भार ला।
चौपाई : छत्तीसगढ़ के पावन माटी
हरिगीतिका :बेंदरा आ के सहर
रूपमाला
सरसी छन्द
छन्न पकैया
छन्न पकैया छन्द,
चार साँस के बोहे गठरी, मरघट तक पहुचाना।।
जिनगी भर हे तोर मोर अउ, जाबे चले अकेल्ला।
तन के गरब करे रे काबर, लबरा हे जिनगानी।
बोहावत ले जीयत रहिबे, रुके बने कहानी।
ये मोह माया रिस्ता नाता, दू दिन के सब मेला।
पाके पाके आमा झरगे, कच्चा के तैयारी।
सार छन्द: जाँगर टोर कमाबो
भूख गरीबी सँग लड़ लड़ के, मया पिरित बगराबो।1।
गाँव हमर बनही फुलवारी, महर महर ममहाही।2।
रापा धर के माटी गोटी, खाँच खाँच बगराबो।3।
घर घर जा के दुख पीरा के, काँटा खुटी जराबो।4।
सार छन्द : होरी
छप्पय छन्द
नाली भरगे हाय, सरे कस बस्सावत हे।
करही कोन ह साफ, समझ मा नइ आवत हे।
कचरा के हे ढ़ेर, फेर ये झिल्ली पन्नी।
लाखों होगे पार, फेक के चार चवन्नी।
कचरा भ्रष्टाचार के, लेस देव चतवार के।
बहिरी धर सब साफ कर, बेरा हे इंसाफ कर।1।
वादा के भरमार, चार दिन चलही संगी।
टकला बर सरकार, लान के देही कंघी।
अब चुनाव हे पास, खास हो जाही जनता।
नेता आही गाँव, पेट भर खाही जनता।
मुद्दा के हर बात ला, दार साग अउ भात ला।
मतलब बर भरमाय सब, जनता के जज्बात ला।
रचरच रचरच आय, सड़क मा बइला गाड़ी।
गाँव गवतरी जाय, करय अउ खेती बाड़ी।
घन्नर घेंच बंधाय, बाजथे घनघन घनघन।
दउड़त सरपट जाय, हवा कस सनसन सनसन।
आज नंदागे कालके , बइला गाड़ी छाँव रे।
मोटर गाड़ी मार हे, तब ले सुन्ना गाँव रे।
आसा अउ बिस्वास, माँग के कोन ल मिलथे।
अपन हाथ अउ गोड़, चला के जिनगी खिलथे।
होबे जाँगर चोर, नदी मा दीया ढिलबे।
फुटय करम हा तोर, आन के चादर सिलबे।
छोड़ आलसी बीर बन, करम कमा रणधीर बन।
पोंगा पण्डित माँग के, भोग लगाथे भाँग के।
आँटे पैरा डोर, बइठ के पैरा जिनगी।
कभू बेच के चाय, तलत हे भजिया जिनगी।
करम करे का लाज, शुरू कर बढ़बे आगे।
दुनियाँ हे रफ्तार आज सब दाउड़े भागे।
चलत चलत सागर मिलय, रुके धार बसाय रे।
ठीहा मिलही ठेल के, ठेलहा धोखा खाय रे।
रोना रोये आज, करम के गठरी बाँधे।
संसो के तँय साग,ऊँ जिनगी भर राँधे।।
काबर लगे लाज , काम तो करे ल परथे।
बनके जाँगर कोड़िया, सो सो उमर बिताय जी।
बोझा होगे जिन्दगी, बिरथा जान गवाय जी।
हमन भूखर्रा तान, कमा के खाथन तब ले।
गड्थन सीधा जाय, गोड़ मा काँटा हब ले।।
उघरा हम रह जान, ढाँक के तन दूसर के।
मरथन भूख मा फेर, नहीं हक मारन पर के।।
छत्तीसगढ़िया सोज रे, करथन बिनती रोज रे।
रोज मनाथन जोग रे, दे के छप्पन भोग रे।
मया ल काबर मोर,नहीं तँय जाने बइरी।
मन मा करते सोर, पाँव के तोरे पइरी।।
निष्ठुर नैना तोर, करेजा घायल होगे।
कहिथे पूरा गाँव, टुरा अब पागल होगे।।
पीरा बाचे हे अभी,ले के जाही जान रे।
सुरता तोरे अब बही, छोड़े नही परान रे।।
जब्बर कर गोहार , उठा के हाथ अपन के।
माँगे बिन अब यार, मिलय हक नही सबन के।
कलजुग के भगवान, यही मन होगे संगी।
मोठ्ठा बर अनुदान, दुबर बर भारी तंगी।
जब सब जनता गाँव के, पनही धर के पाँव के।
हक ल आपन माँगथे, खूंटी मा टोपी टाँगथे।
अमृतध्वनि छन्द
पाँव परँव कर जोर के, सुन ले बिनती मोर।।
सुन ले बिनती, मोर पवनसुत, बिपदा भारी।
कँरव आरती, थाल सजाके, तोर पुजारी।।
फूल पान मँय, लाने हावव, माथ नवा के ।
दे दे दरसन, करके किरपा, तीर म आके।।
बजा नगारा खोर मा, गा ले सातो राग।
गा ले सातो, राग मतादे, हल्ला गुल्ला।
आज बिरज मा, बनके राधा, नाचय लल्ला।
अब गोरी के, कारी नैना, आरी लागे।
मया बढाले, नैन मिलाले, फागुन आगे।
मुखड़ा है मनमोहिनी, हाँसत आवय जाय।।
हाँसत आवय, जाय हाय रे, पास बलाथे।
तीर मा आ के, खन खन खन खन , चुरी बजाथे।।
नैन मटक्का, मतवाली के, हँसी ठिठोली।
जी ललचाथे, अब गोरी के, गुरतुर बोली।।
जन सेवक ला आज के, जोंक बरोबर मान।।
जोंक बरोबर, जान मान ये, चुहकय सबला।
बनके दाता, भाग्य विधाता, लूटय हमला।।
अपन स्वार्थ मा, धरम जात मा, बाँटय बाँटा।
हमर राह मा, बोवत हे जे, सब दिन काँटा।
परमारथ के काज हा, कभू न बिरथा जाय।।
कभू न बिरथा, जाय हाय रे, बन उपकारी।
प्यास बुझाथे, सबला भाथे, बादर कारी।।
मरते सैनिक, करथे सबके, पहरेदारी।
तभे वतन हा, ममहाथे जी, जस फुलवारी।।
रहय चँदैनी चार दिन, फेर कलेचुप रात।।
फेर कलेचुप, रात ह कारी, तोर दुवारी।
अब छुछुवाही, सब झिन आही, आरी पारी।।
मार मताही, खलबल खलबल, सबझन डबरा।
दे दे चारा, जाल फेकही, नेता लबरा।।
घर के सुख बर रात दिन, देथे तन मन प्रान।।
देथे तन मन, प्रान लगाके, सेवा करथे।
सुख दुख सहिथे, अउ घर भर के , पीरा हरथे।।
दाई-बेटी, बहिनी- पत्नी, अउ संगवारी।
अलग अलग हे, नाम फेर हे, देवी नारी।
कुण्डलिया
जब जब मनखे हारथे, खुले जीत के राह।
गिर उठ कर के हौसला, खोज नवा उत्साह।
खोज नवा उत्साह, चाह ला पंख नवा दे।
झन जुड़ाय अब आग, रोज तँय फूँक हवा दे।
मारे जब झटकार, हाथ ले सकरी खनके।
बँधना टोरय खास, आस कर जब जब मनखे।1।
तोरे बस मा राम हे, झन तँय कर आराम।
जिनगी माँगे तोर ले, कर ले बेटा काम।।
कर ले बेटा काम, भाग ला अपन गढ़ ले।
खेत खार ला देख ,संग मा थोकुन पढ़ ले।।
पानी कस हे धार, मेहनत दउड़य नस मा।
हार जीत सब यार, रही तब तोरे बस मा।2।
खाथे मलाई रात दिन, नेता मन हर खास।
आजादी के नाव ले , आजो हमला घाँस।।
आजो हमला घाँस, फाँस हिरदय मा गड़थे।
निज स्वारथ ल साध, आज सब आघु बढ़थे।।
जनता है बर्बाद, बढ़े, ऊँच नीच के खाई।
मरे भूख से देश, आज वी खाय मलाई।3।
चाटी चुरगुन गाय गरू, अपन पेट बर खाय।
वोखर जग मा नाव हे, परहित जे मर जाय।।
परहित जे मर जाय, उही इतिहास म जीथे।
नीलकण्ठ बन जेन, जेन जगत के जहर ल पीथे।।
धन दौलत अउ नाम,सबो हो जाही माटी।
मानुस पर बर आय, अपन बर जीवय चाटी।4।
रोटी है संसार मा, भूखे बार भगवान ।
सुरुज उगे जब पेट मा, तन मा तब दिनमान।।
तन मा तब दिनमान, रात हा घलो सुहाथे।
मिहनत कर इंसान , पेट भर अन ला खाथे।।
सबो हाथ ला काम, लाज बर मिलय लँगोटी।
किरपा कर भगवान, सबो ला दे दे रोटी।5।
बइठे आमा डार मा, कउवा बोलय काँव।
कोन गली हे कोयली, सुन्ना परगे गाँव।।
सुन्ना परगे गाँव, छाँव हा घलो नँदागे ।
बिरवा कटगे हाय, गाँव मरघट्टी लागे।।
करे नहीं अब बात, रहे सब मुँह ला अइठे।
चौरा हे न चौक, कहाँ अब मनखे बइठे।6।
दुर्गा दाई आज तँय, धर चण्डी के रूप।
बइरी मन के नास कर, रणचण्डी तँय झूप।।
रणचण्डी तँय झूप, गाँज दे मुड़ के खरही।
लहू बोहावय धार, तोर जब बरछी परही।।
बढ़गे अतियाचार, तहीं हा हमर सहाई।
आजा रन मा आज, मोर तँय दुर्गा दाई।7।
हर दफ्तर मा मातगे, चिखला भ्रष्टाचार।
सरकारी अनुदान तँय, कइसे पाबे यार।।
कइसे पाबे यार,चढ़ावा बिना चढाये।
बाबू साहब लोग, सबो हे जीभ ल लमाये।
का करबे प्रसाद, फँसे एखर चक्कर मा।
घुस खाये के होड़, मचे हे हर दफ्तर मा।8।
विपदा तोरे जिंदगी , के करही सिंगार।
तपके सोना के सहीं, पाबे तहूँ निखार।
पाबे तहूँ निखार, हार के झन थक जाबे।
रेंगत रेंगत यार, एक दिन मंजिल पाबे।
आसा अउ विस्वास, राख के मन मा जोरे।
हिम्मत जाही जीत, हारही विपदा तोरे।9।
पनिहारिन मन हॉस के , तरिया नदिया आय।
घाट घठौन्डा फूल कस,महर महर ममहाय।
महर महर ममहाय, गाँव के गली गली हा।
देखय अउ सरमाय, फूल के कली कली हा।
सुख दुख अपन सुनाय, चार झिन सँगवारिन मन।
हाँसत आवय जाय, आज जब पनिहारिन मन।
रोला
माया हे संसार, आज तँय एला गन ले।
जीयत भर के नाँव, तोर पल मा मिट जाही।
जोरे धन भरमार, काम नइ तोरो आही। 1।
लच्छा खिनवा हार, तोर बर लाने हँव।
तँय जिनगी मा मोर, मया रस घोरे हस।
सुख राखे परिवार, मोर ले गठजोरे हस।2।
बाँधे पथरा पेट, नहीं अब लइका रोवय।
दे दे सबला काम, सबो ला रोजी-रोटी।
किरपा कर भगवान, मिलय सब झन ल लँगोटी।3।
अब तिहार तो रोज, मनावै जनता खाली।
ले लय सबला लूट, खोल के दारू भट्ठी।
अपन करम के भार, तहूँ हा इहें उठाबे।
पर पीरा बर रोय, मान वो जग मा पाथे।
उदिम करइया हाथ, भाग ला खुद सिरजाथे।
आवय- जावय साँस , नहीं अब जउहर भइगे।
होगे आँखी लाल, लार मुँह ले चुचुवावय।
काबर खाये आज, सोच के मन पछतावय।
खन के गड्ढा पाट, चपक दे माटी ढेला।
काम करे न काज, रोज जे मार लबारी।
मनखे मनखे भेद, करे स्वारथ बर भारी।
धान पान के भाव, घलो तँय मारे डंडी।
मिठलबरा तँय मार,लबारी मन भरमाये।
अब चुनाव हे आज, लबारी भारी परही।
उल्लाल ३
मँय पैरी लेहव गोड़ बर, अउ माला ला घेच के।।
तँय किंदर दुनियां भले, फिर आबे अब गाँव रे।
उल्लाला 2
मानवता ह नदात हे, मनखे मनखे खात हे।।
पछतावत मन मार के, जंगल सबो उजार के।
रोटी रोटी बोलथे, अउ मनखे ला तोलथे।
खाये जाथे ओखरा, खाथे मिलके बोकरा।
भइया खावय चाट के, सबो मया ला बाँट के।।
उल्लाला 1
पालनहारी जान के, आये हँव मँय द्वार जी।।
माँग-माँग के जिंदगी, लगही बेड़ापार रे।।
माते हाँवव देख के, हो गे हँव कंगाल वो।।
माटी माटी मा मिलय, इही जगत के रीत रे।।
का संगी धन के गरब, माटी के इंसान मन।।
माटी फल तोला दिही, जइसे बिजहा बोय जी।।
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